Book Title: Sramana 2008 01 Author(s): Shreeprakash Pandey, Vijay Kumar Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi View full book textPage 9
________________ : श्रमण, वर्ष ५९, अंक १ / जनवरी-मार्च २००८ है।" द्रव्य, क्षेत्र काल, भाव इन चार भेदों में विषय निरूपण की पद्धति प्राचीन प्रतीत होती है । यह पद्धति भगवती में अनेक स्थलों पर दृष्टिगोचर होती है । परन्तु तत्त्व सात प्रकार के हैं यह व्यवस्था परवर्ती है। इससे आचार्य मलयगिरि ने जिस प्रकार प्रस्तुत आगम में सात प्रकार का विभाजन किया है वैसा ही मत श्याम आर्य का था, यह नहीं माना जा सकता । किन्तु उनके समय में जो परम्परा निश्चित थी उसके साथ प्रज्ञापना की समता दिखाने का प्रयास आचार्य मलयगिरि ने किया है । स्वयं प्रज्ञापना में सराग दर्शनार्य के निरूपण में निसर्गरुचि जीवों के लक्षण में जो गाथा (१२०) दी गयी हैं उसमें भी सात तत्त्वों का उल्लेख नहीं है। x प्रज्ञापना आर्य श्याम की रचना है किन्तु उन्होंने सभी बातें स्वयं विचार करके कही हों, ऐसा नहीं है । इनका प्रयोजन तो श्रुत परम्परा में से तथ्यों का संग्रह करना और उनका संकलन करना था। जैसे प्रथम पद में जीव के जो भेद बताये हैं, उन्हीं भेदों को लेकर द्वितीय स्थान आदि द्वारों को घटित करके प्रस्तुत नहीं किया बल्कि स्थान आदि द्वारों का जो विचार जिन विविध रूपों में पूर्वाचार्यों ने किया था, उन्होंने उन-उन द्वारों और पदों में उन उन विचारों का संग्रह एवं संकलन किया। अतः प्रज्ञापना उस काल की विचार परम्परा का व्यवस्थित संग्रह है। यही कारण है कि जब आगम लिपिबद्ध किये गये, तब उन-उन विषयों की समग्र विचारणा के लिये प्रज्ञापना का अतिदेश किया गया। पद विभाग एवं निरूपण का क्रम सूत्रकालीन साहित्य की यह विशेषता रही है कि ग्रंथ के प्रारम्भ में प्रतिपाद्य विषयों की सूची दे दी जाती है । 'न्यायसूत्र' आदि ग्रंथों में इस पद्धति का अनुसरण किया गया है । प्रज्ञापना में भी प्रारम्भ में उसके विषय-विभाग (सूत्र - २ ) की प्रज्ञापना उद्देश रूप में निर्दिष्ट है और बाद में एक-एक कर ३६ पदों का विवेचन किया गया है। । प्रज्ञापना में विषयों का निरूपण पहले लक्षण बना कर नहीं किया गया, अपितु विभाग- उपविभाग द्वारा किया गया है। भेद का जिस क्रम में निर्देश होता है उसी क्रम में उपभेदों की भी चर्चा होती है । किन्तु ग्रंथकार ने जहां जिस उपभेद का निरूपण संक्षिप्त है उसका निरूपण पहले कर पश्चात् विस्तृत भेदवाला उपभेद निरूपित किया 1 है । जैसे- सूत्र ३ में प्रथम जीव प्रज्ञापना निर्दिष्ट है और बाद में अजीव प्रज्ञापना । किन्तु चौथे सूत्र में पहले अजीव प्रज्ञापना कर पश्चात् चौदहवें सूत्र से जीव प्रज्ञापना के प्रभेद निर्दिष्ट हैं । उसी प्रकार प्रज्ञापना सूत्र १४ में जीव के संसारी और असंसारी दो भेद र संक्षेप के कारण १५ वें सूत्र में असंसारी जीवों का १८वें सूत्र में संसारी जीवों का वर्णन किया गया है। इस व्यतिक्रम का कारण मलयगिरि के अनुसार अल्पवक्तव्य विषय का निरूपण पहले और बहुवक्तव्य विषय का निरूपण बाद में करना है। " Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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