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________________ दूसरा प्रवचन यात्रा का प्रारंभ अपने ही घर से
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________________ Aaon 6 . . . प्रश्न-सार संन्यास लेकर साधना करना, संन्यास न लेकर साधना करनादोनों स्थितियों में आपके मार्ग का ही अनुसरण है। फिर संन्यास से विशेष फर्क क्या? आपने कहा आंख आक्रामक होती है। लेकिन आपकी आंखों में तो प्रेम का सागर दिखता है, और जी करता है उन्हें निहारता ही रहूं। क्या आंख को कान-जैसा ग्राहक बनाया जा सकता है? SHARE क्या स्वाद को भी परमात्म-अनुभूति का साधन बनाया जा सकता है? / भगवान का प्रवचन सुनते हुए उनकी आवाज से हृदय व कर्ण-तंतुओं पर एक अजीब तरह का कंपन। तब से साधारण ध्वनियों से भी अजीब कंपन व आनंद की लहर पैदा होना। क्या बुद्ध-पुरुषों के स्वर में विशेष कुछ ? साथ ही भगवान की उपस्थिति में एक आनंददायक गंध का मिलना। वही गंध कभी ध्यान में व आश्रम में अन्यत्र भी मिलना। __ क्या काल-विशेष की गंध-विशेष भी होती है? आप कहते, संन्यास सत्य का बोध है। क्या संन्यास के लिए गैरिक वस्त्र व माला अनिवार्य? क्या कोई बिना दीक्षा लिये आपके बताए मार्ग पर नहीं चल सकता? / 2010_03
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________________ प हला प्रश्नः हम संन्यास लेते हैं और साधना करते और भी हंसे। उन्होंने कहा तू पागल हो गयी है। दो पैसों में कहीं हैं, हम संन्यास नहीं लेते और साधना करते चर्च बना है? उसने कहा वह तो मुझे भी मालुम है। लेकिन मैं हैं—दोनों हालत में आपके मार्ग का अनुसरण अकेली नहीं हूं; परमात्मा भी मेरे साथ है। दो पैसे और थैरेसा तो करते हैं। कृपया बताएं कि संन्यास से जीवन में विशेष फर्क ना-कुछ है; लेकिन दो पैसे + परमात्मा बहुत कुछ है। और क्या क्या आता है? चाहिए! जिस जगह उसने खड़े होकर यह बात कही थी, आज दुनिया संन्यास लिये बिना फर्क को जानने का कोई उपाय नहीं। का सबसे सुंदर चर्च है। बना—किसी गहरे समर्पण से बना; संन्यास स्वाद है। संन्यास है स्वाद मेरे निकट आने का।। संपत्ति से नहीं बना। यह बात कि थैरेसा अकेली नहीं है। दो पैसे संन्यास साहस है समर्पण का। हैं थैरेसा के पास, लेकिन परमात्मा भी है। साधना तुम करते हो; लेकिन संन्यासी अकेला नहीं है, तुम तुम जब साधना कर रहे हो मेरी बात सुनकर, तो तुम चुनाव अकेले हो। तुम भी साधना करते हो, संन्यासी भी साधना करता कर रहे हो—जो तुम्हें लगता है ठीक-वह तुम करते हो; जो है। संन्यासी मेरे साथ है, तम मेरे साथ नहीं। | तुम्हें ठीक नहीं लगता वह तुम नहीं करते हो। तो तुम्हारा खयाल मैं तो दोनों के साथ हैं। लेकिन तम साधना करते हो अपने है कि तुम मेरी मानकर चल रहे हो, तम अपनी ही मानकर चल हिसाब से। सुनते हो मुझे, पर चुनते तुम्हीं हो। संन्यासी चुनता रहे हो। भी नहीं। वह एक बार मुझे चुन लेता है। उसने छोड़ दिया। संन्यासी का अर्थ है। उसने कहा, अब हम अपनी न मानेंगे, चुनाव। उसने कहा, बहुत हो गया! आपकी मानेंगे। अब हम चुनना छोड़ते हैं। अब हम राजी हैं मैं तो दोनों के साथ हूं, लेकिन संन्यासी मेरे साथ हो जाता है। जहां ले चलो। संन्यासी का अर्थ है : प्रेम का अंधापन। संन्यासी और इससे बड़ा क्रांतिकारी फर्क पड़ता है। पर वैसा फर्क जानोगे ने कहा कि अब तुम्हारी आंख काफी है, हमारी आंख की कोई तो ही जानोगे। जरूरत नहीं। पर यह तुम न जान सकोगे। जैसे कोई आदमी पूछे एक बड़ी प्रसिद्ध ईसाई महिला हुई-थैरेसा। गरीब भिखारिन कि प्रेमी और गैर-प्रेमी में फर्क क्या है? जिसने स्वाद लिया है थी। और एक दिन उसने अपने गांव में घोषणा की कि मैं जीसस | उसमें, और जिसने स्वाद नहीं लिया है, फर्क क्या है? स्वाद के के लिए एक बड़ा चर्च, एक बड़ा मंदिर बनाना चाहती हूं। लोग बिना जानने का कोई उपाय नहीं है। इसे खयाल में ले लेना। हंसे। लोगों ने पूछा, तेरे पास संपत्ति कितनी है! तो उसने दो पैसे मैं तो साथ हूं, लेकिन तुम जिस दिन मेरे साथ हो जाओगे उस निकालकर अपनी जेब से बताए कि मेरे पास दो पैसे हैं। लोग दिन जीवन में एक क्रांति घटनी शुरू होगी, जिसकी तुम अभी 2010_03 www.jainelibrarorg
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________________ जिन सूत्र भागः2 कल्पना भी नहीं कर सकते। तब तुमने एक सहारा लिया। तब कुछ ऐसा है कि हजार बुद्धिमत्ताएं इस पर निछावर की जा सकती तुमने कोई हाथ पकड़े। तब तुम्हारे जीवन में एक भरोसा आया। हैं। साधना तो तुम भी कर रहे हो, लेकिन संन्यासी ने कुछ गहन मैं एक बड़े वैज्ञानिक की जीवन-कथा पढ़ता था। में प्रतिज्ञा जगायी है। वनस्पतिशास्त्री हुआ बड़ा। वह एक पहाड़ की कंदरा में बैठे हैं तेरे दर पेकछ करके उठेंगे खिलनेवाले फूलों का अध्ययन करना चाहता था, लेकिन उन या वस्ल ही हो जाएगा या मरके उठेंगे फूलों तक पहुंचने का कोई उपाय न था। वह बड़ी गहरी उसने जीवन को दांव पर लगाने की हिम्मत की है। संन्यासी खाई-खड्डु में थे। वैसे फूल कहीं और खिलते भी न थे। कोई जुआरी है। तुम होशियार हो। तुम दुकानदार हो। उपाय न देखकर उसने अपने छोटे बेटे को रस्सी में बांधा, कमर मुझे सुनकर तुमने जो पाया है, वह कुछ भी नहीं है-उसके से रस्सी बांधी और उसे उस खड्ड में लटकाया। और उससे कहा मुकाबले जो तुम मेरे पास आकर पाओगे। जो तुमने बुद्धि से कि तू कुछ फूल उखाड़ लाना। छोटा बेटा लटका। वह बड़ी सुनकर पाया है, वह तो भोजन की मेज से गिर गये टुकड़े हैं। खुशी से लटका। उसने तो खेल समझा। और जब बाप लटका भिखमंगा ही तुमने रहना तय किया है-बात और! संन्यासी रहा हो, तो बेटे को क्या फिकिर! वह तो बड़ा आनंदित हुआ। | मेरा अतिथि है। तुम बाहर-बाहर रहोगे। नहीं कि मैंने निमंत्रण, उसने तो नीचे जाकर फूल भी इकट्ठे कर लिये; लेकिन बाप के नहीं भेजा था; तुमने निमंत्रण स्वीकार न किया। तुमने हजार हाथ-पैर कंप रहे थे। भेजा तो है बेटे को, लेकिन यह खतरनाक | बहाने उठाए। तुमने कहा आते हैं, अभी और काम हैं। काम है। लौटेगा जिंदा? उसने ऊपर से चिल्लाकर पूछा, कोई __ जीसस ने एक कहानी कही है कि एक सम्राट की बेटी का तकलीफ तो नहीं है? कोई घबड़ाहट तो तुझे नहीं हो रही है? | विवाह था और उसने एक हजार देश के प्रतिष्ठिततम लोगों को उसने कहा घबड़ाहट कैसी! जब रस्सी मेरे बाप के हाथ में है, तो निमंत्रण भेजे। लेकिन किसी ने कहा कि अभी तो फसल कटने घबड़ाहट कैसी? का समय है और मैं न आ सकूँगा, क्षमा चाहता हूं। और किसी बाप घबड़ा रहा है, डर रहा है; क्योंकि यात्रा तो जोखिम की ने कहा कि अदालत में मुकदमा है और मैं क्षमा चाहता हूं। और | है। अब इस बेटे के भीतर जो भरोसा है, वह अगर न हो, तो किसी ने कुछ और, और किसी ने कछ और...। जब उसके खतरा हो सकता है। घबड़ाहट ही खतरा पैदा कर देती है। संदेशवाहक वापिस लौटे हैं तो उन्होंने कहा कि बहुत-से अब यह बड़े मजे की बात है, बड़ा दुष्ट-चक्र है—घबड़ाहट मेहमानों ने बहुत-से बहाने बताए, वे न आ सकेंगे। के कारण तुम संन्यास नहीं लेते। डर-संसार का, समाज का, तो सम्राट ने कहा, फिर तुम रास्तों पर जाओ और जो भी आने प्रतिष्ठा का। डर के कारण तुम अकेले-अकेले चलते हो। को राजी हो, उसे बुला लाओ। अब निमंत्रण की फिकिर छोड़ो, अकेले के कारण तुम और भी डर की स्थिति पैदा कर रहे हो। क्योंकि मेरा राजमहल खाली न रहे। मेरी बेटी का विवाह है। | और कछ जीवन की सूक्ष्मतम घटनाएं हैं, हृदय के कुछ राज राजमहल में भीड़ हो। जो भी राह पर मिले। अब तुम मेरे और रहस्य, जो भरोसे से ही खुलते हैं, श्रद्धा से खुलते हैं। निमंत्रण की फिकिर मत करना। जो आने को राजी हो, उसको तो तुम साधना कर रहे हो—वह बुद्धि से है। जिसने संन्यास बुला लाना। लिया, वह हृदय में उतरा; उसने बद्धि को एक तरफ रखा। आए मेहमान। भिखमंगे भी आए। गरीब भी आए। उसने कहा अब सुनेंगे हृदय की, अब गुनेंगे प्रेम की। निश्चित | अशिक्षित भी आए। जिनको निमंत्रण न भेजा गया था, वे भी ही प्रेम अंधा है; लेकिन प्रेम के अंधेपन में ऐसी आंखें हैं कि आए। और जीसस ने कहा है, यह कहानी घटी हो या न घटी हो, सदियों तक बुद्धिमानी में जीओ तो भी उन्हें तुम पा न सकोगे। क्योंकि सम्राटों के निमंत्रण में लोग कभी इनकार नहीं करते, प्रेमी पागल है। लेकिन परमात्मा के निमंत्रण के साथ रोज ही ऐसा होता है। इसलिए जिन्होंने संन्यास नहीं लिया है, वे सोचते हैं कि निमंत्रण तो मैंने तुम्हें भेज दिया है। तुम मेरी शिकायत न कर संन्यासी पागल है। ठीक ही सोचते हैं। लेकिन यह पागलपन | सकोगे। मैंने तो बुलावा दे दिया है। अब तुमने कोई बहाना 2010_03
