Book Title: Vignptika Sangraha Author(s): Kalyankirtivijay Publisher: ZZ_Anusandhan View full book textPage 9
________________ ऑक्टोबर २००२ जय संजय नय गयताबराव, जियघणवण(वणघण?)सम समपावदाव ॥८॥ जगभूसण दूसणरित्ततत्त, मयसंमयमय नयसत्तपत्त । दिससंमय संमयसित्त मित्त-सम माणसवरतरगुत्त गुत्त ।।९।। गुरुतमतम महमहिपालजाल, जइवंदिय हयदुहवालमाल । हर भीसणभवभयभंगरंग, कलकेवलकमलासंग चंग ॥१०॥ इय चउम(मु)हवीरं सुरगिरिधीरं थुणइ जु पइदिण भत्तिनरु । सो जणमणरंजण दुहतरुभंजण भासुरसुंदर होइ सुर ॥११।। ॥ चतुर्मुखश्रीमहावीरस्तवनं पण्डितराज-पं. धर्मशेखरगणिकृतम् ।। श्रीसीमन्धरस्वामिविज्ञप्तिः ॥ श्रीसीमंधरदेव देवनरदाणवनायग, वंदिउ निम्मलकंतकंति मणवंछियदायग । सिववणपल्लवणंबुवाह दुहदोहगखंडण सोहगसुंदर मेरुधीर जय तिहुअणमंडण ॥१॥ दाणवमाणवरायजायसुरनायगखोहण वम्पहघायणजक्खलक्खथुय लोगविबोहण । जय जय संजय मुख(क्ख)दुख(सुक्ख) अइनिम्मलसोहण केवलकमलाकेलिगेह गुणगणमणिरोहण ॥२॥ निज्जियदज्जयरायरायमहिमंडलपावग तिहुअणगंजणलोहजोहबलपायवपावग । सग्गयनिग्गयरोगसोग जिणखंडियपावग करुणावल्लिसुकंद नंद सिवयरपुरपावग ॥३॥ मुणिवर । जय जय वीयराय ! गयभव विसमागम सारय तारय रायराय मुह सागसमागम । जलहर जलहर दुक्खलक्खहर हारिसमागमसोहग खोहगरोसदोसमयसीहसमागम ।।४।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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