Book Title: Samaysar
Author(s): Kundkundacharya, 
Publisher: Bharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir

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Page 30
________________ स्वजातिपर्यायोपचारक असद्भूत व्यवहार, जैसे परमारण बहुप्रदेशी है, आत्मा भी गुण है आदि कथन । (११५) एकातिगुणं अन्यजातिद्रव्योपचारक असद्भुत व्यवहार, अस ज्ञान गुण हो सकल द्रव्य है आदि कथन । (११६) स्वजातिगुणे स्वजातिद्रव्योपचारक असद्भुत व्यवहार जैसे द्रव्य के रूपको ही द्रव्य कहना, एप परमाणु आदि ।।११७) एकबातिगुणे अन्यजातिपर्यायोपचारक असदभुत ध्यबहार, जैसे ज्ञान ही धन है आदि कथन । (११८) स्वजानि गुण स्वजातिपर्यायोपचारक असनत व्यवहार, जैसे ज्ञान पर्याय है आदि कथन । (११६) एक जातिपर्याय अन्यजाति द्रव्योपचारक असद्भुत व्यवहार, जैसे शरीरको ही जीब कहना।।१२०) स्वजातिपर्याये स्वजातिथ्योपचारक असत व्यवहार, जैसे पृथ्वी आदि पुन गल स्कन्धको द्रव्य कह देना । (१२१) एकजातिपर्याये अन्यजातिगणोपचारक असद्भुत उपवहार, 1 जैसे पण पक्षी आदिके शरीर को देखकर यह जीव है आदि कथन करमा । (१२२) स्वजातिपर्याये स्वजातिगुणोपचारक असद्भूत व्यवहार, जैसे अहिंसाको गुण व विशिष्ट रूपको देखकर उत्तम रूप वाला कहना । (१२३) संश्लिष्ट स्वजात्युपचरित असद्भूत व्यवहार, जैसे यह परमाण इस स्कंधका है आदिकथन । (१२४) असंश्लिष्ट स्वजात्युपचारित असद्भत व्यवहार, जैसे ये पुत्र स्त्री आदि इम जीवके हैं आदि कथन । (१२५) संश्लिष्ट विजात्युपचारित असद्भुत व्यवहार, जैसे यह शरीर इस जीव का है, आदि कथन । (१२६) असंशिलष्ट विजात्युपचारित असद्भुत गवहार, जैसे यह धन वैभव मेरा है आदि कथन 1 (१२७) संश्लिष्ट स्वजातिविजात्युपचरित असद्भूत व्यवहार, जैसे यह आभूषणसज्जित कन्या मेरी है आदि कथन । (१२५) अंसविनष्ट स्वजातिविजात्युपरित असद्भूत व्यवहार, जैसे ग्रह ग्राम नगर मेरा है आदि कथन । (१२६) पर कतत्व अन्पचरित अमद्भुत व्यबहार, जैसे पुदगल कर्मने जीवको रागी कर दिया आदि कथन । (१२६ए) परभोक्तृत्त्व अमद्भूत व्यवहार, जैसे जीव पुद्गलकमको भोगता है आदि कथन । (१२६वी) परकर्तृत्व उपचरित असद्भूत व्यवहार, जैसे जीव घट पट आदिका कर्ता है आदि कथन । (१३०) परकर्मत्व असदभत व्यवहार, जैसे जीवके द्वारा ये पृण्य पाप बनाये गये आदि कथन । (१३१) परकरणत्व असद्भूत व्यवहार, जैसे जीव कषाय भाबके द्वारा पौद्गलिक कर्मों को बनाता है भादि कवन 1 (१३२) परसंप्रदानत्व असद्भूत व्यवहार, जैसे पिताने पुषके लिये मकान बनाया आदि कथन । (१३३) परापादनत्व असद्भूत व्यवहार, जैसे जीवसे इतने कर्म झड़कर अलग हो गये आदि कथन । (१३४) पराधिकाणत्व असदभूत ब्यवहार, जैसे जीवमें कर्म ठसाठस भरे हुये है आदि कथन । (१३५) परस्वामित्व असदभूत व्यवहार जैसे मेरा यह धन वैभव शरीर आदि है का कथन । (१३६) स्वजातिकारणे स्वजातिकार्योपचारक ध्यवहार, जैसे रिसा आदिक दुःख ही है, आदि का प्रतिपादन । (१३७) एकजातिकारणे अन्यजाति कार्योपचारक व्यवहार, जैसे अन्न छन प्राण है आदि कथन । (१३८) स्वजातिकायें स्वजातिकारणोपचारक व्यवहार, जैसे श्रत ज्ञान भी मतिज्ञान है आदि कथन । (१३६) एक जातिकायें अन्यजातिकारणोपचारक व्यवहार, जैसे घटाकारपरिणत ज्ञान घट है आदि कथन । (१४०) एकजात्यल्पे अन्यजातिपूर्णोपचारक ध्यवहार, जैसे राज घराने में यह नौकर सर्वध्यापक है आदि कथन । (१४१) स्वजात्यल्प स्वजातिपूर्णोपचारक व्यवहार, जैसे सम्मक् मतिज्ञान केवल ज्ञान है आदि कथन । (१४२) एक जात्याधारे अन्यजात्याधेयोपोचारक व्यवहार, जैसे मंचपर बैठकर विद्वान प्रवचन करें तो कहना कि इस मंचने बड़े प्रवचन किये । (१४३) स्वजात्याधारे स्वजात्यायोपचारक व्यवहार, जैसे इस गरुके उदरमें हजारों शिष्य पड़ें हैं। ११४४) एक जात्याधेये अन्यजात्याधारोपपारक व्यवहार, जैसे डलियामें केला रखकर बेचने वालेको केला कहकर पुकारना । (१४५) स्वजात्याधेये स्वजात्याधारोपचारक व्यवहार जैसे मौजसे मां की गोद में बैठे हुये बालकका नाम लेकर मांको पुकारना। (१४६) तद्वति तदुपचारक पवहार, जैसे लाठी वाले पुरुषको लाठी कहकर पुकारना । (१४७) अतिसामीप्ये सत्त्वोपचारक व्यवहार, जैसे नरम (अन्तिम) भवसे पूर्व के भनुष्य भवको भी चरम कहन । (१४८) भाविनि भूतोपचारक व्यवहार, जैसे वें गुणस्थान में औपमिक या क्षायिक भाव कहना। (४६) तत्सदृशकारणे तदुपधारक व्यवहार, जैसे कर्मोदयजनित विकार इस जीबके लिये शल्य है। (१५.) सणे एकत्योपचारक व्यवहार, जैसे गेहूं दानोंके ढेरको गई एक वचन कहकर कहना। (१५१) आश्रये आश्चयी-उपचारक व्यवहार जैसे राजा प्रजाके गुण दोषोंको उत्पन्न करता है, आदि कथन ।

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