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________________ NEPAL श्री यात्रा का प्रारंभ अपने ही घर से - थोड़े ही कहा है कि किसी के घर में आग लगाओ, कि दीया इतने लोग, कोई उसके सामने से निकल जाता है; कोई गलत, जलाओ! तुम पर निर्भर है। नियम तोड़ देता है; कोई उसको पीछे छोड़ देता है; कोई उसके आंख भी अनाक्रामक हो सकती है—तुम अगर अनाक्रामक आगे है, वह हार्न बजाए जा रहा है और वह हटता ही नहीं है! हो। और कान भी आक्रामक हो सकता है। मेरे एक मित्र हैं। वे कहते हैं कि मैंने इसीलिए खुद कार मैंने सुना, मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उस पर बड़ी नाराज हो चलानी छोड़ दी, क्योंकि उसमें गाली देना बिलकुल जरूरी है। रही थी। और चिल्ला रही थी कि बहुत हो गया; अब मेरे उससे बचा ही नहीं जा सकता। मछली मारने का काम भी ऐसा बर्दाश्त के बाहर है। अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकती। | ही है। घंटों बैठे हैं और मछली पकड़ में नहीं आती, क्या करो! मुल्ला ने कहा हद्द हो गयी! मैं कुछ बोला ही नहीं हूं। मैं सिर्फ | या कभी-कभी मछली फंस भी जाती है और तुम खींच ही रहे थे चुप बैठा हूं! उसने कहा वह मुझे मालूम है। लेकिन तुम इस ढंग कि छूट गयी। कभी तो ऐसा हो जाता है, हाथ में भी आ गयी से चप बैठे हो कि अब बर्दाश्त के बाहर है। | और छलांग लगा गयी। तो मछुए भी गाली देने लगते हैं। चुप बैठना भी बर्दाश्त के बाहर हो सकता है। ढंग पर निर्भर यह फोसदिक अपने मित्र के साथ मछली मारने गया। और है। तुम्हारी खामोशी में भी हिंसा हो सकती है। तुम इसलिए चुप उस मित्र ने लौटकर अपनी पत्नी से कहा कि आज एक बड़ी बैठ सकते हो कि तुम इतनी गहन हिंसा से भरे हो कि अब तुम हैरानी की बात देखी। जब फोसदिक ने एक कुछ कहना भी नहीं चाहते। लेकिन तुम्हारी चुप्पी में भी गाली हो | घंटों की मेहनत के बाद, तो वह बड़ा खुश था; लेकिन जैसे ही सकती है। गाली के लिए बोलना ही थोड़े ही जरूरी है, बिना | उसने हाथ में उठायी वह छलांग लगा गयी और नाव के बाहर बोले गाली हो सकती है। तुम्हारे उठने-बैठने के ढंग में गाली हो | कूद गयी। तो मित्र ने कहा, मैं सोचता था कि अब तो इसके मुंह सकती है। तुम जिस ढंग से दूसरे को सुनते हो, उसमें गाली हो से कुछ अपशब्द निकलेगा, कोई गाली! लेकिन फोसदिक सकती है। बिलकल चुप रहा, कुछ भी नहीं बोला। मित्र ने अपनी पत्नी को तुमने देखा कभी? कोई आदमी घर आया। तुम सुनना नहीं कहा कि इतनी अपवित्र शांति मैंने कभी नहीं देखी। अपवित्र चाहते। तुम उसके सामने बैठकर ही जम्हाई लेते हो। तुम उससे | शांति! धर्मगुरु है, गाली दे नहीं सकता, अपशब्द बोल नहीं कुछ कहते नहीं। कहते तो तुम हो, बड़ी कृपा हुई, आए! कितने | सकता। लेकिन शांति भी अपवित्र हो सकती है। चुप रहने में भी | दिनों से आंखें तरस गयी थीं! कहते तो तुम यही हो। कहते तो | तीर हो सकते हैं, कांटे हो सकते हैं, जहर हो सकता है। तुम हो, अतिथि तो देवता है! और जम्हाई ले रहे हो। बार-बार तुम सभी जानते हो। चुप रहकर भी तुम चोट पहुंचा सकते घड़ी देख रहे हो। अब और क्या कहना है? कुछ सिर पर हो। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि बोलकर इतनी गहरी चोट हथौड़ा मारोगे तभी उसकी समझ में आएगा? कोई बोल रहा है, पहुंचायी ही नहीं जा सकती, जितनी चुप रहकर पहुंचायी जा | तुम बार-बार घड़ी देख रहे हो। तुम क्या कह रहे हो? शायद | सकती है। तुम्हें भी पता न हो। तुम बिना कहे कुछ कह रहे हो। तुम्हारे | तो जरूरी नहीं है कि तुम्हारा कान मैंने कह दिया कि बोलने में, तुम्हारे सुनने में, तुम्हारे उठने-बैठने में, न बोलने में, | अनाक्रामक है, तो हो। तुम पर निर्भर है। यह तो प्रतीक था। | चुप रहने में सब तरफ से हिंसा हो सकती है। सुनने और देखने में भेद है। कान सुनता है, ग्रहण करता है। मैने सुना है, अमरीका का एक बड़ा धार्मिक उपदेशक है, | आंख जाती है, छूती है, खोजती है। बस इतना प्रतीक था। तुम डाक्टर फोसदिक। उसके संबंध में एक मित्र किसी को कह रहा | कान-जैसे बनना। तुम्हारी आंख भी कान-जैसी बन जाए। वह था कि हम दोनों साथ-साथ मछली मारने गये। अब कुछ भी ग्राहक हो। वह इस परम सौंदर्य को, जो चारों तरफ फैला है, मामला ऐसा है...मछली मारनेवाले या कार चलानेवाले, कुछ | इसे पीए। इसे उघाड़े न, बलात्कार न करे! व्यभिचार न करे, काम ऐसे हैं कि वह गाली देना सीख ही जाते हैं। कार चोट न करे! बस इतनी बात थी। चलानेवाला गाली न दे, बड़ा मुश्किल! क्रोध आ ही जाता है। यह हो सकता है। लेकिन यह होगा तुम्हारे रूपांतरण से। 291 Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.340133
Book TitleJinsutra Lecture 33 Yatra ka Prarambh Apne hi Ghar Se
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherOsho Rajnish
Publication Year
Total Pages1
LanguageHindi
ClassificationAudio_File, Article, & Osho_Rajnish_Jinsutra_MP3_and_PDF_Files
File Size32 MB
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