Book Title: Updeshpad Mahagranth Satik Part 01
Author(s): Jinendrasuri,
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala
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श्रीउपदे__ शपदे
मनुजजन्मदुर्लभता.
॥८॥
दुरापमिति निगमनमिति ॥५॥
अर्थतानेव दृष्टान्तान् विस्तरतः क्रमेण भावयन्नाहःचोल्ल त्ति भोयणं बंभदत्तपरिवारभारहजणम्मि । सयमेव पुणो दुलहं जह तत्थ, तहेत्थ मणुयत्तं ॥ ६ ॥
गाथाभावार्थः कथानकादवसेयस्तच्चेदम् ;-अत्थि इह भरहवासे दाहिणभरहद्धमज्झखंडम्मि। निच्चमकंपिल्लं परभयाहि कंपिल्लनामपुरं ।।१।। सुइणा सीलेण धणेण भूरिणा बाढवूढमाहप्पो। सुमिणेवि जत्थ न कुणइ परदारालोयणं लोगो ॥२॥ दक्खिन्नामयजलही पियंवओ थिरगहीरचित्तो य । अइपउरो पउरजणो जायपमोओ सया सइ ।।३।। सज्जाईओ सुमणोहराउ अइफारतिलयकलियाओ। पुन्नागसंगसुगया रमणिज्जपयोहराओ य ॥४॥ सच्छायाओ सवओजुयाओ सरलाओ सुरहिगंधाओ। जत्थंतो रामाओ बहिया आरामपंतीओ ।।५।। उजलसवन्नतारुन्नयाउ पारद्धदुक्करवयाओ। लच्छीउ जत्थ सजणगिहेसु विहवंगणाओ य ।।६।। अविय जत्थ जिणमंदिरोवरि घणपवणपणोल्लिया पडायाओ रेहंति व धम्मियजणकित्तीओ सग्गचलियाओ ।। ७ ॥ तं च अणेगच्छेरयसारं पालेइ विउलबलकलिओ। इक्खागुवंसबसहो बंभो नामेण नरनाहो ||८| अइपीवरेहि अइदीहरेहि कत्थवि अपत्ततोडेहिं । जस्स गुणेहि व गुणेहिं दामिया सइ थिरा लच्छी ।।९। सामेण य दंडेण य भेएण उवप्पयाणकरणेण । अवसरपत्रोण जसो जेण पवित्थारिओ
दूर ।।१०॥ तस्सुब्भडरिउभडकोडिघडणउन्भडियपुरिसकारस्स । बहुपणयरयणखाणी चुलणीनामा य आसि पिया H॥११॥ अभविसु तस्स मित्ता निक्कित्तिममित्तिभावसंजुत्ता । चउरो चउराणणचउरबुद्धिकलिया महीपाला ॥१२॥
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