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________________ जिन सूत्र भाग: 2 - - सुनते-सुनते, सुनते-सुनते तन्मयता जगी, उस तन्मयता में हां, मेरी निकटता में तुम्हें कुछ दिखायी पड़ सकता है। तो न तम्हारी ही गंध ने तुम्हें छ लिया और भर दिया। इसीलिए तो तो इस दर्पण की पूजा करना। क्योंकि तुम सोचोगे, यह गंध इसी कभी ध्यान में भी उठेगी। अगर मेरी होती तो तुम्हारे ध्यान में दर्पण से उठी; यह स्वाद इसी दर्पण से आया। इस दर्पण की कैसे उठती! पूजा में मत पड़ना। और न नाराज होकर इस दर्पण को मेरा कुछ लेना-देना नहीं। मैं तो दर्पण हूं, तुम अपने को ही | तोड़-फोड़ देना। इन दोनों से बचना। देख लो। दर्पण से ज्यादा नहीं। पर उतना ही प्रयोजन है। मैं यहां नहीं हूं। दर्पण कुछ होता थोड़े ही है, दर्पण तो एक खालीपन है। आखिरी सवाल: आपने कहा कि संन्यास सत्य का बोध है। तुम हटे कि दर्पण खाली। तुम आए कि दर्पण भरा लगता है। फिर क्या संन्यास के लिए गैरिक वस्त्र और माला भी अनिवार्य सुना है मैंने, मुल्ला नसरुद्दीन एक राह से गुजरता था। एक हैं? और क्या कोई व्यक्ति बिना दीक्षा लिए आपके बताए मार्ग दर्पण पड़ा मिल गया। उठाकर देखा। कभी दर्पण इसके पहले पर नहीं चल सकता है? कृपाकर मार्गदर्शन करें। उसने देखा न था। सोचा, अरे! तस्वीर तो मेरे पिताजी की मालूम पड़ती है। मगर जवानी की होगी। हद्द हो गयी! मैंने मार्गदर्शन के बिना भी चलो न! मार्गदर्शन की क्या जरूरतकभी सोचा भी न था कि मेरे पिताजी और तस्वीर उतरवाएंगे! है? जब दीक्षा के बिना चल सकते हो...। दीक्षा और क्या है? ऐसे रंगीन तबीयत के तो आदमी न थे! मगर मिल गयी तो अत्यंत समीपता से लिया गया मार्गदर्शन है। बहुत पास से, अच्छा हुआ। झाड़-पोंछकर खीसे में रखकर घर चला आया। बहुत करीब से, बहुत पास से सुना गया मार्गदर्शन है। श्रद्धा से कहीं बच्चे, पत्नी फोड़-फाड़ न दें, खो-खवा न दें, ऊपर चढ़ सुना गया मार्गदर्शन है। दीक्षा और क्या है? गया, छप्पर में छिपाकर रख आया। लेकिन पत्नी से कभी कोई __मुझसे पूछते हो, मार्गदर्शन दें। तुम लेने को तैयार हो? वही पति कुछ छिपा पाया है ! पत्नी ने देखा, कुछ छिपा रहा है। रात लेने की तैयारी तो संन्यास की घोषणा है कि मैं तैयार हूं, आप दें। जब मुल्ला सो गया तो वह उठी, दीया जलाया, छप्पर के पास मेरी झोली फैली है, आप भरें। फिर मैं अगर कंकड़-पत्थर से भी गयी, निकाला, देखा; तो उसने कहा अरे! तो इस औरत के भर दूं, तो भी अगर तुमने श्रद्धा से स्वीकार किया हो तो वे पीछे दीवाना है! आज पता चला! कंकड़-पत्थर तुम्हारे लिए हीरे-मोती हो जाएंगे। लेकिन अगर दर्पण हं मैं। तम जो लेकर आओगे वही तम्हें दिखायी पड | तमने अश्रद्धा से झोली फैलायी हो और हीरे-मोतियों से भी भर जाएगा। दर्पण से ज्यादा नहीं। इसलिए किन्हीं-किन्हीं क्षणों में इं, तो कंकड़-पत्थर हो जाएंगे। क्योंकि तुम्हारी श्रद्धा बड़ी जब तुम अपनी ऊंचाई पर होओगे, तो तुम्हें अपनी ऊंचाई भी शक्ति है। तुम्हारी श्रद्धा बड़ा रूपांतर करनेवाली ऊर्जा है। मझमें दिखायी पड़ जाएगी। और किन्हीं-किन्हीं क्षणों में जब तुम सब कुछ तुम पर निर्भर है, अंततः तुम पर निर्भर है। अगर पात्र अपनी नीचाई पर होओगे, तो तुम्हारी नीचाई भी मुझमें दिखायी | गलत हो, अगर पात्र दूषित हो, अगर पात्र गंदा हो, तो उसमें पड़ जाएगी। तो जो जैसा आता है वैसा, वैसा ही मुझमें देखकर फिर शुद्ध जल न भरा जा सकेगा। मैं तो शुद्ध ही ढालूंगा, लौट जाता है। लेकिन वह तुम तक पहुंच न पाएगा। सब कुछ तुम पर निर्भर किन्हीं गहन क्षणों में जब तुम अपनी आखिरी ऊंचाई पर है। अगर मार्गदर्शन चाहिए, तो करीब आओ। छलांग लेते हो, क्षणभर को उड़ते हो आकाश में, तब तुम्हें ऐसा | संन्यास तो सिर्फ करीब आने की तुम्हारी तरफ से घोषणा है। लगेगा कि ये ऊंचाइयां मेरी तो नहीं हो सकतीं; तो तुम सोचोगे | गैरिक वस्त्र, माला तो केवल प्रतीक हैं। लेकिन तुम...और कि शायद किसी और की, किसी और ने दिखा दीं। लेकिन जीवन के अंगों में तुम प्रतीकों को सत्कारते हो या नहीं सत्कारते स्मरण रखना, तुम्हारी ही ऊंचाइयां हैं, तुम्हारी ही नीचाइयां हैं; हो? तुम्हारा किसी से प्रेम हो गया, तो तुम कुछ भेंट ले जाते हो मुझ पर मत थोपना। क्योंकि उस थोपने में भ्रांति हो जाती है। कि नहीं ले जाते हो? फूल ले गये तुम, गुलाब का एक फूल ले उस थोपने में बड़ी भूल हो जाती है। गये-अपनी प्रेयसी को देने या प्रेमी को देने। वह प्रेयसी तुमसे Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.340133
Book TitleJinsutra Lecture 33 Yatra ka Prarambh Apne hi Ghar Se
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherOsho Rajnish
Publication Year
Total Pages1
LanguageHindi
ClassificationAudio_File, Article, & Osho_Rajnish_Jinsutra_MP3_and_PDF_Files
File Size32 MB
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