Book Title: Stotra Granth Samucchaya
Author(s): Trailokyamandanvijay
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti
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४
१.
प्रवर्तक-मुनिश्रीयशोविजयविरचिता
३.
॥। १. श्रीशङ्खेश्वरपार्श्वषट्त्रिंशिका ॥
॥ अथ पञ्चदशाक्षरचरणमतिशक्वर्यां मार्लिनीवृत्तम् । असमशमविलासं निर्जराचार्यवाचा ऽप्यगणितमहिमानं शुद्धबोधप्रदानम् । प्रभुमहमथ नौमि त्रायकं विश्वजन्तो- रतलकुगतिकूपाद् वर्यशङ्खेश्वरेशम् ॥१॥
॥ अथैकादशाक्षरचरणं त्रिभि इन्द्रवज्रच्छन्दः ॥
यद्यप्यबुद्धिस्तव सुस्तवेऽहं निःशक्तिको नाथ! तथाऽपि मेऽद्य | दोषापनोदक्षमवाग्विलासं त्वां वीक्ष्य चित्तं यतते स्तवाय IIRII
॥ अथैकादशाक्षरचरणमुपजतिवृत्तम् ॥ विचित्रमाधुर्यविलासिदेवासुरादिवाक्यैः सुहित श्रुतेस्ते । प्रमोददायी भविता मदीय- वाक्काञ्जिको देव ! रुचिप्रदानात् ||३||
नगणयुगलयुक्त मेन मध्ये प्रयुक्ता वगणयुगलनद्धा बद्धमोदप्रबन्धा इह भवति न केषां हारिणी चित्तवृत्तेर्मधुरपदविलासा मालिनी नागवाहैः ॥ उट्टवणिका यथा ।।। ।।। ऽऽऽ ऽऽ ऽऽ
२. आदौ तदुग्मेन विराजमाना मध्ये जवारेण विभूषिता या अन्ते गकारद्वयमण्डिता सा स्यादिन्द्रवज्रा विबुधप्रसिद्धा ॥
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उपेन्द्रवज्राचरणेन युक्ता स्यादिन्दवज्राचरणाभिरामा । कवीन्द्रलोकैः कथितोपजाति: तस्याः प्रभेदा बहवः प्रसिद्धाः ॥ चतुर्दशोपजातयस्तासां नामानि कीर्तिर्वाणी माला शाला हंसी माया जाया बाला । आर्द्रा भद्रा प्रेमा रामा ऋद्धिर्बुद्धिस्तासामाख्याः ॥
॥ अथैकादशाक्षरचरणं त्रिष्टुभि इन्द्रवजावृत्तम् ॥ श्रीपार्श्वनाथं भवघोरकूप - सन्तारवाग्दीर्घवरत्रमाप्तम् । सद्बोधनौतीर्णभवाब्धिपारं वन्दारुसन्तानकमानतोऽस्मि ॥४॥ निःशेषदोषानलनाशनीरं, त्वां ये श्रयन्ते गुणवल्लिमेघम् । तानुत्सुका निर्वृतिरेति शीघ्रं पद्मालया पद्ममिव प्रभाते ॥५॥

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