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________________ - S यात्रा का प्रारंभ अपने ही घर से निकाल लिया, तम्हारी मर्जी। यह महल तो खाली न रहेगा। हम पी भी गये, छलका भी गये मेहमान तो आएंगे। तुम न आए तो कुछ फर्क न पड़ेगा। तुम्हारी तुम बुद्धिमानों की सभा जैसी सभा मत बना लेना अपनी। जगह कोई और होगा। उस अंजुमने-इर्फानी में | मझे सनकर तमने जो पाया, वह तो भोजन के टेबिल से गिर | -बड़े बद्धिमानों की सभा थी। गये टुकड़े हैं। उनसे ही तृप्ति मत मान लेना। मेरे पास आकर उस महफिले-कैफो-मस्ती में तुम जो पाओगे...। -मस्ती और आनंद और उल्लास के क्षण में बद्धिमानों की मेरे पास आने का और क्या उपाय है? कंधे से कंधा लगाकर बड़ी सभा थी। खड़े हो जाओ तो मेरे पास थोड़े ही आ जाओगे। हृदय से हृदय | सब जाम-बकफ बैठे ही रहे लगाकर खड़े हो जाओ, तो! संन्यासी ने वही किया है। उसने -बुद्धिमान थे, कैसे पीएं! तो अपने जाम सामने रखकर बैठे हिम्मत की है। उसने मेरे साथ होने के लिए जगहंसाई मोल ली ही रहे। गैर-बुद्धिमान जो थेहै। लोग हंसेंगे। लोग कहेंगे, पागल हुए! लोग कहेंगे, बुद्धि हम पी भी गये, छलका भी गये! खो दी! कुछ तो सोचो! सम्मोहित हो गये? किस जाल में पड़ पी लो और छलका लो! कब तब जाम लिये बैठे रह गये हो? तुम जैसा बुद्धिमान आदमी और किसी की बातों में आ | किसकी राह देखते हो? कोई कहे? किसकी प्रतीक्षा कर रहे गया! पर उसने मेरे साथ रहना चुना है, संसार के साथ रहना नहीं हो? समय बीता जाता है। पल-पल, घड़ी-घड़ी मधुशाला के चुना। उस चुनाव में ही क्रांति घटती है। द्वार बंद होने का समय आया जाता है। फिर मत रोना। अभी छलकती है जो तेरे जाम से उस मय का क्या कहना अपनी करोगे, फिर मत चीखना-चिल्लाना! क्योंकि बंद तेरे शादाब ओंठों की मगर कुछ और है साकी दरवाजों के सामने चीखने-चिल्लाने से फिर कुछ भी नहीं होता। तुम्हें अगर पैमाने से छलकती शराब से ही तृप्ति होती हो, / और में कहता हूं, ऐसा बहुत-से लोग कर रहे हैं। महावीर को तुम्हारी मर्जी। गये पच्चीस सौ साल हो गये, कितने लोग अभी भी उस दरवाजे छलकती है जो तेरे जाम से उस मय का क्या कहना के सामने चीख रहे, चिल्ला रहे हैं! उन्हीं को जैन कहते हैं। बुद्ध खूब है वह शराब भी। को गये पच्चीस सौ साल हो गये, कितने लोग उस दरवाजे के तेरे शादाब ओंठों की मगर कुछ और है साकी सामने प्याले लिये खड़े हैं कि खोलो द्वार, हम प्यासे हैं; भरो लेकिन अगर ओंठों पर ओंठ रखकर ही पीना हो शराब को, तो हमारे प्याले! लेकिन मधुशाला जा चुकी! उन्हीं को तो बौद्ध संन्यास लिये बिना कोई उपाय नहीं है। और यह तो तुम पास कहते हैं। ऐसे ईसाई हैं, हिंदू हैं, मुसलमान हैं। आओगे तो ही जानोगे। यह बात समझाने-समझने की नहीं। मैं तुम्हें आगाह किये देता। मेरे जाने के बाद तुम संन्यास यह बात कुछ करने की है। लोगे। लेकिन तब किसी मतलब का न होगा: फिर थोथा होगा। मेरे किये जो हो सकता है, वह मैं कर रहा हूं। लेकिन तुम भी महावीर के साथ संन्यासी होने में तो साहस था; महावीर के दरवाजा खोलो! अब। अब तो उसका आदर है। महावीर के साथ तो अनादर नहीं तो ऐसा न हो कि तुम समझदारी में बैठे ही रह जाओ। यह था। जैन-मुनि होना उस समय तो केवल कुछ थोड़े-से मधुशाला सदा न खुली रहेगी। कोई मधुशाला सदा नहीं खुली हिम्मतवर लोगों की बात थी। इसीलिए तो महावीर को महावीर रहती है। द्वार-दरवाजे बंद होने का समय आ जाएगा। कहा। उनके साथ जो खड़े हुए, उनके लिए भी हिम्मत की बात उस महफिले-कैफो-मस्ती में, थी। सब तरह से प्रतिष्ठा, पद, मान, सम्मान खोना पड़ा। उस अंजुमने-इर्फानी में जीसस के साथ जो चले, उनके लिए तो सूली मिली। अब तो जीसस के पीछे जो चलते हैं, वे सिंहासनों पर विराजमान हैं। 2010 03
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________________ जिन सत्र भाग: 2 पीछे तो बड़ा आसान हो जाता है। सोचते हैं, आदमी भला होगा; भरोसे-योग्य मालूम होता है; मैं एक कहानी पढ़ रहा था। न्यूयार्क के बड़े चर्च में, सबसे बड़े धार्मिक है। दुकान पर भी बैठे हो अगर गीता लेकर तो ग्राहक चर्च में, जो कि दुनिया का सबसे ज्यादा संपत्तिशाली चर्च है, तुमसे ज्यादा मोल-भाव नहीं करेगा। प्रधान पुरोहित अपने प्रवचन की तैयारी कर रहा है कि उसके एक इसीलिए तो लोग चंदन-तिलक लगाकर बैठते हैं। राम-राम शागिर्द ने दौड़कर उससे कहा कि सुनो, क्या कर रहे हो? कौन बोलते रहते हैं दुकान पर! आया है, पीछे तो देखो! देखा तो खुद जीसस! वेदी के सामने | धार्मिक आदमी को दूसरों को लूटने में सुविधा हो जाती है, खड़े हैं। प्रधान पुरोहित भी घबड़ाया। ऐसा कभी हुआ न था। आसानी हो जाती है। लाभ ही लाभ है। मेरी किताब लेकर तम जीसस को गये दो हजार साल हो गये। यह कौन सज्जन आ गये बैठोगे तो हानि ही हानि है। किसी ने देख लिया कि अरे, तो तुम हैं! बिलकुल जीसस-जैसे मालूम पड़ते हैं! बड़ा मुश्किल है, भी उलझ गये! तो तुम पर भी भरोसा गया! कहें इनसे कुछ कि न कहें! शागिर्द ने पूछा कि क्या करूं, कुछ | संन्यास, अभी मेरे साथ संन्यास, दुस्साहस है! लेकिन आज्ञा? तो बड़े पुरोहित ने कहा एक काम कर, कि वह जो दान | धन्यभागी हैं वे जो दुस्साहस कर लेते हैं! क्योंकि जो खोने को की पेटी है, उस पर बैठ जा। यह आदमी पता नहीं किस तरह का राजी नहीं, वह पा न सकेगा। जो सब खोने को राजी है, वही सबहै, कौन है! लगता जीसस-जैसा है, लेकिन पेटी न ले भागे! पाने का मालिक होता है। जो मिटने को राजी है, परमात्मा उसी दान की पेटी पर बैठ जा और व्यस्त दिखने की कोशिश कर। को भर देता है, पूरा कर देता है। तुम खाली तो होओ, तुम जगह इसकी तरफ ध्यान मत दे। | तो बनाओ-प्रभु आएगा। अगर जीसस चर्च में आज आ जाएं तो परोहित को अपनी प्रतिष्ठा, सम्मान, धन बचाने की फिकर होगी कि यह आदमी दूसरा प्रश्न: कल आपने कहा कि आंख आक्रामक होती है। कहां भीतर आ गया! लेकिन आपकी आंखों में तो मुझे प्रेम का सागर दिखायी देता है कृष्ण की तुम बड़ी पूजा करते हो; लेकिन कभी सोचा कि | और जी करता है कि उन्हें निहारता ही रहूं। कृपया बताएं कि कृष्ण तुम्हारे द्वार पर आ जाएं मोर-मुकुट बांधे, बांसुरी बजाने क्या कान की तरह आंख को भी ग्राहक बनाया जा सकता है? लगें, तो तुम पुलिस में खबर करोगे! तुम घबड़ा जाओगे! मरे हुए पैगंबरों की पूजा बड़ी आसान है, क्योंकि उसमें कुछ | मेरी आंखों में तुम्हें प्रेम का सागर दिखायी पड़ सकता है। भी तो लगता नहीं। कुछ भी लगता नहीं। कुछ दांव नहीं। कुछ | क्योंकि मैं तुम्हें नहीं देख रहा हूं, तुम्हारे भीतर जो छिपा है उसे जोखिम नहीं। लाभ ही लाभ है। जीवित पैगंबर के साथ खड़े देख रहा हूं। मैं तुम्हें देख ही नहीं रहा हूं। मैं तुम्हारी संभावना को होने में हानि ही हानि है, लाभ कहां? | देख रहा हूं। मैं बीज को नहीं देख रहा हूं-मैं उन फूलों को देख मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, अगर हम संन्यास लें तो | रहा हूं जो कभी खिलेंगे, खिल सकते हैं। मैं तुम्हारे आर-पार लाभ क्या होगा? मैं उनसे कहता हूं, कहीं और! तुम कहीं और देख रहा हूं। लेकिन यह देखना तभी संभव है जब कोई स्वयं को लेना, यहां तो हानि होगी। यहां तो जो तुम्हारे पास है वह भी खो देख लिया हो; उसके पहले संभव नहीं है। स्वयं को जानने के जाएगा। यहां तो शून्यता मिलेगी, रिक्तता मिलेगी। यहां तो जो | बाद तो सभी चीजें अनाक्रामक हो जाती हैं। स्वयं को है वह खो जाएगा। तुम भी खो जाओगे। मिटना हो तो यहां | बाद तो हिंसा बच ही नहीं सकती। स्वयं को जाननेवाला तो सब आना। लाभ की बात, तो कहीं और! कहीं, जहां जीवन खो भांति हिंसा से शून्य हो जाता है। लेकिन यह तो स्वयं को जानने चुका है। कहीं, जहां केवल लकीरें रह गयी हैं। पिटी हुई लकीरें के बाद घटेगा। अभी तो तुम्हें चुनाव करना होगा। अभी तो तुम्हें रह गयी हैं—मुर्दा लकीरें, मुर्दा शास्त्र। वहां कोई जोखिम नहीं | अपने व्यक्तित्व में वे बातें चुननी होंगी जो कम से कम आक्रामक है, लाभ ही लाभ है। हैं। और एक-एक कदम यात्रा करनी होगी, एक-एक सीढ़ी लोग तुम्हें गीता पढ़ते देख लें तो लाभ ही लाभ है। लोग चढ़नी होगी। आंखें भी अनाक्रामक हो जाती हैं। सारा व्यक्तित्व 26 2010_03
