Book Title: Pind Niryukti Author(s): Manekyashekharsuri, Kanchanvijay Publisher: Devchand Lalbhai Pustakoddhar Fund View full book textPage 7
________________ प्रकाशकीय निवेदन. मनकना पिता श्रीशय्यंभवसूरिने नमस्कार करीने जणाववानुं के मूळ सूत्रनी अंदर आवेला श्रीदशवकालिकसूत्रमा पांचमुं अध्ययन पिण्डैषणा नामर्नु छे. तेनी नियुक्ति श्रीभद्रबाहुस्वामी महाराजे करी पण ते नियुक्ति मोटी होवाथी तेने जुदा ग्रंथरूपे राखी. ते आ पिण्डनियुक्ति नामनो ग्रंथ छे. पिण्डनियुक्ति श्रीमलयगिरि महाराजनी टीका सहितनी पूर्वे अमारी संस्थाए अन्थांक ४४ तरीके छपावी छे अने अत्यारे आ क्षमारत्ननी अवचुरि तेनी बीजी टीका ने दीपिकाना आदि अंत भाग साथे अन्यांक १०५ तरीके छपावी छे. अमारी आ श्रेष्ठिदेवचंद्र लालभाई जैन पुस्तकोद्धारक फंड नामनी संस्था श्रुतज्ञानना प्रकाशन माटे जे उद्देशयी स्थपाई छे, ते उद्देशे आज सुधीमा १०४ ग्रंथो प्रगट करी शकी छे अने १०५ मा श्रीपिण्डनियुक्तिअवचुरी नामना ग्रंथने प्रगट करे छे. परमपूज्य ध्यानस्थस्वर्गत आगमोद्धारक आचार्य श्रीआनंदसागरसूरीश्वरजी महाराजनी इच्छा एवी हती के अवचुरीनुं साहित्य प्रगट थर्बु जोईए. ए हेतुथी अमे आगमपंचांगीना जे कोई अद्यावधि अमुद्रित ग्रंथो होय ते ग्रंथोने मुद्रित कराववा उद्यम करवा नक्की कर्य छे. पिण्डनियुक्तिनुं अवतरण, विषयः-सावध अने निरवद्य एवो आहार होय छे, परंतु मुनिराजोने निरवद्य एवो आहार न लेवा लायक छे. तेनुं निरूपण करनारो ते आ ग्रंथ-आगम, ते पिण्डनियुक्ति. आनी अंदर पिण्डना उद्गम, उत्पादना, एषणा अने Join Education Intematon For Private Personel Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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