Book Title: Vyavaharasutram evam Bruhatkalpsutram
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti

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Page 528
________________ तेसिं कारण अदीवित्ता अण्ण आयरियउवज्झाय उदिसावित्तए, कप्पइ से तेसिं कारण दीवित्ता अण्ण आयरियउवज्झाय उदिसावित्तए ॥२८॥ भिक्खू य राओ वा वियाले वा आहच्च वीसुंभिज्जा, तं च सरीरंग केइ वेयावच्चकरे भिक्खू इच्छिज्जा एगंते बहुफामुए थंडिले परिदृवित्तए, अत्थि य इत्थ केइ सागारियसंतए उवगरणजाए अचित्ते परिहरणारिहे कप्पइ से सागारियकडं गहाय तं सरीरगं एगंते बहुफामुए थंडिले परिदृवित्ता तत्थेव उवनिक्खियव्वे सिया ॥२९॥ भिक्खू य अहिगरणं कटु त अहिगरणं अविओसवित्ता नो से कप्पइ गाहावइकुलं भत्ताए वा पाणाए वा निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा, बहिया वियारभूमि वा विहारभूमि वा णिक्खमित्तए वा पविसित्तए वा, गामाणुगामं वा दूइज्जित्तए, गणाओ गणं संकमित्तए, वासावास वा वत्थए, जत्थेव अप्पणो आयरियं उवज्झायं पासेज्जा, वहुस्मयं बब्भागमं तस्संतिए आलोइज्जा पडिक्कमिज्जा निदिज्जा गरहिज्जा विउद्वेज्जा विसोहेज्जा अकरणाए अब्भुट्ठिज्जा अहारिहं तवोकम्मं पायच्छित्तं पडिवज्जेज्जा, से य सुएण पट्टविए आइयव्वे सिया, से य मुएण नो पट्टविए नो आइयत्वे सिया, से य मुएण पविज्जमाणं नो आइयइ से निज्जूहियव्वे सिया ॥३०॥ परिहारकप्पट्ठियस्स णं भिक्खुस्स कप्पइ आयरिय-उवज्झाएणं तदिवसं एगगिहंसि पिंडवायं दवावित्तए, तेण परं णो से कप्पइ असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा दाउं वा अणुप्पदाउं वा, कप्पइ से अन्नयरं वेयावडियं करित्तए, तं जहा-उठावणं वा निसीयावणं वा तुयट्टावणं वा उच्चार-पासवण-खेल-सिंघाणविगिचणं वा विसोहणं वा करित्तए, अह पुण एवं जाणिज्जा-छिन्नावाएमु पंथेमु आउरे झिंझिए पिवासिए तवस्सी दुबले किलंते मुच्छिज्ज बा पवडिज्ज वा, एवं से कप्पइ असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा दाउं चा अणुप्पदाउं वा ॥ ३१॥ नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा इमाओ पंच महानईओ उद्दिट्ठाओ गणियाओ बंजियाओ अंतो मासस्स दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरित्तए वा संतरित्तए वा, तंजहा-गगा १, जउणा २, सरऊ ३, कोसिया ४, मही ५॥३२॥ ___अह पुण एवं जाणिज्जा एरवई कुणालाए जत्थ चक्किया एगं पायं जले किच्चा एग पाय थले किच्चा एवं से कप्पइ अंतो मासस्स दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरित्तए वा संतरित्तए वा, एवं नो चक्किया एवं शं नो कष्पइ अंतो मासस्स दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरित्तए वा संतरित्तए वा ॥३३॥

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