________________ जिन सूत्र भाग : 2 बनो, मैं भी जुड़ा हूं। अगर शराबघर जाओ, जाना—लेकिन | ये कैसे जाम हैं साकी, ये कैसा दौर है साकी मुझको भी घसीटोगे। यह माला लटकी रहेगी। यह कहती | यह तो तुम राजी हुए, तो शुरुआत हुई। बहुत पीने-पिलाने को रहेगी, अकेले नहीं जा रहे हो। यह तुम्हें रोकेगी। यह कई बार है। यह तो तुम निमंत्रण स्वीकार कर लिये। तुम्हारे पैर को आगे बढ़ने से रोक लेगी। यह कई बार तुम्हें उस भड़कती जा रही है दम-ब-दम इक आग-सी दिल में जगह ले जाएगी जहां तुम कभी न गये थे, और उस जगह से रोक ये गैरिक वस्त्र तो उस भीतर दिल की आग के बाहर प्रतीक हैं। देगी जहां तुम बहुत बार गये थे। क्रोधित होने को हो रहे होओगे ये कैसे जाम हैं साकी, ये कैसा दौर है साकी कि यह माला दिखायी पड़ जाएगी। आग-बबूला होने को जा ही यह तो सूचना है सारे जगत को। यह तो खबर है औरों को कि रहे थे, कि हाथ उठाकर मारने को ही थे कि यह गैरिक वस्त्र वे जान लें कि अब तुम वही नहीं हो जो कल तक थे। यह तो दिखायी पड़ जाएंगे. कोई भीतर लौट जाएगा। कहेगा. यह तम खबर है औरों को कि अब वे तमसे अपेक्षा न करें-वैसी क्या कर रहे हो? अपेक्षाएं जैसी उन्होंने कल तक की थीं। यह तो खबर है औरों अब तुम ही नहीं हो, अब मैं भी तुम्हारे साथ प्रतिबद्ध हुआ। को कि अब वे गाली दें, तुम उत्तर न दोगे। यह तो उनको खबर है यह एक 'कमिटमेंट' है, एक प्रतिबद्धता है। यह मेरा भरोसा है | कि तुम बदल गये, कि तुम मर गये और नये हो गये, कि तुम्हें तुम पर। यह मैं कहता हूं कि ठीक है, अब तुम नरक जाओगे तो | सूली लग गयी और तुम्हारा नया पुनर्जन्म हुआ। मझको भी जाना पड़ेगा। तुम्हारी मर्जी! प्रेम में घसिटन तो होती | बागवानों को बताओ, गुलो-नसरी से कहो है। अगर तुम नर्क ही जाना चाहोगे तो ठीक है, मैं भी आऊंगा: इक खराबे-गुलो-नसरीने-बहार आ ही गया लेकिन अब अकेला न छोडूंगा। जाओ। मालियों को बताओ! खबर कर दो बागवानों को! ये सिर्फ प्रतीक हैं। इन प्रतीकों का कोई वैज्ञानिक कारण नहीं | बागवानों को बताओ, गुलो-नसरी से कहो है। इनकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हो सकती-जरूरत भी और फूलों से कह दो। नहीं है। इक खराबे-गुलो-नसरीने-बहार आ ही गया ये इंकिलाब का मुज्दा है, इंकिलाब नहीं जहां कोई आशा न थी वसंत आने की, वहां भी वसंत आ ही ये आफताब का परतौ है, आफताब नहीं गया। यह तो सिर्फ वसंत के आने की खबर है। यह केवल शुभ समाचार है क्रांति का, यह क्रांति नहीं है। तुमने | जिनके भीतर हिम्मत हो वसंत को झेलने की, इस आग में वस्त्र पहन लिये गैरिक तो कोई क्रांति हो गयी, ऐसा नहीं | जलने की और निखरने की, शुद्ध सोना बनने की—मैं राजी हूं। है—सिर्फ शुभ समाचार है। प्रतीकों पर मत जाओ। यह तो बहाने हैं। इनसे धोखा मत ये इंकिलाब का मुज्दा है इंकिलाब नहीं खाओ। यह तो केवल शुरुआत है-अ, ब, स। जैसे छोटे तुमने गैरिक वस्त्र पहन लिये, तो कोई सूरज उग गया, ऐसा बच्चों को हम पढ़ाते हैं, 'ग' गणेश का-पहले पढ़ाते थे, अब नहीं है। यह तो केवल प्रतिबिंब है। पढ़ाते हैं 'ग' गधे का। क्योंकि गणेश तो एक 'सेकुलर' राज्य ये आफताब का परतौ है... में, धर्म-निरपेक्ष राज्य में ठीक नहीं है। गधा प्रतीक है। 'ग' ये तो केवल झलक है। | गधे का। हालांकि 'ग' न गधे का है और न गणेश का। मगर ...आफताब नहीं। बच्चे को पढ़ाने के लिए कुछ तस्वीर देनी पड़ती है—'ग' गधे और, सूरज से जुड़ा है गैरिक रंग। यह सूरज का रंग है। यह | का, 'ग' गणेश का, कुछ तो; क्योंकि बच्चा 'ग' नहीं जानता, सूरज की पहली किरण का रंग है। यह सूर्योदय की खबर है। गधे को जानता है। गधे के साथ 'ग' सीख लेता है। फिर गधा यह एक शुभ समाचार है। यह तो शुरुआत है मेरे साथ जुड़ने | तो भूल जाता है 'ग' रह जाता है। फिर ऐसा थोड़े ही है कि जब की। इसे अंत मत समझ लेना। भी तुम पढ़ोगे, तो कभी 'ग' आएगा तो फिर कहोगे 'ग' गधे भड़कती जा रही है दम-ब-दम इक आग-सी दिल में का। तो तुम पढ़ ही न पाओगे। फिर तो गधे और गणेश सब Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org