Book Title: Shwetambar Terapanth Mat Samiksha
Author(s): Vidyavijay
Publisher: Harshchandra Bhurabhai Shah

View full book text
Previous | Next

Page 41
________________ ३६ श्वेताम्बर तेरापंथ-मत समीक्षा | सूत्रमें चंपानगरीका वर्णन आया है, वहाँ पर 'अरिहंत चेइयाई बहुला' इत्यादि पाठ से उस समय में अरिहंतके अनेक मंदिर थे, वैसा सिद्ध होता हैं । दूसरी यह बात है कि आणंदादि श्रावकों ने अपने जीवनमें जो २ कार्य किये हैं, उन सभीका उल्लेख सूत्र में नहीं आया है । इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि उन्होंने मंदिर नहीं बनवाये थे, या संघ नहीं निकाले । आनंदादि श्रावकोनें प्रतिमाको प्रमाण की है, इस बातका पुरावा यह है कि व्रत उच्चारणके समय सम्यक्त्वका आलावा आया हैं । जिसमे समकित की शुद्धिके लिये अन्यदर्शनीय, अन्यदर्शनके देव तथा अन्यमतिओंने स्वीकार की हुई जिनमतिमाको वांदु नहीं - पूजा न करूं, इत्यादि पाठ मिलते हैं । और इससे जिनप्रतिमा तथा जिनमंदिर थे, यह भी सिद्ध होता है । तथा जहाँ प्राणातिपात विरमण, वगैरह बारहव्रत लिये हैं, वहाँ अनेक प्रकारके नियम किये हैं । उन नियमोंमें यदि जिनमंदिर कराने में पाप होता तो वह भी नियम कर देते कि - जिनमंदिर करवाऊं नही । ऐसा नियम नहीं करनेसे निश्चय होता है कि वे जिन मंदिर बनवाने में आरंभ नहीं समझे थे । उन श्रावकोंने जिनमंदिर बनवाएं हैं। इसका पुरावा यह है कि-नंदीमुत्रके ४६५ वे पृष्ठमें आणंदादि श्रावकों का इस तरह अधिकार है:- “उवासगदसा सुणं सवासगाणं नगराई उज्जागाईं चेइचाई वणसंडाई समोसरलाई रायाणो अम्मापियरो धम्मायरिया धम्मकदाओ" इत्यादि इसका मतलब यह है कि उपासकदशांगसूत्रमें आणंदादि श्रावकों के नगर, उद्यान, चैत्य (जिनमंदिर) वनखंड, समवसरण, राजे, मात-पिता, धर्मगुरु तथा धर्मकथा Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

Loading...

Page Navigation
1 ... 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98