Book Title: Sirisiriwal Kaha Part 01
Author(s): Ratnashekharsuri, Bhanuchandravijay
Publisher: Yashendu Prakashan
View full book text
________________ वालकहा सिरिसिरि // 2 // तत्य य सेणिय राओ, रज पालेइ तिजय विक्खाओ। वीरजिणचलणभत्तो विहिअज्जियतित्थयरगुत्तो // 5 // जस्सत्थि पढमपत्ती, नंदा नामेण जीइवर पुत्तो / अभय कुमारो बहुगुण सारो चउबुद्धि भंडारो // 6 // तत्र च नगरे श्रेणिको नाम राजा राज्यं पालयति, कीदृशो राजा ?-त्रिजगद्विख्यातः पुनः ? वीरजिनचरणM भक्तः, तथा विधिनाऽजितमुपार्जितं तीर्थकर नामकर्म येन सः एवं विधः // 5 // यस्य श्री श्रेणिकराजस्य प्रथमपत्नी-प्रथम राज्ञी, नन्दानामाऽस्ति, यस्या नन्दायाः प्रधानपुत्रोऽभयकुमारनामाऽस्ति, कीदृशः ? | | बहुभिर्गुणैः सारः श्रेष्टः, पुनः ? चतुर्बुद्धिभाण्डागारम् // 6 // नुप्रास उच्यते" इत्युक्त लक्षणो वृश्यनुप्रासोऽवसेयः / दीर्घसमासाश्रयणादोजोगुणाभिव्यञ्जनेपि न प्रसाद हानिः, तस्य सर्वरस रचना माधारण्योक्तेः / " वित्तं व्याप्नोति यः क्षिप्रं शुष्कन्धनमिवानलः / स प्रसादः समस्तेषु रसेषु रचनासु च” इति साहित्य दर्पणः / 5. अत्र “तिजय विक्खाओ" इति विशेषणात्तस्य राज्ञः परम यशस्वितामिव्यञ्जना द्वर्णनीयस्योत्कप्रतीतेः प्रस्तुतस्य रसस्य परिपुष्टिः सुधीसंवेद्या / पूर्वार्द्ध यकारस्यासकृदावृत्या, उत्तरार्द्धणकारस्य वारद्वय मुपादानाचवृत्त्यनुप्रासावलङ्कारो। 6. “जस्थत्थि' इत्यत्र 'लुक'१ / 10 // इत्यनेन पूर्वस्वरस्थ लुगू द्रष्टव्या। उत्तराद्धरेकस्यासकृदावृत्त्यावृत्त्यनुप्रासः पूर्ववद्वोद्धव्यः / पारिणामिकी, औत्पातिकीत्यादिमे देन बुद्धश्चातुर्विध्यं द्रष्टव्यम् /

Page Navigation
1 ... 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135 136 137 138 139 140 141 142 ... 250