Book Title: Prakarana Ratnakar Part 1
Author(s): Bhimsinh Manek Shravak Mumbai
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek
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एन्छ
प्रकरणरत्नाकर नाग पहेलो. ॥सवैया इकतीसाः॥-जेसै कोउ मूरख महासमु तरिबेको, जुजानिसों उद्यत जयो है तजि नावरो; जेसै गिरिउपरि विरषफल तोरिवेकों बामन पुरुष कोउमंग उता वरो; जैसे जलकुंममें निरखी शशि प्रतिबिंब ताके गहिबेकों कर नीचो करे मावरो; तैसें मै अलपबुद्धि नाटिक आरंजकीनो, गुनीमोहि हसेंगे कहेंगे कोउ बावरो ॥१॥ __ अर्थः-जेम कोई मूरख मनुष्य महासागरने तरवा चाहै अने वाहाणने बोडी हाथवडे तरवानो उद्यम करे, तो कार्य केमबने; जेम कोई वामन पुरुष होय अने पहाड उपर वृक्ष होय तेनां फलतोडवाने उतावलो थको उमंग करे, ते कार्य केवी रीते बनी शके ? वली एक त्रीजो दृष्टांत कहे के, जेम पाणीना कुंभमां चं उनुं प्रतिबिंब पडेलुं जोईने कोई नादान तेने साचो चं समजी हाथ नीचो करे तो तेना हाथमां चंजमा केवी रीते श्रावे ? तेमज हुँ अल्पबुकि बु, श्रने श्रावा ना टकग्रंथनो श्रारंज में कीधो , ते मारोवारंज सफल नही थशे तेवारे बीजा गुण वान पुरुषो कहेशेके, जु था ग्रंथनो श्रारंज करे एवं कहीने गुणीजनो मने बावरो जाणी दशी काढशे ॥ १॥
वली ए कार्य करवाने साहस करे पुनः ॥सवैया इकतीसा॥-जैसे कोउ रतनसों वींध्यो है रतन कोज, तामें सूत रेशमकी दोरी पोश् गई है, तैसै बुद्धीटीका करीनाटिक सुगम कीनो तापरि अलप बुद्धि सुछि परिनई है; जैसै काहु देसके पुरुष जैसी नाषा कहै, तैसी तिनहुके बालकनी सिखलई है, तैसै ज्यों गरंथको थरथ कह्यो गुरु त्यों हमारीमति कहिबेको सावधान नई है॥१३॥
अर्थः-जेम कोई हीरानी कणीवमे कोई कठण रतनने आगलथीवीं धीराख्यु होय, ने ते पड़ी तेमां पटुवो रेशिमनी दोरी परोवे ते सुगम चालीजाय तो तेम आ कार्य पण थशे. केमके मुनि अमृतचंद अने पांमेराजमल जेवा पंडितो थया तेमणे श्रा ग्रंथनी टीका बालबोधमां करीने या नाटकग्रंथने सुगम कस्यो , तो तेउपर मा हरी अल्प बुधि ले तोपण था ग्रंथमा सुधी रीते परणमी गई , तेथी श्रा कार्य नेविषे महारी समर्थाश्नो दृष्टांत देखाएं बंः- जेम कोई देशनो वसनारो पुरुष पो तानी देशनाषामां बोलेथने तेनो बालक होय तेपण तेनीपासे रहेतोथको ते नाषा शीखी ले बे; तेमज था कार्य पण जे. केमके मारा गुरुए था ग्रंथनो अर्थ मने क ह्यो , तेज प्रमाणे या ग्रंथनो अर्थ केहेवाने मारि बुद्धि सावधान थश्वे. एटले आगल कहेलो पश्चाताप मट्यो ॥ १३ ॥
हवे पोताना सामर्थ्यनुं कारण बतावे. ॥सवैया इकतीसाः॥-कबहों सुमति व्है कुमतिको बिनाश करै, कबहों विमल ज्यो
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