Book Title: Pind Niryukti
Author(s): Manekyashekharsuri, Kanchanvijay
Publisher: Devchand Lalbhai Pustakoddhar Fund

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Page 8
________________ प्रकाश कीय निवेदन। क्षमा- प्रासैषणाना दोषोनुं निरूपण करवामां आव्युं छे. ते दोषो टाळेली जे भिक्षा छे, ते भिक्षा संयमने गुणकारी छे. ते वात आ रत्नीया- ग्रंथमां निरूपण कराइ छे. वर्यपेता पिण्डनियुक्तिना कर्ता श्रीभद्रबाहुस्वामी छे. तेनी नियुक्ति गाथाओ ६७१ अने भाष्य गाथा ३७ छे. आनी श्रीमलय श्री. IN गिरिजीनी बृत्ति ६७०० श्लोकप्रमाण छे. ए नियुक्ति, भाष्य अने वृत्ति आगमोद्धारक आचार्य श्रीआनंदसागरसूरिजीए संपादित पिण्ड करेली, अमारी ग्रंथमाळाना ४४ मा ग्रन्थाक तरीके प्रसिद्ध करवामां आवेली छे. नियुक्तिः। वृत्तिः-आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिए आनी उपर शिष्यहिता नामनी टीका ग्रन्थान १३५० सुधी रची हती, बाकी रहेली श्री. देवाचार्यना शिष्य वीराचायें १७५० श्लोकप्रमाण रची. आथी ते वृत्ति ३१०० श्लोकप्रमाण थई. तेनो आदि अने अंत भाग आ | अन्धना परिशिष्ट ९ मां आपवामां आवेलो छे. चंद्रगच्छ:-चंद्रगच्छीय सर्वारगच्छीय ईश्वरगणिना शिष्य वीरगणिए दधीप्रद(दाहोद) मा ७६९१ श्लोकप्रमाणनी आनी वृत्ति रची छे. तेमां तेमना गुरुभाइओ महेन्द्रसूरि, पार्श्वदेवगणी, देवचंद्रगणी आधारभूत हता. आ वृत्तिने नेमिचंद्रसूरिए तथा जिनदत्तसूरिए अणहिलपूरपाटणमां संशोधन करी हती, तेनो रचना सं. ११६९ छे. आ प्रत हालमां छाणीना भंडारमा ताडपत्र उपर छे. दीपिका:-अंचलगच्छीय मेरुतुंगसूरिजीना शिष्य माणेक्यशेखरनी श्लोक २८३२ नी छे. जेनो आदिअंत भाग परिशिष्ट १० मां आपवामां आवेलो छे. Jain Education Intel For Private & Personel Use Only www.jainelibrary.org

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