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________________ यात्रा का प्रारंभ अपने ही घर से ही अनाक्रामक हो जाता है। जिस दिन परमात्मा ही दिखायी जिसकी पहचान अपने भीतर न थी, जिसकी प्रत्यभिज्ञा भीतर न पड़ने लगता है, आक्रमण करोगे किस पर? हुई थी, उसे तुम बाहर पहचानते कैसे? बाहर पहचानने की सारी यहां तम इतने बैठे हो. मझे एक ही दिखायी पड रहा है। रूप | संभावना अंतर्तम में घटती है। पहले वहां। सबसे पहले वहां। होंगे अनेक। बहुत शैलियों में परमात्मा आया है। रंग-ढंग हुस्न-ही हुस्न है जिस सिम्त भी उठती है नजर अलग हैं। आकृति अलग है। लेकिन है वही। जैसे सोने को कितना पुरकैफ ये मंजर, ये समां है साकी किसी ने बहुत-बहुत आभूषणों में ढाला हो। जैसे कुम्हार ने एक हुस्न ही हुस्न है जिस सिम्त भी उठती है नजर—फिर तो जहां ही मिट्टी से बहुत-बहुत ढंग के बर्तन बनाए हों। उस अरूप को | आंख उठती है, सौंदर्य ही सौंदर्य है! इस अस्तित्व में असुंदर तो देखने की क्षमता लेकिन तभी आती है जब तुमने उसे अपने भीतर | कुछ हो नहीं सकता। कहीं देखने में भूल हो गयी होगी। इस पा लिया हो। अस्तित्व में असुंदर के होने का उपाय नहीं है। अस्तित्व सौंदर्य इसे स्मरण रखो। से भरा है, सौंदर्य का सागर है। तुम वही देख सकते हो दूसरे में, जो तुमने स्वयं में पहले देख कितना पुरकैफ ये मंजर लिया हो। तुम दूसरे में वही देखते रहोगे जो तुम स्वयं में देखते कितना आनंद से भरा हुआ है सब... हो। अगर तुम क्रोधी हो, तो दूसरे में तुम्हें क्रोध दिखायी पड़ता | ये समां है साकी। रहेगा। अगर तुम दुष्ट हो, तो दूसरे में तुम्हें दुष्टता दिखायी | लेकिन, यह आनंद पहले भीतर स्वाद लेना पड़े। यह आनंद पड़ती रहेगी। अगर तम हिंसक हो, तो सारा संसार तम्हें हिंसक पहले भीतर उठे। यह भीतर से तम्हारे प्राणों में जगे और तम्हारी मालूम पड़ता रहेगा। अगर तुम चोर हो, तो तुम हर एक से डरे आंखों और कानों और तुम्हारे हाथों में छा जाए। फिर तुम जो रहोगे, क्योंकि तुम्हें हर जगह चोर ही दिखायी पड़ेगा। जगत छुओगे वही परमात्मा है। अभी तो तुम जो छुओगे वही मिट्टी हो प्रतिबिंब है तम्हारा, दर्पण है-तुम्हारी ही छवि बनती है। जाता है। सोना छुओ, मिट्टी हो जाता है। क्योंकि अभी सिवाय | जैसे ही तुमने स्वयं को जाना—स्वयं की वास्तविकता में, | वासना के कुछ भी भीतर नहीं है। वासना सोने को छुए, मिट्टी हो उसकी परिपूर्णता में वैसे ही रूप खो जाते हैं, अरूप का सागर जाता है। प्रार्थना मिट्टी को छुए, सोना हो जाती है। चारों तरफ फैल जाता है। फिर कुछ भी आक्रमण नहीं, क्योंकि तुम्हारे पास आंख चाहिए, दृष्टि चाहिए। तुम्हारे पास भीतर आक्रमण करे कौन? करे किस पर? कौन मारे? किसे मारे? सघन प्रतीति चाहिए। निश्चित ही तब फिर कुछ आक्रमण नहीं फिर तो ऐसा है जैसे अपने ही दोनों हाथ। एक हाथ से दूसरे हाथ रह जाता। इसीलिए तो कृष्ण गीता में अर्जुन को कह सके, कि तू को मारने का अर्थ क्या है? तब दूसरा भी स्वयं है। तब तुम | फिकर मत कर! तू सिर्फ एक उसको याद रख। तू सिर्फ उस एक दूसरे में भी अपने को फैला हुआ पाते हो। तभी प्रेम घटता है, | को अपने भीतर विराजमान देख। तू केवल उस एक को पहचान जब दूसरा मिट जाता है। लेकिन दूसरा तभी मिटेगा जब तुम ले जिसका तू उपकरण मात्र है। जो तुझसे अभिव्यक्त हुआ है, | मिट जाओ। इसलिए सारी यात्रा अपने घर से शरू होती है। बस त उसको पहचान ले। उसकी शरणागति हो जा। फिर कोई सारी पूजा, सारी प्रार्थना, सारी साधना अपने अंतर्तम से शुरू | चिंता नहीं। फिर तू युद्ध कर न कर, कुछ भेद नहीं पड़ता। न होती है। | कोई कभी मारा गया है, न कभी कोई मारा जा सकता है। एक बार भीतर के सौंदर्य की झलक मिल गयी कि तुम जहां अगर कोई मुझसे पूछे, तो कृष्ण ने गीता में जो कहा है, वह आंख खोलोगे वहीं, वहीं तुम उसे विराजमान पाओगे। तुम महावीर का परिशिष्ट है। अगर महावीर प्रारंभ हैं. तो गीता अंत चकित होओगे, तुम चमत्कृत होओगे कि इतने दिन तक चूकते है। बड़ा मुश्किल होगा यह समझना; क्योंकि जैनों को तो गीता कैसे रहे! इन्हीं रास्तों से गुजरे, यही वृक्ष थे, यही लोग थे, यही से बड़ा विरोध रहा है; क्योंकि उन्हें तो लगा यह आदमी कृष्ण, पशु-पक्षी थे, यही कोयल रोज गीत गाती रही, यही आंखें थीं, | हिंसा की तरफ उत्तेजित कर रहा है लोगों को, हिंसा की तरफ भेज कल भी इनमें झांका था, लेकिन परमात्मा से चूकते क्यों रहे? | रहा है। जैनों को तो ऐसा लगा कि अर्जुन तो भाग जाना चाहता 127 2010_03
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________________ जिन सत्र भागः2 था, जैन-मुनि होना चाहता था, छोड़ देना चाहता था, यह सब कोई मरता कहां! हिंसा है-और कृष्ण ने इसको भरमाया, भटकाया! तो जैनों ने | अहिंसा पहले कदम पर सिखाती है: मत मारो। क्योंकि तुममें क्षमा नहीं किया कृष्ण को, सातवें नर्क में डाला है। और सब | मारने की बड़ी आकांक्षा है: दूसरे को विनष्ट करने की बड़ी पापी तो छूट जाएंगे; लेकिन कृष्ण अंततः जब यह सृष्टि पूरी | आकांक्षा है। अभी तुम्हें यह तो दिखायी पड़ना संभव न हो समाप्त होगी तब छूटेंगे। | सकेगा कि दूसरे में परमात्मा है। पहले मारने से रुको, ताकि बात तर्कपूर्ण है: क्योंकि और पापियों ने पाप किये हों, लेकिन परमात्मा दिखायी पड़ जाए। फिर दिखायी पड़ गया परमात्मा, पाप को दर्शन-शास्त्र तो नहीं बनाया। और पापियों ने हिंसा की फिर कृष्ण कहते हैं, अब क्या फिकिर! अब अगर परमात्मा की हो, लेकिन अपराध का भाव तो उनके भीतर था ही कि हम गलत मर्जी हो तो मारो! क्योंकि अब तुम जानते हो कि मारने से भी कर रहे हैं। कृष्ण ने तो गलत को सही है, ऐसा सिद्ध किया। | कोई मरता नहीं। यह अहिंसा का आखिरी कदम हुआ। गलत को दर्शन दिया। गलत को शास्त्र बनाया। तो साधारण | लेकिन, पहले स्वयं के भीतर प्रतीति सघन होनी चाहिए। पापियों को तो ठीक है कि आज नहीं कल उनका दंड पूरा हो | जिसने स्वयं को जाना उसने सबको जान लिया। जो उस एक को जाएगा। इस आदमी को कितना दंड दें? इसने तो अपराध का | जानने से चूक गया, वह सब जानने से चूक गया। भाव ही हटा दिया। अपराध का भाव हो तो आदमी रूपांतरित पछा है, 'कल आपने कहा आंख आक्रामक होती है....।' होता है। हिंसा हो गयी, दुखी होता है; पश्चात्ताप करता है; आंख क्या आक्रामक होगी? तुम आक्रामक हो, इसलिए व्रत-नियम लेता है। अपने कर्मों को धोने-पोंछने की, निर्जरा की आंख भी आक्रामक हो जाती है। यह तो पहला पाठ तुम्हें दिया चिंता करता है; शुभ कर्म करता है कि अशुभ हो गया है, अब कि आंख की बजाय तुम कान की तरफ झुको। इसको तुम इसको किसी तरह तराजू को बराबर करो, संतुलन करो; जीवन शाब्दिक अर्थों में मत लेना। इसका कुल इतना ही प्रतीक-अर्थ है में हिसाब की व्यवस्था बिठाता है: आज गलती हो गयी कलन | कि तुम सक्रियता से निष्क्रियता की तरफ झुको; करने की बजाय हो, इसका निर्णय लेता है। | न करने की तरफ झको: बाहर दौडने की बजाय भीतर उतरो: | कष्ण ने तो समझा दिया की गलती है ही नहीं. हो ही नहीं परुष न होकर स्त्री बनो. ग्राहक बनो. आक्रामक नहीं। तम सकती। 'न हन्यते हन्यमाने शरीरे।' मारने से भी कहीं शरीर | इससे यह मतलब मत समझ लेना कि आंखें फोड़ लो, कि आंखें मरता है? न आग में जलाने से जलता, न शस्त्रों से छेदने से | बंद कर लो, कि अब तो कान से ही जीएंगे। छिदता। 'नैनं छिंदंति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः।' यह तो केवल प्रतीक था। कान के लिए जो मैंने समझाया, वह तो यह तो हिंसा के लिए है। इससे बड़ा और प्रबल समर्थन तो केवल प्रतीक था। अगर तुम्हारी समझ में आ जाए तो फिर क्या होगा? ऐसा जैनों ने समझा। चूक गये! क्योंकि वे महावीर तुम्हारी आंख भी कान-जैसी ही हो जाएगी; तुम्हारे हाथ भी को भी नहीं समझे, तो कृष्ण को कैसे समझेंगे? महावीर को कान-जैसे हो जाएंगे। यह तो इंद्रियां हैं। तुम्हारे हाथ में मैं समझा होता, तो कृष्ण महावीर का ही अंतिम चरण हैं; महावीर तलवार दे दूं; तलवार थोड़े ही कुछ करती है, तुम पर निर्भर है। ने जो कहा, उसकी ही निष्पत्ति हैं, उसका ही परम रूप हैं। तुम चाहो तो किसी स्त्री के साथ बलात्कार कर सकते हो इस महावीर ने कहा, मत मारो, क्योंकि दूसरे में भी तुम्हारे जैसी ही तलवार के कारण; और तुम चाहो तो कोई किसी स्त्री के साथ चेतना विराजमान है। यह पहला कदम हुआ शिक्षा काः मत बलात्कार करने जा रहा हो, तो तुम उस तलवार के कारण मारो, क्योंकि दूसरे में भी तुम्हारे जैसी ही चेतना विराजमान है। बलात्कार को रोक सकते हो। तलवार क्या करेगी! मैंने तुम्हें जब तुम इसमें निष्णात हो गये, तब दूसरा कदम उठता है, | माचिस दे दी; तुम चाहो तो दीया जला लो, अंधेरे में रोशनी हो आखिरी शिक्षा आती है, चरम शिक्षा आती है, कि अब अगर जाए। तुम्हारे रास्ते पर ही नहीं, दूसरों के रास्ते पर दीया जला तुम मारना चाहो, तो मारो, लेकिन तुम मारनेवाले मत बनना। दो; उनके रास्ते पर भी रोशनी हो जाए। और तुम चाहो तो घर में अगर परमात्मा की मर्जी हो तो तुम निमित्त हो जाओ। क्योंकि आग लगा दो किसी के। माचिस में थोड़े ही कछ है। माचिस ने 28 Jan Education International 2010_03
