Book Title: Savdhan Devdravya Vyavastha Margadarshak
Author(s): Vichakshansuri
Publisher: Kumar Agency

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Page 20
________________ मनुष्य में भी एक सामान्य मनुष्य की हिंसा की अपेक्षा उत्तरोत्तर शेठ श्रीमंत शक्ति सम्पन्न तथा राजा, महाराजा, चक्रवर्ती, साधु, उपाध्याय, आचार्य, गणधर - तीर्थकर की हिंसा में अधिक - अधिक पाप लगता है। क्योंकि एकेन्द्रिय से लगाकर तीर्थकर तक के जीव उत्तरोत्तर विशेष विशेष पुण्यवान होते हैं। विशेष विशेष पुण्यवानों की हिंसा करने में उत्तरोत्तर हिंसक के दिल में निर्दयता और क्रूरता अधिक अधिक आती है। उसी तरह कोई आदमी सामान्य किसी आदमी का धन खा जावे उसकी अपेक्षा जीवदयादि का द्रव्य खा जावे तो ज्यादा पाप का बन्ध करे | उससे भी साधारण द्रव्य - श्रावकादि का द्रव्य, साधु आदि का द्रव्य-ज्ञान द्रव्य तथा देवद्रव्य का भक्षण करने वाले को उत्तरोत्तर अधिक अधिकतर और अधिकतम पाप का बन्ध होता है। सब जीवों में तीर्थङ्करसर्वश्रेष्ठ है। उसी तरह सर्व - द्रव्य में देवद्रव्य सर्वश्रेष्ठ कोटी का द्रव्य है। तीर्थङ्कर की हिंसा करने की प्रवृत्ति करने वाला जैसे घोर पापी SO93E

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