Book Title: Sramana 2008 01
Author(s): Shreeprakash Pandey, Vijay Kumar
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 6
________________ श्रमण, वर्ष ५९, अंक १ जनवरी-मार्च २००८ प्रज्ञापना-सूत्र एक समीक्षात्मक अध्ययन डा० श्रीप्रकाश पाण्डेय प्रज्ञापना जैन आगमिक साहित्य का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है । बारह उपांगों में प्रज्ञापना का विशिष्ट स्थान है । यह जैन आगम साहित्य का चतुर्थ उपांग है । इस उपांग के संकलयिता श्रीश्याम आर्य ने इसका नाम 'अध्ययन दिया है जोइसका सामान्य नाम है। इसका विशिष्ट और प्रचलित नाम प्रज्ञापना या पण्णवणा है। श्यामाचार्य ने स्वयं प्रज्ञापना का परिचय देते हुए कहा है कि - जिस प्रकार भगवान ने सर्वभावों की प्रज्ञापना (प्ररूपणा) उपदिष्ट की है, उसी प्रकार मैं भी प्रज्ञापना करने वाला हूं। अतएव इसका विशेषनाम प्रज्ञापना है। उत्तराध्ययन की तरह इस ग्रंथ का नाम भी 'प्रज्ञापनाध्ययन स्थिर किया जा सकता है। दोनों में अन्तर यह है कि जहां प्रज्ञापना का समग्र ग्रंथ एक अध्ययन रूप है वहां उत्तराध्ययन में अनेक अध्ययन हैं। 'प्रज्ञापना' शब्द का उल्लेख भगवान महावीर ने केवलज्ञान प्राप्त होने के पूर्व दस महास्वप्न देखे थे। तीसरे महास्वप्न के वर्णन के प्रसंग में उनके फल को बताते हुए भगवती में कहा गया है कि 'समणे भगवं महावीरे विचित्तं ससमय-परसमइयं दुवालसंगं गणिपिडगं आधवेति पन्नवेति परूवेति....' अतः स्पष्ट है कि भगवान महावीर द्वारा दी गयी देशनाओं का वास्तविक नाम प्रज्ञापयति, प्ररूपयति आदि क्रियाओं के आधार पर प्रज्ञापना या प्ररूपणा है। उन्हीं देशनाओं के आधार पर सम्भवतः इसका नाम प्रज्ञापना रखा गया है । इसके अतिरिक्त इसी उपांग में तथा अन्य अंग शास्त्रों में यत्र-तत्र प्रश्नोत्तर में, अतिदेश में, तथा संवादों में पण्णत्ते, पण्णत्तं, पण्णत्ता आदि शब्दों का अनेकशः प्रयोग हुआ है। प्रज्ञापना का महत्त्व प्रज्ञापना के प्रत्येक पद' के अन्त में 'पण्णवणाए भगवतीए ऐसा उल्लेख मिलता है जिससे पांचवें अंग आगम व्याख्याप्रज्ञप्ति या भगवती की भाँति उपांगों में प्रज्ञापना का विशेष महत्त्व परिलक्षित होता है। भगवतीसूत्र में अनेक स्थलों पर 'जहा पण्णवणाये कहकर प्रज्ञापना के १,२,५,६,११,१५,१७,२४,२५,२६ और २७ वें पद से प्रस्तुत विषय की पूर्ति करने हेतु सूचना दी गयी है । यह इस ग्रंथ की विशेषता है। * सहनिदेशक, पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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