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________________ NEPAL श्री यात्रा का प्रारंभ अपने ही घर से - थोड़े ही कहा है कि किसी के घर में आग लगाओ, कि दीया इतने लोग, कोई उसके सामने से निकल जाता है; कोई गलत, जलाओ! तुम पर निर्भर है। नियम तोड़ देता है; कोई उसको पीछे छोड़ देता है; कोई उसके आंख भी अनाक्रामक हो सकती है—तुम अगर अनाक्रामक आगे है, वह हार्न बजाए जा रहा है और वह हटता ही नहीं है! हो। और कान भी आक्रामक हो सकता है। मेरे एक मित्र हैं। वे कहते हैं कि मैंने इसीलिए खुद कार मैंने सुना, मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उस पर बड़ी नाराज हो चलानी छोड़ दी, क्योंकि उसमें गाली देना बिलकुल जरूरी है। रही थी। और चिल्ला रही थी कि बहुत हो गया; अब मेरे उससे बचा ही नहीं जा सकता। मछली मारने का काम भी ऐसा बर्दाश्त के बाहर है। अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकती। | ही है। घंटों बैठे हैं और मछली पकड़ में नहीं आती, क्या करो! मुल्ला ने कहा हद्द हो गयी! मैं कुछ बोला ही नहीं हूं। मैं सिर्फ | या कभी-कभी मछली फंस भी जाती है और तुम खींच ही रहे थे चुप बैठा हूं! उसने कहा वह मुझे मालूम है। लेकिन तुम इस ढंग कि छूट गयी। कभी तो ऐसा हो जाता है, हाथ में भी आ गयी से चप बैठे हो कि अब बर्दाश्त के बाहर है। | और छलांग लगा गयी। तो मछुए भी गाली देने लगते हैं। चुप बैठना भी बर्दाश्त के बाहर हो सकता है। ढंग पर निर्भर यह फोसदिक अपने मित्र के साथ मछली मारने गया। और है। तुम्हारी खामोशी में भी हिंसा हो सकती है। तुम इसलिए चुप उस मित्र ने लौटकर अपनी पत्नी से कहा कि आज एक बड़ी बैठ सकते हो कि तुम इतनी गहन हिंसा से भरे हो कि अब तुम हैरानी की बात देखी। जब फोसदिक ने एक कुछ कहना भी नहीं चाहते। लेकिन तुम्हारी चुप्पी में भी गाली हो | घंटों की मेहनत के बाद, तो वह बड़ा खुश था; लेकिन जैसे ही सकती है। गाली के लिए बोलना ही थोड़े ही जरूरी है, बिना | उसने हाथ में उठायी वह छलांग लगा गयी और नाव के बाहर बोले गाली हो सकती है। तुम्हारे उठने-बैठने के ढंग में गाली हो | कूद गयी। तो मित्र ने कहा, मैं सोचता था कि अब तो इसके मुंह सकती है। तुम जिस ढंग से दूसरे को सुनते हो, उसमें गाली हो से कुछ अपशब्द निकलेगा, कोई गाली! लेकिन फोसदिक सकती है। बिलकल चुप रहा, कुछ भी नहीं बोला। मित्र ने अपनी पत्नी को तुमने देखा कभी? कोई आदमी घर आया। तुम सुनना नहीं कहा कि इतनी अपवित्र शांति मैंने कभी नहीं देखी। अपवित्र चाहते। तुम उसके सामने बैठकर ही जम्हाई लेते हो। तुम उससे | शांति! धर्मगुरु है, गाली दे नहीं सकता, अपशब्द बोल नहीं कुछ कहते नहीं। कहते तो तुम हो, बड़ी कृपा हुई, आए! कितने | सकता। लेकिन शांति भी अपवित्र हो सकती है। चुप रहने में भी | दिनों से आंखें तरस गयी थीं! कहते तो तुम यही हो। कहते तो | तीर हो सकते हैं, कांटे हो सकते हैं, जहर हो सकता है। तुम हो, अतिथि तो देवता है! और जम्हाई ले रहे हो। बार-बार तुम सभी जानते हो। चुप रहकर भी तुम चोट पहुंचा सकते घड़ी देख रहे हो। अब और क्या कहना है? कुछ सिर पर हो। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि बोलकर इतनी गहरी चोट हथौड़ा मारोगे तभी उसकी समझ में आएगा? कोई बोल रहा है, पहुंचायी ही नहीं जा सकती, जितनी चुप रहकर पहुंचायी जा | तुम बार-बार घड़ी देख रहे हो। तुम क्या कह रहे हो? शायद | सकती है। तुम्हें भी पता न हो। तुम बिना कहे कुछ कह रहे हो। तुम्हारे | तो जरूरी नहीं है कि तुम्हारा कान मैंने कह दिया कि बोलने में, तुम्हारे सुनने में, तुम्हारे उठने-बैठने में, न बोलने में, | अनाक्रामक है, तो हो। तुम पर निर्भर है। यह तो प्रतीक था। | चुप रहने में सब तरफ से हिंसा हो सकती है। सुनने और देखने में भेद है। कान सुनता है, ग्रहण करता है। मैने सुना है, अमरीका का एक बड़ा धार्मिक उपदेशक है, | आंख जाती है, छूती है, खोजती है। बस इतना प्रतीक था। तुम डाक्टर फोसदिक। उसके संबंध में एक मित्र किसी को कह रहा | कान-जैसे बनना। तुम्हारी आंख भी कान-जैसी बन जाए। वह था कि हम दोनों साथ-साथ मछली मारने गये। अब कुछ भी ग्राहक हो। वह इस परम सौंदर्य को, जो चारों तरफ फैला है, मामला ऐसा है...मछली मारनेवाले या कार चलानेवाले, कुछ | इसे पीए। इसे उघाड़े न, बलात्कार न करे! व्यभिचार न करे, काम ऐसे हैं कि वह गाली देना सीख ही जाते हैं। कार चोट न करे! बस इतनी बात थी। चलानेवाला गाली न दे, बड़ा मुश्किल! क्रोध आ ही जाता है। यह हो सकता है। लेकिन यह होगा तुम्हारे रूपांतरण से। 291 2010_03
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________________ जिन सूत्र भाग : 2 तीसरा प्रश्न : 'रसो वै सः' के संदर्भ में बताएं कि क्या स्वाद बिस्तर बिछाओ, तो उसी को देखना। जागना भी उसी में; जब को भी परमात्म-अनुभूति का साधन बनाया जा सकता है? आंख खोलो, तो उसी को देखना। यही तो अर्थ था प्राचीन परंपराओं का कि लोग प्रभु का स्मरण करते सोते, राम-राम बनाए जाने का सवाल ही नहीं है। सभी अनुभव उसी के जपते हुए सोते। यह कोई जपने की बात नहीं है कि तुमने साधन हैं। स्वाद भी। राम-राम शब्द दोहरा दिया और सो गये। भाव दशा की। कि मैं तुम्हें अस्वाद नहीं सिखाता। मैं तुम्हें परम स्वाद सिखाता | राम का नाम ही जपते उठते। भाव दशा की! आंख खोलते तो हूं। आंख भी उसी को देखे। कान भी उसी को सुनें। हाथ उसी उसी को देखते; आंख बंद करते तो उसी को देखते। उसी में है को छुएं। रस उसी का ही तुम्हारी जिह्वा में उतरे, तुम्हारे कंठ के नींद, उसी में है जागृति। भोजन करते, तो भी उसी के पार जाए। तुम उसे ही खाओ और तुम उसे ही पीओ, और तुम नाम-स्मरण से करते; थोड़ा भोग पहले उसे लगा देते। पहले उसे ही बिछाओ और तुम उसे ही ओढ़ो। वही हो जाए तुम्हारा भोग, फिर भोजन; तो भोजन भी पवित्र हो गया। तो फिर भोजन सब कछ। तुम उसी में स्नान करो, तुम उसी में श्वास लो! तम | भी प्रार्थना हो गयी। उसी में चलो, उसी में बैठो; उसी में बोलो, उसी में सुनो! इसे तुम ऐसा समझो कि भूख लगे तुम्हें, तो भी जानना उसी को तुम्हारा सारा जीवन उसी से भर जाए। क्योंकि परमात्मा कोई भूख लगी तुम्हारे भीतर। सच भी यही है, वही भूखा होता है। खंड नहीं है कि तुम गये मंदिर, घंटा-भर परमात्मा को दे दिया वही जीता है। वही जन्मता है। वही विदा होता है। वही शरीर में और तेईस घंटे अपने लिए बचा लिये। यह तो धोखा है। ऐसे आया, वही शरीर से जाएगा। उसकी ही भूख, उसकी ही कहीं कुछ जीवन में क्रांति नहीं होती। यह तो तुमने हिसाब कर | प्यास। तो उठना-बैठना ही फिर पर्याप्त आराधना हो जाती है। लिया कि चलो एक घंटे परमात्मा को दे दें, दूसरी दुनिया भी आराधना ऐसी अनुस्यूत हो जाए जैसे श्वास। याद भी अलग से सम्हाल ली। यह दुनिया तो तेईस घंटे सम्हाल ही रहे हैं। कुछ न करनी पड़े, तो ही तुम परम मुक्ति के स्वाद को चख सकोगे। वह एक घंटा महंगा नहीं है। और उस एक घंटे भी तुम परमात्मा वह रसरूप है। इसलिए जहां भी रस मिले, उसी को समर्पण के मंदिर में हो कैसे सकते हो? जो आदमी तेईस घंटे परमात्मा कर देना। भोजन में रस आए, प्रसन्न होना कि प्रभु प्रसन्न हुआ, के विपरीत जी रहा हो, वह एक घंटे परमात्मा में जीएगा कैसे? उसे रस मिला। तम केवल साधन हो। तम्हारे माध्यम से उसने ऐसा समझो कि गंगा बस काशी में आकर पवित्र हो जाती आज फिर भोजन किया। तुम माध्यम हो। तुम्हारे माध्यम से हो—पहले अपवित्र, बाद में फिर अपवित्र-ऐसा कैसे होगा? आज उसने फिर बगीचे के फूलों की सुगंध ली। वही तो तुम्हारे गंगा तो सतत धारा है। अगर पहले पवित्र थी. तो ही काशी में भीतर चैतन्य होकर बैठा है। तुम तो मिट्टी के दीये हो; ज्योति तो पवित्र हो सकेगी। और काशी में पवित्र है, तो आगे भी पवित्र ही उसकी है। सब अनुभव उसके हैं। रहेगी। शृंखला है, सातत्य है, सिलसिला है। ऐसा जो व्यक्ति भाव में निमज्जित होने लगे और सब भांति तो ऐसा थोड़े ही है कि तुम मंदिर के द्वार पर आए, बाहर तो | अपने को परमात्मा में गूंथ ले-इसी को महावीर ने कहा, सुई पवित्र नहीं थे; भीतर गये, घंटा बजाया–पवित्र हो गये, प्रार्थना | गिर जाए, बिना धागा-पिरोयी, तो खो जाती है। धागा-पिरोयी कर ली! फिर बाहर आए, फिर चोगा बदल लिया, फिर पवित्र | सुई गिर भी जाए तो नहीं खोती। ऐसा निमज्जित हुआ व्यक्ति हो गए, फिर अपवित्र हो गये, फिर बैठ गये अपनी दुकान पर, | | अगर भटक भी जाए तो नहीं भटकता। क्योंकि ऐसे व्यक्ति के फिर वही करने लगे जो कल तक करते थे। उस मंदिर में जाने ने भटकने का उपाय ही न रहा। यह भटकाव भी उसी का है। अगर तुम्हारे जीवन में कोई रूपांतरण न किया। ऐसे व्यक्ति की नाव मझधार में भी डूब जाए तो उसे चिंता नहीं नहीं. धर्म तो चौबीस घंटे की बात है। तब तो बडी कठिनाई होती। मझधार भी उसी की है। ऐसे व्यक्ति को कोई चिंता होती है। चौबीस घंटे अगर धर्म में जीना हो, तो तुम कहोगे बड़ा ही नहीं। सभी कुछ उसी का है! इस समर्पण-भाव से तुम्हें सब मुश्किल है! इसलिए मैं कहता हूं कि सोना भी उसी में। जब जगह उसी का रस आने लगेगा। 130 2010_03
