Book Title: Sramana 1998 10
Author(s): Shivprasad
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 152
________________ श्रमण : अतीत के झरोखे में मधुसूदन ढांकी ने इस स्तोत्र और उसके रचनाकार से सम्बन्धित सभी प्रश्नों का अकाट्य साक्ष्यों द्वारा सटीक उत्तर प्रस्तुत किया है। ग्रन्थ के प्रारम्भ में प्रो० जगदीश चन्द्र जैन द्वारा लिखित पूर्वावलोक, पं० दलसुख मालवणिया द्वारा लिखित परोवचन एवं लेखकद्वय द्वारा लिखित प्रास्ताविक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वस्तुत: यह पुस्तक उच्च स्तर के शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगी। आज की भीषण मंहगाई के युग में भी इस अनमोल ग्रन्थ को अमूल्य ही वितरित करना प्रकाशक की उदारता का परिचायक है। सही अर्थों में यह ग्रन्थ अमूल्य ही है। ऐसे ग्रन्थरत्न के लेखन और प्रकाशन तथा उसके नि:शुल्क वितरण के लिए लेखक, प्रकाशक और प्रकाशन हेतु आर्थिक सहयोग प्रदान करने वाले ट्रस्टीगण सभी अभिनन्दनीय हैं। हिन्दी के महावीर प्रबन्ध काव्यों का आलोचनात्मक अध्ययन-लेखिकाडॉ० दिव्य गुणाश्री, प्रकाशक-विचक्षण स्मृति प्रकाशन, श्री मुनिसुव्रत स्वामी जैनमंदिर, दादासाहेबना पगलां, नवरंगपुरा, अहमदाबाद- ३८०००९; प्रथम संस्करण मई १९९८ ई०, आकार-डिमाई, पृष्ठ- १०+२७५; हार्डबोर्ड वाइडिंग, मूल्य-सदुपयोग। जिस प्रकार पूर्वकाल में प्राकृत-संस्कृत और अपभ्रंश भाषाओं में अनेक रचनाकारों ने भगवान् महावीर के चरित्र का गुणगान किया है उसी प्रकार इस युग में राष्ट्रभाषा हिन्दी में भी विभिन्न रचनाकारों ने प्रबन्धकाव्यों के रूप में उनके जीवन चरित्र का वर्णन किया है जिसे साध्वीरत्न दिव्यगुणाश्री जी ने अपने शोध प्रबन्ध का आधार बनाया है। शोध प्रबन्ध चार अध्यायों में विभक्त है। प्रथम अध्याय में ४ खंड हैं। इनमें पूर्व भूमिका, जैनधर्म की प्राचीनता, तीर्थंकरों की परम्परा में भगवान् महावीर और आधारभूत प्रबन्ध काव्यों का साहित्यिक परिचय दिया गया है। द्वितीय अध्याय में भगवान् का विस्तृत जीवन परिचय देते हुए उनके पारिवारिकजनों का वर्णन है। तृतीय अध्याय में प्रबन्धंग्रन्थों के भावपक्ष का विवेचन है जिसके अन्तर्गत उनमें वर्णित जैनधर्म, राष्ट्रीय भावना, युगीन परिस्थितियों आदि का एक सौ पृष्ठों में विस्तृत विवेचन है। चतुर्थ अध्याय में विवेच्य प्रबन्ध ग्रन्थों के कलापक्ष पर ७० पृष्ठों में प्रकाश डाला गया है। जैन विद्या के विशिष्ट अभ्यासी डॉ० शेखरचन्द जैन के निर्देशन में तैयार किया गया यह शोध प्रबन्ध वस्तुत: साध्वी जी द्वारा विद्वत् समाज को दिया गया एक अनुपम भेंट है। पुस्तक की साज-सज्जा आकर्षक और मुद्रण त्रुटिरहित है। ग्रन्थ को नि:शुल्क वितरित करना प्रकाशक की उदारता का परिचायक है। श्री लावण्य जीवनदर्शन : काव्यप्रणेता-आचार्य श्रीमद् विजयसुशील सूरि प्रकाशक-श्री सुशील साहित्य प्रकाशन समिति, राइका बाग, जोधपुर, राजस्थान३४२००१; प्रकाशन वर्ष- मई १९९७ ई०; पृष्ठ ८+१२०; आकार-रायल आठपेजी; मूल्य- २५ रूपया। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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