Book Title: Shastra Sandesh Mala Part 20
Author(s): Vinayrakshitvijay
Publisher: Shastra Sandesh Mala
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________________ // 12 // * // 13 // - // 14 // // 15 // // 16 // // 17 // ततः शोकातुरः सोऽभून्मयोक्तं किं नु शोचसि / स प्राह चिरदृष्टोऽपि, त्वयाऽहं विस्मृतोऽस्मि यत् . मयोक्तं कुत्र दृष्टोऽसि, सोऽब्रवीद् बहवोऽभवन् / पुरेऽसंव्यवहाराख्ये, मादृशास्ते वयस्यकाः न व्यक्तस्ते सखाऽभूवं, तदैकाक्षादिषु भ्रमन् / पञ्चाक्षपशुसंस्थाने, यदाऽभूः संज्ञिगर्भजः जातस्तदा सखा तेऽहं, नाव्यक्तत्वात्तु लक्षितः / अनन्तशः परिभ्रम्य, ततोऽनन्तेषु धामसु. नरवाहनराजस्य, नन्दनो रिपुदारणः / . त्वं सिद्धार्थपुरे जातस्तदाऽहं लक्षितस्त्वया सखाऽहं ते मृषावादो, ललितोऽसि मया सह / अत्यन्तकुशलोऽभूस्त्वं, मम प्रेमानुभावतः पृष्टश्चाहं त्वया मेऽभूत्, कुतः कौशलमीदृशम् / मयोक्तं भगिनी मेऽस्ति, मायाख्या तत्प्रसादतः त्वयोक्तं दर्शनीया मे, साऽऽत्मीया भगिनी त्वया / प्रतिपन्नं वचस्तच्च, तावकीनं मया तदा तदेषोऽत्र पुरस्कृत्य, भगिनीमहमागतः / स्मरंस्तद्वचनं शोके, हेतुर्मे त्वदुपेक्षणम् मयोक्तं भद्र ! वृत्तान्तं, व्यक्तं नैनं स्मराम्यहम् / तथाऽपि स्मरतो नेत्रे, त्वदर्शनविकस्वरे तन्न शोकस्त्वया कार्यो, ज्ञेयोऽहं प्राणसन्निभः / तेनोक्तमियता सिद्धं, मम सर्वं प्रयोजनम् / दर्शिताऽऽत्मीयभगिनी, मायेति भुवि विश्रुता। प्रियनाम्ना बहुलिका, कार्याऽऽज्ञाऽस्याः सदा त्वया // 18 // // 19 // // 20 // // 21 // // 22 // // 23 //

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