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________________ यात्रा का प्रारंभ अपने ही घर से ऋग्वेद में वचन है : 'केवलाघो भवति केवलादि।' अकेले शराब में भी सौंदर्य आ गया। मत खाना, बांटकर खाना। अकेले खाने में पाप है। खाने में पाप पाप भी पुण्य हो सकता है। पुण्य भी पाप हो सकता है। नहीं। अन्न तो ब्रह्म है। लेकिन अकेले खाने में पाप है। छीनकर जीवन बड़ा जटिल है। जीवन गणित जैसा नहीं है। अगर तुमने खाने में पाप है। चुराकर खाने में पाप है। बांटकर खाना। गणित की तरह पकड़ा तो तुम चूक जाओगे। तो कभी-कभी तुम साझेदार बनाकर खाना। फिर पाप खो गया। पुण्य भी कर सकते हो और वह पाप हो। और कभी-कभी तुम जितना तुम बांट सको, जो भी तुम्हारे पास है, उसे तुम | पाप भी कर सकते हो और पुण्य हो जाए। अहर्निश बांटो। गा सकते हो, तो गाओ-गीत बांटो। नाच | मैंने उनसे कहा, पुण्य हो गया। आप बुलाकर पीते हैं, अकेले सकते हो, तो नाचो-नाच बांटो। जो भी तुम्हारे पास है, उसे नहीं पी सकते, छिपकर नहीं पी सकते–बस, ठीक है। फैलते बांटो। बस पुण्य हो जाएगा। बांटने में पुण्य है। रोक लेने में हैं-शुभ है। आज यह शराब पीकर फैल रहे हैं, कल और बड़ी पाप है। | शराब पीकर भी फैलेंगे। फैलना तो जारी है। सागर की तरफ यह बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र है। नदी ठहर जाए तो पाप है। नदी चल तो रहे हैं। ठहरकर डबरा बन जाए तो पाप है। बहती रहे, सागर की तरफ यह ऋग्वेद का सूत्र : 'केवलाघो भवति केवलादि'-वही उंडलती रहे, सागर में जाकर उतरती रहे-फिर पाप नहीं। पापमय है भोजन, जो अकेले कर लिया जाए, बांटा न जाए। जो तुम्हारे जीवन में बहाव रहे! भोजन करो, लेकिन...तुमने भी हो तुम्हारे पास–भोजन की ही बात नहीं है—जो भी रसपूर्ण खयाल किया, पशुओं को देखा, पशु जब भी भोजन करते हैं तो हो, जो भी आनंदपूर्ण हो, उसे छिपाकर मत बैठना। प्रकाश उठाकर भोजन अकेले में भाग जाते हैं। बांट नहीं सकते, | तुम्हारे भीतर जगे तो उसे ढांक मत लेना। भयभीत हैं। दूसरा दुश्मन है! आदमी अकेला प्राणी है संसार | जीसस ने कहा है अपने शिष्यों को कि जब तुम्हारे भीतर में, जो दूसरे को निमंत्रण देकर भोजन करता है। बुला लाता है। परमात्मा का स्वर गूंजे, तो चढ़ जाना छप्पर पर, जितने जोर से मेरे एक प्रोफेसर थे। बहुत प्यारे आदमी थे! दुर्गुण एक चिल्ला सको, चिल्लाना; ताकि जो गहरी नींद में सोए हैं, वे भी था-शराबी थे। मैं उनके घर एक बार मेहमान हुआ। था सुन लें, वे भी वंचित न रह जाएं। उनका विद्यार्थी में, लेकिन उनका बड़ा सम्मान मेरे प्रति था। वे तो जो तुम्हारे पास हो, उसे बांटना, फैलाना! बड़े बेचैन हुए कि वे शराब कैसे पीएंगे; अब ये कुछ दिन मैं संस्कृत का शब्द 'ब्रह्म' बड़ा प्रीतिकर है! इसका अर्थ होता उनके घर रहूंगा। मैंने उन्हें कुछ बेचैन देखा। मैंने पूछा कि है जो फैलता ही चला जाता है; जो विस्तीर्ण ही होता चला मामला क्या है? आप कुछ बेचैन मालूम होते हैं। उन्होंने कहा जाता है। आधुनिक विज्ञान ने ब्रह्म शब्द को बड़ा नया अर्थ दे कि तुमसे छुपाना क्या! मुझे शराब पीने की आदत है। तो मैंने | दिया है। आइंस्टीन के पहले तक ऐसा समझा जाता था कि कहा, आप पी सकते हैं। इसमें परेशान होने की क्या बात है? | संसार कितना ही बड़ा हो, फिर भी इसकी सीमा तो होगी ही। उन्होंने कहा कि परेशान होने की बात है कि मैं अकेला नहीं पी हम न पा सकते हों सीमा, हमारी सामर्थ्य न हो, हमारे साधन सकता। दो-चार-दस को बुलाता है, तब पी सकता हूं। वह सीमित हों, पर फिर भी कहीं इसकी सीमा तो होगी ही। यह बात हुल्लड़ मचेगी, तुम्हें अच्छा न लगेगा। खयाल में थी। और यह भी बात खयाल में थी कि यह संसार मैंने कहा, फिर शराब पाप न रही, फिर पुण्य हो गयी। मैं भी जैसा है, बस वैसा ही है। अब इसमें नया क्या हो सकता है! बैलूंगा और मजा लूंगा। पी तो नहीं सकता, क्योंकि मैंने कोई नया आएगा कहां से? संसार के बाहर तो कुछ और है नहीं। तो और शराब पी ली है और अब कोई शराब उसके ऊपर नहीं हो जो है, है। इसी में रूपांतरण होता रहता है, रूप बदलते रहते हैं। सकती। लेकिन बैलूंगा। यह तो पुण्य हो गया, यह तो प्रार्थना हो | नदी का जल सागर में गिर जाता है। सागर का जल बादलों में गयी कि आप लोगों को बुलाकर पीते हैं। यह तो मुझे अत्यंत उठ जाता है। बादलों का जल नदी में गिर जाता है। लेकिन जल खुशी की बात मालूम पड़ी कि आप अकेले नहीं पी सकते। तो तो घूमता रहता है-वही का वही है। 31 2010_03
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________________ जिन सूत्र भागः2 फिर आइंस्टीन की खोजों ने एक बड़ा अनठा आयाम खोला। उतना पाओगे मिलने लगा। और कुछ भी पाप नहीं है, रोक लेना वह आयाम यह था कि संसार जैसा है वैसा ही नहीं है, विस्तीर्ण | पाप है। हो रहा है। ‘एक्सपैंडिंग यूनिवर्स।' फैलता जा रहा है। बड़ी अर्थशास्त्री कहते हैं कि रुपया जितना चले उतना समाज संपन्न तीव्र गति से फैल रहा है! जैसे कोई छोटा बच्चा अपने गुब्बारे में होता है। इसीलिए तो रुपये को ‘करेंसी' कहते हैं। 'करेंसी' हवा भर रहा हो और गुब्बारा बड़ा होता जा रहा हो! तब ब्रह्म का मतलब, जो चलता रहे, भ्रमण करता रहे। अब समझ लो शब्द के नये अर्थ उभरकर आए। कि दस आदमी हैं गांव में और दसों के पास दस रुपये हैं, वे दसों ब्रह्म शब्द का अर्थ होता है : 'दि एक्सपैंडिंग वन।' वह जो अपने रुपयों को रखकर बैठ गये हैं, तो गांव में केवल दस रुपये फैलता ही जा रहा है। ब्रह्म का अर्थ है: विस्तीर्ण होता जा रहा हैं। फिर दसों अपने रुपयों को चलाते हैं। एक-दूसरे से सामान है। जो ठहरा नहीं है। जो कहीं ठहरता नहीं। जो किसी सीमा को खरीदते हैं। एक का रुपया दूसरे के पास जाता है, दूसरे का सीमा नहीं बनाता, जो हमेशा सीमा के ऊपर से बह जाता है। तीसरे के पास जाता है—दस रुपये के सौ हो जाते हैं, हजार हो अगर तुम्हें परमात्मा को जानना हो, तो छोटे पैमाने पर ही सही, जाते हैं। क्योंकि रुपया आता है, जाता है। पकड़े रहो, तो एक लेकिन तुम भी सीमा मत बनाना। फैलना, फैलते जाना! सुगंध ही रहता है। आता रहे, जाता रहे, तो अनेक हो जाते हैं। तुम हो तुम्हारे पास, बांटना हवाओं को! प्रकाश हो, बांट देना रास्तों गड़ाकर रख दो जमीन में, तो 'करेंसी' 'करेंसी' न रही, मर पर! बोध हो, दे देना दूसरों को! जो कुछ भी तुम्हारे पास गयी। इसीलिए तो कंजूस आदमी से अभागा आदमी दुनिया में हो...! दूसरा नहीं है। 'करेंसी' मार डालता है। चलने नहीं देता। और ऐसा तो कौन है मनुष्य जिसके पास कुछ भी न हो! ऐसा चलन को रोक देता है। नदी को बहने नहीं देता, डबरा बना लेता तो मनष्य है ही नहीं कोई कि जिसके पास कछ भी न हो। है। फिर डबरा सडता है। फिर डबरे में घास-पात गिरते हैं परमात्मा तो सभी के भीतर है, इसलिए कुछ न कुछ तो होगा। बदबू आती है। कृपण आदमी में बदबू आती है। खोजना। तुम अकारण नहीं हो सकते। तुम्हारे द्वारा उसने कोई इसीलिए तो दानी की इतनी महिमा रही है। दान को धर्म का | गीत गाना ही चाहा है। तम्हारे द्वारा उसने कोई नाच नाचना ही आधार कहा है: लोभ को पाप का। कारण, लोभ रोक लेता है। चाहा है। तुम्हारे द्वारा उसने कोई फूल खिलाना ही चाहा है। दान बांट देता है। दान से चीजें फैलती हैं। और जो बात बाहर व्यर्थ तुम नहीं हो सकते। तुम्हारी कोई नियति है। तुम्हारे भीतर की संपदा के संबंध में सही है, मैं तुमसे कहना चाहता हूं, भीतर छिपा हुआ कोई राज है। खोलो, खोजो! मेरे लिए धर्म उसी की संपदा के संबंध में और भी ज्यादा सही है। जब बाहर तक रहस्य को खोजने की कुंजी है। तुम तुम बनो! तुम्हारी नियति की संपदा रोक लेने से मर जाती है—मरी-मरायी संपदा भी रोक खुले, बिखरे, फैले। तुम्हारे जीवन में बाढ़ आए। लेने से मर जाती है-जब बाहर की संपदा चलाने से इसी को तो महावीर ने कहा कि मुनि जैसे-जैसे उस अश्रुतपूर्व मरी-मरायी संपदा भी जीवित मालूम होने लगती है, तो भीतर की को सुनता, जानता; जैसे-जैसे अतिशय रस के अतिरेक से थोड़ी सोचो! वहां का धन तो जीवंत धन है। उसे रोका कि भरता, वैसे-वैसे प्रफुल्लित होता; वैसे-वैसे उत्साहित होता; गया! उसे चलने दो। चलन में रहने दो। 'करेंसी' बनाओ। वैसे-वैसे फल खिलने लगते हैं, कमल खिलने लगते हैं, एक ही पाप है मेरी दृष्टि में। और वह पाप है, जो तुम्हें मिला है पंखुड़ियां खुलने लगती हैं, कलियां फूल बनतीं। फैलो! कली भीतर, उस पर तुम सांप की तरह कुंडली मारकर बैठ गये हो, तो मत रह जाना। वही दुर्भाग्य है। पाप है। उसे बांटो! परमात्मा बांटने के नियम को मानता है, मेरे लिए अधार्मिक आदमी वही है, जो कली रह गया। फैलने के नियम को मानता है। तुम भी फैलो! धार्मिक वही है, जो फूल बन गया। फूलो! फैलो! कोई सीमा नहीं, स्वाद में कोई पाप नहीं; लेकिन स्वाद अकेले मत लेना। मत बांधो। बाढ़ बनो। और तुम जितना फैलोगे, तुम पाओगे बांटना। भोजन में कोई पाप नहीं है। उसी की भूख है! लेकिन उतनी ज्यादा फैलने की क्षमता आने लगी। तुम जितना बांटोगे, जो तुम्हारे पास हो उसे बांटकर खाना। इतना भर स्मरण रहे कि 132 Jair Education International 2010_03
