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________________ जिन सूत्र भागः2 फिर आइंस्टीन की खोजों ने एक बड़ा अनठा आयाम खोला। उतना पाओगे मिलने लगा। और कुछ भी पाप नहीं है, रोक लेना वह आयाम यह था कि संसार जैसा है वैसा ही नहीं है, विस्तीर्ण | पाप है। हो रहा है। ‘एक्सपैंडिंग यूनिवर्स।' फैलता जा रहा है। बड़ी अर्थशास्त्री कहते हैं कि रुपया जितना चले उतना समाज संपन्न तीव्र गति से फैल रहा है! जैसे कोई छोटा बच्चा अपने गुब्बारे में होता है। इसीलिए तो रुपये को ‘करेंसी' कहते हैं। 'करेंसी' हवा भर रहा हो और गुब्बारा बड़ा होता जा रहा हो! तब ब्रह्म का मतलब, जो चलता रहे, भ्रमण करता रहे। अब समझ लो शब्द के नये अर्थ उभरकर आए। कि दस आदमी हैं गांव में और दसों के पास दस रुपये हैं, वे दसों ब्रह्म शब्द का अर्थ होता है : 'दि एक्सपैंडिंग वन।' वह जो अपने रुपयों को रखकर बैठ गये हैं, तो गांव में केवल दस रुपये फैलता ही जा रहा है। ब्रह्म का अर्थ है: विस्तीर्ण होता जा रहा हैं। फिर दसों अपने रुपयों को चलाते हैं। एक-दूसरे से सामान है। जो ठहरा नहीं है। जो कहीं ठहरता नहीं। जो किसी सीमा को खरीदते हैं। एक का रुपया दूसरे के पास जाता है, दूसरे का सीमा नहीं बनाता, जो हमेशा सीमा के ऊपर से बह जाता है। तीसरे के पास जाता है—दस रुपये के सौ हो जाते हैं, हजार हो अगर तुम्हें परमात्मा को जानना हो, तो छोटे पैमाने पर ही सही, जाते हैं। क्योंकि रुपया आता है, जाता है। पकड़े रहो, तो एक लेकिन तुम भी सीमा मत बनाना। फैलना, फैलते जाना! सुगंध ही रहता है। आता रहे, जाता रहे, तो अनेक हो जाते हैं। तुम हो तुम्हारे पास, बांटना हवाओं को! प्रकाश हो, बांट देना रास्तों गड़ाकर रख दो जमीन में, तो 'करेंसी' 'करेंसी' न रही, मर पर! बोध हो, दे देना दूसरों को! जो कुछ भी तुम्हारे पास गयी। इसीलिए तो कंजूस आदमी से अभागा आदमी दुनिया में हो...! दूसरा नहीं है। 'करेंसी' मार डालता है। चलने नहीं देता। और ऐसा तो कौन है मनुष्य जिसके पास कुछ भी न हो! ऐसा चलन को रोक देता है। नदी को बहने नहीं देता, डबरा बना लेता तो मनष्य है ही नहीं कोई कि जिसके पास कछ भी न हो। है। फिर डबरा सडता है। फिर डबरे में घास-पात गिरते हैं परमात्मा तो सभी के भीतर है, इसलिए कुछ न कुछ तो होगा। बदबू आती है। कृपण आदमी में बदबू आती है। खोजना। तुम अकारण नहीं हो सकते। तुम्हारे द्वारा उसने कोई इसीलिए तो दानी की इतनी महिमा रही है। दान को धर्म का | गीत गाना ही चाहा है। तम्हारे द्वारा उसने कोई नाच नाचना ही आधार कहा है: लोभ को पाप का। कारण, लोभ रोक लेता है। चाहा है। तुम्हारे द्वारा उसने कोई फूल खिलाना ही चाहा है। दान बांट देता है। दान से चीजें फैलती हैं। और जो बात बाहर व्यर्थ तुम नहीं हो सकते। तुम्हारी कोई नियति है। तुम्हारे भीतर की संपदा के संबंध में सही है, मैं तुमसे कहना चाहता हूं, भीतर छिपा हुआ कोई राज है। खोलो, खोजो! मेरे लिए धर्म उसी की संपदा के संबंध में और भी ज्यादा सही है। जब बाहर तक रहस्य को खोजने की कुंजी है। तुम तुम बनो! तुम्हारी नियति की संपदा रोक लेने से मर जाती है—मरी-मरायी संपदा भी रोक खुले, बिखरे, फैले। तुम्हारे जीवन में बाढ़ आए। लेने से मर जाती है-जब बाहर की संपदा चलाने से इसी को तो महावीर ने कहा कि मुनि जैसे-जैसे उस अश्रुतपूर्व मरी-मरायी संपदा भी जीवित मालूम होने लगती है, तो भीतर की को सुनता, जानता; जैसे-जैसे अतिशय रस के अतिरेक से थोड़ी सोचो! वहां का धन तो जीवंत धन है। उसे रोका कि भरता, वैसे-वैसे प्रफुल्लित होता; वैसे-वैसे उत्साहित होता; गया! उसे चलने दो। चलन में रहने दो। 'करेंसी' बनाओ। वैसे-वैसे फल खिलने लगते हैं, कमल खिलने लगते हैं, एक ही पाप है मेरी दृष्टि में। और वह पाप है, जो तुम्हें मिला है पंखुड़ियां खुलने लगती हैं, कलियां फूल बनतीं। फैलो! कली भीतर, उस पर तुम सांप की तरह कुंडली मारकर बैठ गये हो, तो मत रह जाना। वही दुर्भाग्य है। पाप है। उसे बांटो! परमात्मा बांटने के नियम को मानता है, मेरे लिए अधार्मिक आदमी वही है, जो कली रह गया। फैलने के नियम को मानता है। तुम भी फैलो! धार्मिक वही है, जो फूल बन गया। फूलो! फैलो! कोई सीमा नहीं, स्वाद में कोई पाप नहीं; लेकिन स्वाद अकेले मत लेना। मत बांधो। बाढ़ बनो। और तुम जितना फैलोगे, तुम पाओगे बांटना। भोजन में कोई पाप नहीं है। उसी की भूख है! लेकिन उतनी ज्यादा फैलने की क्षमता आने लगी। तुम जितना बांटोगे, जो तुम्हारे पास हो उसे बांटकर खाना। इतना भर स्मरण रहे कि 132 Jair Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.340133
Book TitleJinsutra Lecture 33 Yatra ka Prarambh Apne hi Ghar Se
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherOsho Rajnish
Publication Year
Total Pages1
LanguageHindi
ClassificationAudio_File, Article, & Osho_Rajnish_Jinsutra_MP3_and_PDF_Files
File Size32 MB
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