Book Title: Pravachansaroddhar Part 2
Author(s): Nemichandrasuri
Publisher: ZZZ Unknown
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प्रवचन
सारोद्धारे
सटीके
द्वितीयः खक:
१६८३॥
मोयाफलं पढोली घोसाइकल च oea दाइ तपfडबद्ध जं नो हव तं कप्पमचित्तं ॥१००॥ afeng - जन-मज्झिमभेहि होइ तिविद्ममत्त चउहार-सचित परिच्चाए विकटुमेएज ॥ १०१ ॥ तिविहारेण जहन्ने मज्झिमए कयचित्तवाधारो तत्थाणाहारयत्यु कप्पड सव्वावि रमणीए || १८३॥ प्रायंबिलमवितिविहं उकिट्ट जहन्नमज्झिमपएहि । निष्णेहं ज वियलंपू / स् ) वाईपकप्पए तस्य ॥ १०३॥ सिसव 'सुठि मिरी मेही सोवच्चल व बिडलवणं । हिगु-सुगंधिसुबाई पकtor साइमं वत्थू ॥ ॥ १०४ ॥ कारणजाएग जईण प्रत सिह हविज्ज तिमियं वा । पिट्ठ जलेण रवं घुग्घुरि छुट्टाइ 'सिद्धेणं ॥ १०५ ॥ * पवड वडिया रुक्खा सिद्धा तिमणी कया हवइ कप्पा भज्जियघण्णं तिष्णवण्ण कट्टवलं सिणेहवियल गं ॥ १०६॥ Roar word पिया दुषेण सिद्ध साइमयं । वेसण बग्धाराई हलिपमिई प्रकच १८७। तिमिरं काउं नो सक्कड़ तं तं न कयह रयाइ । पायें हिंदु न कप्पड़' दुकय दोसप्पसंगो जम्हा ॥ १०८ ॥ daवर्ण तंबोल armed नेव अबिलम्म तवे । जलमित्रम' नाहारं कप्पइ सम्यपि तत्थ ठिए ॥१०३॥ सोवो मुसिणजल कप्पड़ नो यण्णमेस विहि पाय । सोवोरं सिद्धपिट्ठ निष्णे वियलमुक्किट्ठे ॥ ११०॥ घुरिया हिपमा कपए भयणा । भज्जियधण्णाईयं सत्यंपिकप जहन्ने ॥ ११६ ॥ कदलीफलम् । २ पंडोली- मु. पटोले तु पाण्डुः कुलकः कर्कशः । राजीफलः कफहरो राजमान्योऽमृता फल :" इति निघण्टु मा ३६० 'परवर' इति तत्र परिशिष्टे प. ३१८ ॥ ३ पटोला लघुद्राक्षा तथा पटोला में डिकाकारफलविशेषा || इयं गाथा D L नास्ति ॥ ४ ॥ विविहं नं विमलपूवाई' इति अभिधानराजेन्द्रकोशे 'आयबी' शब्दे || ४. सूठि मिरि ॥ ६ सिद्धं न DL७ पपवतिया-DL | पडि बढवा-मु. ॥ =तिमयी-D L विमणी- इति समिधान राजेन्द्रकोशे बायबलं शब्दे ॥ ६ दिन १० स्वादि काठिन्यसहित मण्डक-खाखरा -पर्पटिकादि यस्तिमितुम आ न शक्यते तत् माचाग्लेऽकल्प्यम् | ११ पाय सु.॥ १२ कयदोपसंगम- pla १३०० सु. ॥ १४० ॥ १५ हिंगुप्पमुद्दा- मु. हिंगुपमुद्दाए-DL १६ एप्प-D. D.
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२
परिशिष्टे
लघु
प्रवचन
मारोद्वार
गाथा
१०.१११
१६८३॥

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