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________________ यात्रा का प्रारंभ अपने ही घर से किसी भी चीज की मालकियत मत बनाना। आए हाथ में, चली | कभी-कभी तुम चौंककर पाओगे, कौन-कौन है? जाने देना। जैसी आयी, वैसी जाने देना, बहने देना। जहां तुम जब सुरति बंधेगी, जब मेरा तुम्हारा धागा मिलेगा, तो मालिक बने, वहीं पाप शुरू हुआ। जब तक तुम मालिक नहीं | अचानक 'मैं' और 'तू' की आवाजें बंद हो जाएंगी। सुनने के हो, केवल संपदा को यहां से वहां जाने देने के माध्यम हो, किसी गहन क्षण में कभी-कभी क्षणभर को 'तारी' लग उपकरण हो, निमित्त मात्र हो-वहां तक परमात्मा तुम्हारे भीतर जाएगी। वह क्षणभर की 'तारी' समाधि के अनुभव-जैसी है। खूब खिलेगा, खूब फैलेगा। तो एक ही सूत्र याद रखने जैसा है: क्षणभर का है—आएगा, जाएगा लेकिन स्वाद दे जाएगा। कृपण मत होना। बूंद एक गिर जाएगी अमृत की। फिर तुम तड़पोगे। फिर तुम वही न हो सकोगे जो तुम थे कल तक। तम किसी को समझा भी चौथा प्रश्न : पिछले दिन आपका प्रवचन सुनते हुए आपकी न सकोगे कि क्या हो गया है। बताने का भी कोई उपाय न आवाज से हृदय और कर्ण-तंतुओं पर एक अजीब तरह का | पाओगे। बेबूझ होगी घटना। लेकिन इतनी गहन होगी कि उसे कंपन हुआ और तब से साधारण ध्वनियां भी अजीब कंपन | तुम इनकार भी न कर सकोगे। और आनंद की लहर पैदा कर रही हैं। कृपया बताएं कि क्या | / इधर मैं बोल रहा हूं, तो तुम्हें कुछ समझाने को नहीं। इस बुद्धपुरुषों के स्वर में कुछ है, जो विशेष प्रभाव पैदा करता है? खयाल में पड़ना ही मत। यहां मैं बोल रहा हूं तुम्हें कुछ समझाने साथ ही आपकी उपस्थिति में एक विशेष आनंददायक गंध को नहीं। यहां मैं बोल रहा हूं कि बोलने के माध्यम से मेरा और मिलती है; और वह कभी आश्रम में और कभी ध्यान के समय तुम्हारा तालमेल किसी क्षण बैठ जाए। कब बैठ जाए, कोई भी मिलती है। इस संदर्भ में भी बताएं कि क्या काल या जानता नहीं। कब किसका बैठ जाए, कोई जानता नहीं। कब समय-विशेष की विशेष गंध भी होती है? | किसकी घड़ी आ जाए, कोई जानता नहीं। मगर सुनते-सुनते...इसीलिए तो रोज बोले चला जाता हूं। अगर सुनोगे यदि, तो कुछ निश्चित कंपेगा हृदय में। जगह दोगे मुझे कुछ समझाना होता, तो बात खतम हो जाती। यह बात खतम भीतर आने की थोड़ी; राह में न अड़कर खड़े हो जाओगे; | होनेवाली नहीं है, क्योंकि समझाने से इसका कोई संबंध नहीं है। द्वार-दरवाजा बंद न करोगे, खोलोगे; तो हवाएं आएंगी, सूरज यह बात चलती रहेगी। क्योंकि इसका प्रयोजन कुछ और ही है। की रोशनी आएगी, भीतर कछ होगा। अगर तमने मझे जगह दी, इसका प्रयोजन रासायनिक है, बौ तो जो मेरे भीतर हुआ है, उसके कंपन तुम तक पहुंचेंगे। 'अल्केमिकल' है। इसका प्रयोजन है कि सुनते-सुनते, , यही तो सत्संग का अर्थ है। यही तो सारा प्रयोजन है कि मैं सुनते-सुनते, कभी-कभी एक क्षण को तुम अपने को भूल यहां हूं और तुम यहां हो। यही तो प्रयोजन है कि किसी भांति मेरे जाओगे। सुनने में लवलीन हो जाओगे, तल्लीन हो जाओगे, हृदय और तुम्हारे हृदय की लयबद्धता बंध जाए। किसी भांति, | तन्मय हो जाओगे; एक क्षण को तुम भूल जाओगे, वह जो जिस लय से, जिस तरंग से मैं जी रहा हूं, उस तरंग का तुम्हें भी अहंकार तुम चौबीस घंटे पकड़े रखते हो, एक क्षण को तुम्हारे थोड़ा-सा स्वाद आ जाए, अनुभव आ जाए। | हाथ से छूट जाएगा। किसी पंक्ति के काव्य में डूबकर, क्षणभर उपाय क्या है? को तुम छुटकारा पा जाओगे अपनी सहज अहंकार की व्यवस्था थोड़ी दूर मेरे साथ चलो। थोड़ी दूर मेरे साथ धड़को। थोड़ी दूर से। उसी क्षण में मिलन हो जाएगा। उसी क्षण में तीर की तरह मैं मेरे साथ श्वास लो। जब तुम मुझे गौर से सुनोगे, तो तुम तुम्हारे हृदय में चुभ जाऊंगा। एक बूंद तुम पर बरस जाएगी। पाओगे, तुम वहां सुननेवाले नहीं रहे, मैं यहां बोलनेवाला नहीं मेघ तो दूर हैं, लेकिन एक बूंद बरस जाए, तो फिर चातक रहा, दोनों की सीमा-रेखाएं कहीं घुल-मिल गयीं। कभी-कभी | प्रतीक्षा कर सकता है जन्मों-जन्मों तक। फिर कोई अड़चन नहीं तुम पाओगे, तुम यहां बोलनेवाले होकर बैठ गये, मैं वहां | है। फिर चातक जानता है कि होता है सत्य होता है प्रेम होती सुननेवाला होकर बैठ गया। है प्रार्थना; होते हैं ऐसे क्षण जिनको परमात्मा के कहने के 33 2010_03
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________________ जिन सूत्र भाग: 2 अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं कि है परमात्मा! कि कहीं पैदा हुई, वह तरंग तुम्हारी है। इसलिए मेरे सुनने से तुम उसको ऐसी घड़ी आती है जीवन में, जब हजार-हजार सूरज प्रगट हो बांध मत लेना। वह तरंग तो तुम्हारी है। मेरा बोलना तो जाते हैं। हजार-हजार नीलकमल तुम्हारे प्राणों में खिल जाते हैं। निमित्त-मात्र था। मेरे बोलने की संगति में तुम अपने ही भीतर के बोलता हूं; इस बोलने का प्रयोजन ऐसे ही है जैसे कोई किसी छिपे हुए तल से परिचित हुए हो। लेकिन परिचित तुम संगीतज्ञ वीणा को बजाए। तो कुछ समझाने को नहीं बजाता। | अपने ही भीतर के तल से हुए हो। मेरे प्रकाश में जो तुमने देखा तुम मुझे एक वीणावादक की तरह याद रखना। यह बोलना मेरी है, वह तुम्हारा ही है; वह मेरा नहीं है। रोशनी मेरी होगी, लेकिन वीणा है। यह जो मैं तुमसे कह रहा हूं, कह कम रहा हूं, गा ज्यादा जो खजाना तुमने खोज लिया है वह तुम्हारा ही है। रहा हूं। इसका प्रयोजन तुम्हारी समझ में आ जाए, तो बस काफी इसलिए तुम यह मत सोचना कि वह, यहां मुझे सुनना तुमने है। वह प्रयोजन इतना ही है, इस वाद्य को सुनते-सुनते...जैसे | बंद किया कि खो जाएगा। जो इस तरह हो कि मेरे सुनने से पैदा वीणा को सुनते-सुनते कभी-कभी ‘तारी' लग जाती है। डोलने | हो और बाहर जाते ही खो जाए, तो समझना कि तुमने सुना ही लगता है आदमी। कुछ भीतर कंपने लगता है। कोई पत्थर जैसी नहीं। वह बौद्धिक था। वह सिर की खुजलाहट थी। सुन चीज भीतर पिघलने लगती है, बहने लगती है। एक क्षण को लिया, अच्छा लगा, मनोरंजन हुआ, लेकिन तुम कहीं हिले. एक झरोखा खुलता, एक वातायन खुलता, आकाश दिखायी नहीं। तुम्हारी नींव का कोई पत्थर न सरका। तुम्हारे भीतर कोई पड़ जाता है। जैसे बिजली कौंध गयी। अंधेरा खो गया—एक नये का उदघाटन न हुआ, कोई नये का आविष्कार न हुआ। तो क्षण को सही-लेकिन फिर तुम जानते हो कि प्रकाश है, और थोड़ी-सी शब्दों की, सूचनाओं की, तथ्यों की संपदा बढ़ तुम यह भी जानते हो कि राह है। एक क्षण को दिखी थी बिजली जाएगी, उधारी थोड़ी और तुम्हारी बढ़ जाएगी। तुम और उधार की कौंध में, लेकिन दिख गयी। अब तुम्हें कोई यह नहीं कह हो गये, तुम्हारा नगद होना और भी ढंक गया। इससे कुछ लाभ सकता कि राह नहीं है, और तुम्हें कोई यह नहीं कह सकता कि न होगा। तुम ज्ञानी बन जाओगे, पंडित बन जाओगे, लेकिन प्रकाश सब कल्पना है, कि प्रकाश सब सपना है। अब तुम्हें इससे धर्म का जन्म न होगा। कोई भी झुठला न सकेगा। यह है प्रयोजन। अगर सच में तुमने सुना, ऐसी गहनता से सुना कि तुम्हारा पूरा तो ऐसा हो सकता है, सनते-सनते एक कंपन हो गया हो। हो | व्यक्तित्व जैसे कान हो गया_आंख भी कान. हाथ भी कान. जाए कंपन, तो एकदम खो भी न जाएगा, क्योंकि इतना गहरा हृदय भी कान-जैसे तुम सिर्फ एक द्वार हो गये, और तुमने मुझे घटता है! फिर तुम चले भी जाओगे उठकर यहां से, तो कंपन आने दिया—तुम्हारे ऊपर निर्भर है कि कितना मुझे आने जारी रहेगा। और तब उन कंपती हुई नयी तरंगों के आधार से दोगे—अगर तुम मुझे पूरा आने दो तो तरंगें नहीं, अंधड़ उठ जब तम वक्षों को देखोगे, तो उनकी हरियाली और ही होगी! जाएंगे। अगर तुम मुझे पूरा आने दो तो तूफान उठ जाएंगे। अगर उन्हीं फूलों को जिन्हें कल भी देखा था, फिर देखोगे, तुम पाओगे | तुम मुझे पूरा आ जाने दो, हिम्मत करके तुम पूरे द्वार-दरवाजे उन फूलों की कोमलता और ही है! कोई दिव्य आभा उन्हें घेरे खोल दो और कहो कि आओ, राजी हूं-इसी को तो मैं संन्यास है। हरियाली के चारों तरफ कोई आभामंडल वृक्षों को घेरे है। कहता हूं, इसी को तो मैं दीक्षा कहता हूं तो तुम फिर दुबारा उन्हीं लोगों को देखोगे, अपनी पत्नी को घर जाकर देखोगे और वही न हो सकोगे। एक नये जीवन का प्रारंभ हुआ। फिर तो मुझे पाओगे, वह तुम्हारी पत्नी ही नहीं, उसमें परमात्मा भी है। अपने बोलने की भी जरूरत न होगी। अगर तुम राजी हो और खुले हो, पति को घर जाकर देखोगे, तो पति होना गौण हो जाएगा, उसका तो मेरी चुप्पी भी तुम्हें कंपाएगी। क्योंकि असली में मेरा सवाल परमात्मा होना प्रमुख हो जाएगा। अपने बेटे को देखोगे, तो बेटा | ही नहीं है। ही नहीं रह जाएगा। मेरी खामोशी-ए-दिल पर न जाओ इस नये अनुभव के आधार पर तुम्हारे जीवन की सारी संरचना कि इसमें रूह की आवाज भी है | में क्रांति होने लगेगी। क्योंकि जो तरंग तुम्हारे भीतर मुझे सुनकर बोलता हूं, या चुप हूं, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। बोलूं तो 2010_03
