Book Title: Vitrag aur Sthitpragya Ek Vishleshan Author(s): Dharmchand Jain Publisher: Z_Umravkunvarji_Diksha_Swarna_Jayanti_Smruti_Granth_012035.pdf View full book textPage 6
________________ चतुर्थ खण्ड /९० स्थितप्रज्ञ एवं स्थितप्रज्ञता 'भगबद्गीता' में 'स्थितप्रज्ञ' का उतना ही महत्त्व है जितना प्रस्थानत्रयी' में गीता का । 'स्थितप्रज्ञ' वर्णन को गीता का हार्द कहा जा सकता है। 'स्थितप्रज्ञ' शब्द का विग्रह होगास्थिता प्रज्ञा यस्य स: स्थितप्रज्ञः' अर्थात् जिसकी प्रज्ञा स्थित (स्थिर) है वह स्थितप्रज्ञ है। 'स्थितप्रज्ञ' शब्द में स्थित शब्द जड़ता का सूचक नहीं, अपितु समता का सूचक प्रतीत होता है। यह गीता का अपना विशिष्ट शब्द है । अर्जुन ने जब श्रीकृष्ण से स्थितप्रज्ञ का स्वरूप समझने की जिज्ञासा प्रकट की तो श्रीकृष्ण ने इस प्रकार समझाया प्रजहाति यदा कामान, सर्वान पार्थ ! मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥२१५५ दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सूखेष विगतस्प्रहः । वीतराग-भय क्रोधः स्थितधी, निरुच्यते ॥ २०५६ हे अर्जन ! जब साधक अपने मन में स्थित समस्त कामनाओं (भोगेच्छाओं) का त्याग कर देता है तथा अपने आप में संतुष्ट हो जाता है तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। २०५५ जिसका मन दुःखों (दुःखद स्थितियों) में उद्विग्न नहीं होता तथा सुखों (सुखद स्थितियों) में उनको पाने की अभिलाषा नहीं रखता ऐसा राग, भय, एवं क्रोध से रहित मुनि स्थितप्रज्ञ कहा जाता है । २।५६ ।। स्थितप्रज्ञ के उपर्युक्त लक्षण से निम्नलिखित तथ्य स्पष्ट होते हैं-(१) वह (सुखभोग की) कामना से रहित होता है (२) वह अपने आप में संतुष्ट रहता है (३) दुःख में उद्विग्न नहीं होता तथा सुख की अभिलाषा नहीं रखता अर्थात् दुःख एवं सुख में सम रहता है। (४) वह राग, भय एवं क्रोधादि विकारों से रहित होता है। . गीता में स्थितप्रज्ञ को स्थिरबुद्धि एवं स्थिरमति शब्दों से भी अभिहित किया गया है। स्थिरबुद्धि शब्द का प्रयोग करते हुए कहा गया है न प्रहष्येत प्रियं प्राप्य नोद्विजेत प्राप्य चाप्रियम । स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ गीता ५।२० अर्थात् स्थिरबुद्धि , मनुष्य असं मूढ एवं ब्रह्मविद् होकर ब्रह्म में स्थित रहता है तथा प्रिय वस्तु को प्राप्त कर हषित नहीं होता और अप्रिय वस्तु को प्राप्त कर उद्विग्न नहीं होता 'स्थिरमति' शब्द का प्रयोग भी स्थितप्रज्ञ के समत्व लक्षण में किया गया है, यथा समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवजितः ॥ गीता १२/१८ तुल्यनिन्दास्तुतिमौनी संतुष्टो येन केनचित् । अनिकेत: स्थिरमतिर्भक्तिमान मे प्रियो नरः ॥ गीता १२/१९ (शत्र और मित्र के प्रति सम रहने वाला, सम्मान एवं अपमान में समान रहने वाला, शीत, उष्ण तथा सुख एवं दुःख में सङ्ग (प्रासक्ति) रहित होकर सम रहने वाला, निन्दा एवं प्रशंसा में सम रहने वाला, सर्वथा संतुष्ट रहने वाला मौनी संन्यासी स्थिरमति होता है तथा वह भक्तिसम्पन्न स्थिरमति मनुष्य मेरा प्रिय है।) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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