Book Title: Nal Damayanti
Author(s): Purnanandvijay
Publisher: Purnanandvijay

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Page 132
________________ पने सूक्ष्म (आभ्यंतर) मन को स्वाधीन करने में ज्यादा सफल नहीं ने पाये अतः काली नागन से भयंकरतम भोगैषणा के मालिक बने लस्वरुप प्रथम स्वर्ग के इन्द्र महाराज के उत्तर दिक्पति कूबेर नाम का व बना तदंतर दमयंती साध्वीजी भी स्वर्गवासिनी बनकर देवायुष्य पूर्ण किया और वही दमयंती कनकवती के रुप में अवतरित हुई है। / आज तुम्हारे से विवाहित होकर नेमिनाथ प्रभु के चरणों में दीक्षित नकर मुक्तिगामिनी बनेगी। .. वसुदेवजी ! तुमने जो प्रश्न किया था कि, मनुष्ययोनि प्राप्त / स्त्री के विवाह में देव को आने का प्रयोजन कौनसा ? सो मैंने इतने भवों का मेरा तथा कनकवती का संबंध तुम्हें सुनाया है / संसार में रागदशा बड़ी ताकतवाली होने के नाते मैं भी कितने ही भवों में मेरी पत्नी 1.बनी हुई, कनकवती को पुनः प्राप्त करने की इच्छा रखें यह सब राग / का प्रबल कारण है / मैं अच्छी तरह से जानता था कि, देवयोनि का देव मनुष्यस्त्री से विवाहित होता नहीं है परंतु "स्नेहो हि याति जन्मशतान्यपि" अर्थात स्नेहपाश सैकड़ों भवों को हानि करने का कारण बनत है। - एक दिन मैं महाविदेह क्षेत्र में गया था वहां पर 'विमलस्वामी' तीर्थकर परमात्मा के श्रीमुख से जो वृत्तांत सुना था वही मैंने कहा है। इतना कहकर कुबेर देव' स्वर्ग में पधारे और वसुदेवजी कनकवती को लेकर द्वारका पधारे। हेमचन्द्राचार्य रचित त्रिषप्टि शलाका पुरुषचरित्र पर्व 8 सर्ग तिसरा - समाप्त - 133 P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust

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