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________________ यात्रा का प्रारंभ अपने ही घर से रूह की आवाज है, न बोलूं तो रूह की आवाज है। कल भी-मैं कहूंगा। तुम जब सुनने में तत्पर हो जाओगे, जब तुम सुनने में कुशल | कवि के ये शब्द बड़े गहन हैं। हो जाओगे, तो तुम मेरी चुप्पी को भी सुन सकोगे, मेरे मौन को | परमात्मा जब उतरता है, छिपाना मुश्किल। परमात्मा जब भी सुन सकोगे। उतरता है, तो उसे प्रगट होने देने से रोकना मुश्किल। परमात्मा मेरी खामोशी-ए-दिल पर न जाओ जब उतरता है, तो प्रगट होगा ही। कि इसमें रूह की आवाज भी है एक मचिया है, सूखी घास-फूस की मेरा यह भाव-यंत्र आज तुम शब्द न दो, न दो चाहे वह मेरी असमर्थता से बंधा हो कल भी मैं कहूंगा मेरा तो नहीं है यह तुम पर्वत हो अभ्रभेदी शिलाखंडों के गरिष्ठपुंज उसमें छिपेगा नहीं औघड़ तुम्हारा दान चांपे इस निर्झर को रहो, रहो साध्य नहीं मुझसे, किसी से चाहे सधा हो तुम्हारे रंध्र-रंध्र से आज नहीं तुम्हीं को रस देता हुआ कल सही, फूटकर-मैं बहूंगा चाहूं भी तो कब तक छाती में दबाए तुम्हीं ने धमनी में बांधा है लहू का वेग यह आग-मैं रहूंगा यह मैं अनुक्षण जानता हूं आज तुम शब्द न दो, न दो गीत जहां सब कछ है, तुम धति-पारमिता कल भी–मैं कहूंगा। जीवन के सहज छंद जिसके जीवन में परमात्मा उतरा है, उसे खोजना ही पड़ेगा तुम्हें पहचानता हूं संवाद का कोई उपाय। उसे शब्द खोजने ही पड़ेंगे, क्योंकि उसे मांगो तुम चाहो जोः मांगोगे, दूंगा बांटना पड़ेगा। उसे साझीदार बनाने ही होंगे। तुम दोगे जो-मैं सहूंगा यहां मैं बोले चला जा रहा हूं, सिर्फ इसीलिए कि तुम साझीदार आज नहीं बनो। निमंत्रण है मेरा कि जो मुझे हुआ है, चाहो तो तुम्हें भी हो कल सही, सकता है। आग यहां लगी है, एक चिनगारी भी तुम ले लो तो कल नहीं तुम्हारे भी सूर्य प्रज्वलित हो जाएं। दीया यहां जला है, तुम जरा युग-युग बाद ही मेरे पास आ जाओ, या मुझे पास आ जाने दो, तो तुम्हारा दीया मेरा तो नहीं है यह भी जल जाए। जलते ही मेरा न रह जाएगा। जलते ही तुम चाहे वह मेरी असमर्थता से बंधा हो पाओगे तुम्हारा ही था, सदा से तुम्हारा था। मेरा यह भाव-यंत्र? और पूछा है कि आपकी उपस्थिति में एक विशेष आनंददायक एक मचिया है सूखी घास-फूस की गंध मिलती है और कभी आश्रम में, कभी ध्यान के समय में भी उसमें छिपेगा नहीं औघड़ तुम्हारा दान मिलती है। वह गंध भी तुम्हारी ही है। कस्तूरी कुंडल बसै। साध्य नहीं मुझसे, किसी से चाहे सधा हो इसमें मेरी चेष्टा इतनी ही है कि तुम्हें तुम्हारी तरफ उन्मुख कर दूं, आज नहीं कल सही, कि तुम्हें धक्का दे दूं तुम्हारी तरफ। कहां भागे फिरते हो? कहां चाहूं भी तो कब तक छाती में दबाए ढूंढ़ते हो कस्तूरी? तुम्हारी ही नाभि में छिपी है। हां, कभी-कभी यह आग-मैं रहूंगा? मुझे सुनते-सुनते तुम्हें गंध आ जाएगी। तुम सोचोगे, मेरी है। आज तुम शब्द न दो, न दो तुम्हारी है! तुम शांत हो गये सुनते-सुनते, थिर हो गये 135 2010_03
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________________ जिन सूत्र भाग: 2 - - सुनते-सुनते, सुनते-सुनते तन्मयता जगी, उस तन्मयता में हां, मेरी निकटता में तुम्हें कुछ दिखायी पड़ सकता है। तो न तम्हारी ही गंध ने तुम्हें छ लिया और भर दिया। इसीलिए तो तो इस दर्पण की पूजा करना। क्योंकि तुम सोचोगे, यह गंध इसी कभी ध्यान में भी उठेगी। अगर मेरी होती तो तुम्हारे ध्यान में दर्पण से उठी; यह स्वाद इसी दर्पण से आया। इस दर्पण की कैसे उठती! पूजा में मत पड़ना। और न नाराज होकर इस दर्पण को मेरा कुछ लेना-देना नहीं। मैं तो दर्पण हूं, तुम अपने को ही | तोड़-फोड़ देना। इन दोनों से बचना। देख लो। दर्पण से ज्यादा नहीं। पर उतना ही प्रयोजन है। मैं यहां नहीं हूं। दर्पण कुछ होता थोड़े ही है, दर्पण तो एक खालीपन है। आखिरी सवाल: आपने कहा कि संन्यास सत्य का बोध है। तुम हटे कि दर्पण खाली। तुम आए कि दर्पण भरा लगता है। फिर क्या संन्यास के लिए गैरिक वस्त्र और माला भी अनिवार्य सुना है मैंने, मुल्ला नसरुद्दीन एक राह से गुजरता था। एक हैं? और क्या कोई व्यक्ति बिना दीक्षा लिए आपके बताए मार्ग दर्पण पड़ा मिल गया। उठाकर देखा। कभी दर्पण इसके पहले पर नहीं चल सकता है? कृपाकर मार्गदर्शन करें। उसने देखा न था। सोचा, अरे! तस्वीर तो मेरे पिताजी की मालूम पड़ती है। मगर जवानी की होगी। हद्द हो गयी! मैंने मार्गदर्शन के बिना भी चलो न! मार्गदर्शन की क्या जरूरतकभी सोचा भी न था कि मेरे पिताजी और तस्वीर उतरवाएंगे! है? जब दीक्षा के बिना चल सकते हो...। दीक्षा और क्या है? ऐसे रंगीन तबीयत के तो आदमी न थे! मगर मिल गयी तो अत्यंत समीपता से लिया गया मार्गदर्शन है। बहुत पास से, अच्छा हुआ। झाड़-पोंछकर खीसे में रखकर घर चला आया। बहुत करीब से, बहुत पास से सुना गया मार्गदर्शन है। श्रद्धा से कहीं बच्चे, पत्नी फोड़-फाड़ न दें, खो-खवा न दें, ऊपर चढ़ सुना गया मार्गदर्शन है। दीक्षा और क्या है? गया, छप्पर में छिपाकर रख आया। लेकिन पत्नी से कभी कोई __मुझसे पूछते हो, मार्गदर्शन दें। तुम लेने को तैयार हो? वही पति कुछ छिपा पाया है ! पत्नी ने देखा, कुछ छिपा रहा है। रात लेने की तैयारी तो संन्यास की घोषणा है कि मैं तैयार हूं, आप दें। जब मुल्ला सो गया तो वह उठी, दीया जलाया, छप्पर के पास मेरी झोली फैली है, आप भरें। फिर मैं अगर कंकड़-पत्थर से भी गयी, निकाला, देखा; तो उसने कहा अरे! तो इस औरत के भर दूं, तो भी अगर तुमने श्रद्धा से स्वीकार किया हो तो वे पीछे दीवाना है! आज पता चला! कंकड़-पत्थर तुम्हारे लिए हीरे-मोती हो जाएंगे। लेकिन अगर दर्पण हं मैं। तम जो लेकर आओगे वही तम्हें दिखायी पड | तमने अश्रद्धा से झोली फैलायी हो और हीरे-मोतियों से भी भर जाएगा। दर्पण से ज्यादा नहीं। इसलिए किन्हीं-किन्हीं क्षणों में इं, तो कंकड़-पत्थर हो जाएंगे। क्योंकि तुम्हारी श्रद्धा बड़ी जब तुम अपनी ऊंचाई पर होओगे, तो तुम्हें अपनी ऊंचाई भी शक्ति है। तुम्हारी श्रद्धा बड़ा रूपांतर करनेवाली ऊर्जा है। मझमें दिखायी पड़ जाएगी। और किन्हीं-किन्हीं क्षणों में जब तुम सब कुछ तुम पर निर्भर है, अंततः तुम पर निर्भर है। अगर पात्र अपनी नीचाई पर होओगे, तो तुम्हारी नीचाई भी मुझमें दिखायी | गलत हो, अगर पात्र दूषित हो, अगर पात्र गंदा हो, तो उसमें पड़ जाएगी। तो जो जैसा आता है वैसा, वैसा ही मुझमें देखकर फिर शुद्ध जल न भरा जा सकेगा। मैं तो शुद्ध ही ढालूंगा, लौट जाता है। लेकिन वह तुम तक पहुंच न पाएगा। सब कुछ तुम पर निर्भर किन्हीं गहन क्षणों में जब तुम अपनी आखिरी ऊंचाई पर है। अगर मार्गदर्शन चाहिए, तो करीब आओ। छलांग लेते हो, क्षणभर को उड़ते हो आकाश में, तब तुम्हें ऐसा | संन्यास तो सिर्फ करीब आने की तुम्हारी तरफ से घोषणा है। लगेगा कि ये ऊंचाइयां मेरी तो नहीं हो सकतीं; तो तुम सोचोगे | गैरिक वस्त्र, माला तो केवल प्रतीक हैं। लेकिन तुम...और कि शायद किसी और की, किसी और ने दिखा दीं। लेकिन जीवन के अंगों में तुम प्रतीकों को सत्कारते हो या नहीं सत्कारते स्मरण रखना, तुम्हारी ही ऊंचाइयां हैं, तुम्हारी ही नीचाइयां हैं; हो? तुम्हारा किसी से प्रेम हो गया, तो तुम कुछ भेंट ले जाते हो मुझ पर मत थोपना। क्योंकि उस थोपने में भ्रांति हो जाती है। कि नहीं ले जाते हो? फूल ले गये तुम, गुलाब का एक फूल ले उस थोपने में बड़ी भूल हो जाती है। गये-अपनी प्रेयसी को देने या प्रेमी को देने। वह प्रेयसी तुमसे 2010_03
