Book Title: Shwetambar Terapanth Mat Samiksha
Author(s): Vidyavijay
Publisher: Harshchandra Bhurabhai Shah

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Page 18
________________ श्वेताम्बर तेरापंथ-मत समीक्षा। १३ २ +-+-RRORK निलयं ' वाला श्लोक धर दिया। इस श्लोक का अर्थ सब पडित अपनी २ बुद्ध्यनुसार करने लगे । परन्तु मनमाना अर्थ नहीं होनेसे राजा प्रसन्न नहीं होता था। विचारें पंडित लोग खंडान्वय-दंडान्वयसे अर्थ करने लगे, तथा प्रकृति-प्रत्यय वगैरह सत्र पृथक् पृथक् दिखा करके अपना पांडित्य दिखाने लगे, परन्तु राजाकी प्रसन्नता न होने लगी । और बिचारे विना दक्षिणाके अपना २ मार्ग लेने लगे। ऐसे सैंकडों पंडिन आए, परन्तु राजा सबका अपमान करने लगा । राजा उस धूर्तपुरोहितके ऊपर अधिकाधिक प्रस्तन होने लगा, और उसकी जो बारह हजारकी आमदनी थी, वह बढाकर चौवीस हजारकी कर दी । राजाके मनमें यह विश्वास हो गया कि-सारे देशमें यदि कोई पंडित है तो यह पुगेहितही है। एक दिन एक ब्राह्मणका लडका पुरोहितकी स्त्रीकी सेवा करने लगा। उसने एक दिन बात बनाकर कहा:-एक 'श्लोक ऐसा है कि जिसका अर्थ अपने राजा और आपके पति ये दोही जानते हैं । तीसरा कोई जानताही नहीं है। क्या आप उस श्लोकका अर्थ नहीं जानते हैं' ! स्त्रीने यह बात मनमें रखली । रात्रीको जब पुरोहितनी आए, तब झटसे स्त्रीने पूछा:'राजा जो श्लोक सब पंडितोंको पूछता है, उसका अर्थ क्या है ? ' पुरोहितने कहा:- तू समझती नहीं है। षड़कों भिद्यते मंत्रः, इस नियमानुसार यह बात तीसरेको नहीं कही जाती। ___ स्त्रीने बराबर हठ पकडी, और कहाः-'मुझको अगर अर्थ नहीं कहेंगे, तो मैं समजूंगी कि-आपका मेरे पर विश्वास नहीं है। और प्रेमभी नहीं है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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