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________________ यात्रा का प्रारंभ अपने ही घर से पूछे, यह गुलाब के फूल में क्या धरा है? किसलिए ले आए में? क्योंकि प्रेम में स्तुति करने को तुम राजी नहीं। प्रेम में प्रार्थना गुलाब के फूल, क्या प्रेम काफी नहीं है? तो तुम भी चौंकोगे। करने को तुम राजी नहीं। तो फिर क्रोध में गाली भी छोड़ दो! तुम उसे आलिंगन करना चाहो; वह कहे दूर रहो, आलिंगन में नहीं, आदमी जहां है, वहां आदमी पृथ्वी और आकाश का क्या धरा है? क्या प्रेम बिना आलिंगन के नहीं हो सकता? तुम मिलन है; शरीर और आत्मा का मिलन है; स्थूल और सूक्ष्म का उसका हाथ हाथ में लेना चाहो और वह झिड़क दे और कहे, दूर | मिलन है। आदमी जहां है, वहां दो जगतों में एकसाथ खड़ा है। रहो ! इस हाथ में हाथ लेने से पसीना ही पैदा होगा, प्रेम कैसे पैदा | जड़ें जमीन में हैं, फूल आकाश में हैं। दोनों जुड़े हैं। होगा? प्रेम करो, यह फिजूल की बातें क्यों करते हो? तुम्हें पता ये गैरिक वस्त्र तो केवल प्रतीक हैं। लेकिन जिन्होंने भाव से है कैसे प्रेम करोगे फिर? फिर प्रेम का कोई उपाय न रह जाएगा। लिये हैं, उनके जीवन में क्रांति हो जाएगी। मैंने तो निश्चित भाव प्रेम जैसी अपूर्व घटना भी माध्यम चाहती है। नाव चाहती है, से दिये हैं। लेनेवाले पर निर्भर है। यह माला तो बस प्रतीक है। जिस पर सवार हो सके। प्रेम तो बड़ा सूक्ष्म है। कहीं स्थूल में इस माला में कुछ भी धरा नहीं। जड़ें देनी होंगी; नहीं तो प्रेम टिक न पाएगा। परसों एक मित्र पूछते थे—संन्यास उन्होंने लिया, भाववाले आकाश में खिले सुंदरतम फूल भी गहरी भूमि में गड़े होते हैं। व्यक्ति हैं। सरलचित्त हैं—पूछने लगे, इस माला का वैज्ञानिक वे अगर यह तय कर लें कि आकाश में ही रहेंगे, तो खो जाएंगे। | कारण क्या है? वैज्ञानिक कारण माला का हो ही कैसे सकता कमल जल के ऊपर उठा हुआ भी, सरोवर की कीचड़ में दबा है? वैज्ञानिक कारण-और माला का! कोई भी कारण होता है। अगर कमल कहे, क्या सार है कीचड़ में पड़े होने से? वैज्ञानिक नहीं हो सकता माला का-कारण धार्मिक है। कारण कीचड़ कीचड़ है, मैं कमल हूं। तो टूट जाएगा संबंध। कमल आत्मिक है, वैज्ञानिक नहीं है। तो मैंने उनसे कहा, वैज्ञानिक कुम्हलाएगा और मर जाएगा। पूछना हो तो 'लक्ष्मी' से पूछ लेना। वैज्ञानिक कारण? प्रेम का तुमने कभी खयाल किया, किसी ने प्रेम से तुम्हें एक रूमाल कहीं कोई वैज्ञानिक कारण होता? भेंट दे दिया; उस रूमाल का मूल्य फिर नहीं रह जाता, अमूल्य मुल्ला नसरुद्दीन की लड़की के प्रेम में एक युवक पड़ गया। हो जाता है! ऐसे बाजार में चार आने में मिलता है। लेकिन वह आया, उसने मुल्ला को कहा कि आपकी लड़की से मुझे प्रेम तुमसे कोई कहे कि चार आने में दे दो, तो तुम कहोगे, पागल हो हो गया है, मुझे विवाह की आज्ञा दें। मुल्ला ने कहा, पहले सिद्ध गये हो? प्राण चले जाएं, इसे न दे सकूँगा। वह कहेगा, तुम करो, प्रेम का कारण क्या है? उस युवक ने कहा, कारण कुछ पागल या मैं पागल? चार आने में जितने चाहो बाजार में मिलते भी नहीं है, महानुभाव! प्रेम हो गया है। प्रेम में कहीं कारण हैं। दर्जन से लो तो और भी सस्ते मिलते हैं। क्या पागल हो रहे | होता? और जहां कारण हो, वहां प्रेम हो सकता है? कारण हो हो? लेकिन तुम कहते हो, मेरी प्रेयसी की याददाश्त है। या मेरे तो प्रेम हो ही नहीं सकता। कारण हो तो व्यवसाय होता है, धंधा मित्र की याददाश्त है। किसी ने बहुत भाव से दिया है। होता है, सौदा होता है। अकारण होता है प्रेम। छोटे-छोटे प्रतीक हैं। छोटे-छोटे प्रतीकों पर बसा बड़ा तुम्हारा मुझसे प्रेम हो गया है। मेरा तुमसे प्रेम हो गया है। अब आकाश है। प्रतीक को मत देखो, पीछे छिपे आकाश को देखो। कुछ प्रतीक देना जरूरी है। यह माला तो ऐसे समझो जैसे भांवर तुम गये, किसी के चरणों में सिर रखा। क्या सार है? श्रद्धा पड़ गयी। फंसे! यह तो एक तरह का विवाह हुआ। इसका कोई क्या बिना चरणों में सिर रखे नहीं हो सकती? ठीक! किसी पर | कारण नहीं है। यह प्रेम हो गया। इसका कोई बुद्धियुक्त हिसाब तुम्हें क्रोध आ जाता है, तुम क्या करते हो? उठाकर जूता उसके | नहीं है। यह कुछ हृदय की बात हो गयी। सिर पर मार देते हो। तुम क्या कर रहे हो? श्रद्धा के विपरीत। तुमने मेरे हाथ में हाथ डाल दिया; मैंने तुम्हारा हाथ अपने हाथ उसका सिर अपने चरणों में रख रहे हो। क्रोध बिना इसके नहीं में ले लिया। इसकी याददाश्त के लिए तम्हें यह माला दे दी कि हो सकता? क्रोध में जूता उठाने की क्या जरूरत है? जूते और अब तुम इसे याद रखना। अब तुम अकेले नहीं हो, मैं भी हूं। क्रोध का क्या लेना-देना? गाली देने की क्या जरूरत है क्रोध अब तुम जो करो, मुझे भी याद रखकर करना। अब तुम जो भी 2010_03
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________________ जिन सूत्र भाग : 2 बनो, मैं भी जुड़ा हूं। अगर शराबघर जाओ, जाना—लेकिन | ये कैसे जाम हैं साकी, ये कैसा दौर है साकी मुझको भी घसीटोगे। यह माला लटकी रहेगी। यह कहती | यह तो तुम राजी हुए, तो शुरुआत हुई। बहुत पीने-पिलाने को रहेगी, अकेले नहीं जा रहे हो। यह तुम्हें रोकेगी। यह कई बार है। यह तो तुम निमंत्रण स्वीकार कर लिये। तुम्हारे पैर को आगे बढ़ने से रोक लेगी। यह कई बार तुम्हें उस भड़कती जा रही है दम-ब-दम इक आग-सी दिल में जगह ले जाएगी जहां तुम कभी न गये थे, और उस जगह से रोक ये गैरिक वस्त्र तो उस भीतर दिल की आग के बाहर प्रतीक हैं। देगी जहां तुम बहुत बार गये थे। क्रोधित होने को हो रहे होओगे ये कैसे जाम हैं साकी, ये कैसा दौर है साकी कि यह माला दिखायी पड़ जाएगी। आग-बबूला होने को जा ही यह तो सूचना है सारे जगत को। यह तो खबर है औरों को कि रहे थे, कि हाथ उठाकर मारने को ही थे कि यह गैरिक वस्त्र वे जान लें कि अब तुम वही नहीं हो जो कल तक थे। यह तो दिखायी पड़ जाएंगे. कोई भीतर लौट जाएगा। कहेगा. यह तम खबर है औरों को कि अब वे तमसे अपेक्षा न करें-वैसी क्या कर रहे हो? अपेक्षाएं जैसी उन्होंने कल तक की थीं। यह तो खबर है औरों अब तुम ही नहीं हो, अब मैं भी तुम्हारे साथ प्रतिबद्ध हुआ। को कि अब वे गाली दें, तुम उत्तर न दोगे। यह तो उनको खबर है यह एक 'कमिटमेंट' है, एक प्रतिबद्धता है। यह मेरा भरोसा है | कि तुम बदल गये, कि तुम मर गये और नये हो गये, कि तुम्हें तुम पर। यह मैं कहता हूं कि ठीक है, अब तुम नरक जाओगे तो | सूली लग गयी और तुम्हारा नया पुनर्जन्म हुआ। मझको भी जाना पड़ेगा। तुम्हारी मर्जी! प्रेम में घसिटन तो होती | बागवानों को बताओ, गुलो-नसरी से कहो है। अगर तुम नर्क ही जाना चाहोगे तो ठीक है, मैं भी आऊंगा: इक खराबे-गुलो-नसरीने-बहार आ ही गया लेकिन अब अकेला न छोडूंगा। जाओ। मालियों को बताओ! खबर कर दो बागवानों को! ये सिर्फ प्रतीक हैं। इन प्रतीकों का कोई वैज्ञानिक कारण नहीं | बागवानों को बताओ, गुलो-नसरी से कहो है। इनकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हो सकती-जरूरत भी और फूलों से कह दो। नहीं है। इक खराबे-गुलो-नसरीने-बहार आ ही गया ये इंकिलाब का मुज्दा है, इंकिलाब नहीं जहां कोई आशा न थी वसंत आने की, वहां भी वसंत आ ही ये आफताब का परतौ है, आफताब नहीं गया। यह तो सिर्फ वसंत के आने की खबर है। यह केवल शुभ समाचार है क्रांति का, यह क्रांति नहीं है। तुमने | जिनके भीतर हिम्मत हो वसंत को झेलने की, इस आग में वस्त्र पहन लिये गैरिक तो कोई क्रांति हो गयी, ऐसा नहीं | जलने की और निखरने की, शुद्ध सोना बनने की—मैं राजी हूं। है—सिर्फ शुभ समाचार है। प्रतीकों पर मत जाओ। यह तो बहाने हैं। इनसे धोखा मत ये इंकिलाब का मुज्दा है इंकिलाब नहीं खाओ। यह तो केवल शुरुआत है-अ, ब, स। जैसे छोटे तुमने गैरिक वस्त्र पहन लिये, तो कोई सूरज उग गया, ऐसा बच्चों को हम पढ़ाते हैं, 'ग' गणेश का-पहले पढ़ाते थे, अब नहीं है। यह तो केवल प्रतिबिंब है। पढ़ाते हैं 'ग' गधे का। क्योंकि गणेश तो एक 'सेकुलर' राज्य ये आफताब का परतौ है... में, धर्म-निरपेक्ष राज्य में ठीक नहीं है। गधा प्रतीक है। 'ग' ये तो केवल झलक है। | गधे का। हालांकि 'ग' न गधे का है और न गणेश का। मगर ...आफताब नहीं। बच्चे को पढ़ाने के लिए कुछ तस्वीर देनी पड़ती है—'ग' गधे और, सूरज से जुड़ा है गैरिक रंग। यह सूरज का रंग है। यह | का, 'ग' गणेश का, कुछ तो; क्योंकि बच्चा 'ग' नहीं जानता, सूरज की पहली किरण का रंग है। यह सूर्योदय की खबर है। गधे को जानता है। गधे के साथ 'ग' सीख लेता है। फिर गधा यह एक शुभ समाचार है। यह तो शुरुआत है मेरे साथ जुड़ने | तो भूल जाता है 'ग' रह जाता है। फिर ऐसा थोड़े ही है कि जब की। इसे अंत मत समझ लेना। भी तुम पढ़ोगे, तो कभी 'ग' आएगा तो फिर कहोगे 'ग' गधे भड़कती जा रही है दम-ब-दम इक आग-सी दिल में का। तो तुम पढ़ ही न पाओगे। फिर तो गधे और गणेश सब 2010_03
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________________ यात्रा का प्रारंभ अपने ही घर से walis गये। फिर तो 'ग' रह जाता है-शुद्ध। यह तो सिर्फ शुरुआत है-अ, ब, स। 'संन्यास' गैरिक वस्त्र का। 'संन्यास' माला का। लेकिन यह तो शुरुआत है। धीरे-धीरे जैसे तुम रगोगे-पगोगे, रस-भीगोगे, डूबोगे, संन्यास ही रह जाएगा; गैरिक वस्त्र और माला महत्वपूर्ण न रह जाएंगे। तुम कृतज्ञ रहोगे उनके लिए, क्योंकि उन्होंने यात्रा करवायी। पहला कदम उनसे उठा। तुम्हारा धन्यवाद उनके प्रति रहेगा। लेकिन तुम उनसे बंधे न रह जाओगे। ये बंधन तुम्हारी मुक्ति की तरफ पहले कदम हैं। आज इतना ही। 391 2010_03