Book Title: Kailas Shrutasagar Granthsuchi Vol 19
Author(s): Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba
Publisher: Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba

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Page 448
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir हस्तलिखित जैन साहित्य १.१.१९ ४३३ श्राव. जेठमल, मा.गु., पद्य, आदि: सूरवीर सिर मुकट समान; अंति: उत्तम जिण फल कीधो एम, गाथा-१७. २. पे. नाम. सनत्कुमार सज्झाय, पृ. १अ, संपूर्ण. सनत्कुमारचक्रवर्ती सज्झाय, मु. खेम, मा.गु., पद्य, वि. १७४६, आदि: सुरपति परसंसा करइ; अंति: कारणै थयो सिव अवतारी, गाथा-१४. ३. पे. नाम, जीवसंख्या अल्पबहुत्व विचार, पृ. १अ, संपूर्ण. __प्रा.,मा.गु.,सं., गद्य, आदि: सुहम सुहमा परमाणु; अंति: पुग्गलायति. ४. पे. नाम, औपदेशिक श्लोक संग्रह, पृ. १आ, संपूर्ण. औपदेशिक श्लोक संग्रह, पुहि.,प्रा.,मा.गु.,सं., पद्य, आदिः (अपठनीय); अंति: (अपठनीय), श्लोक-१. ८०९५२. जिनलाभसूरि देसना, संपूर्ण, वि. १८७९, चैत्र अधिकमास शुक्ल, १४, मंगलवार, मध्यम, पृ. १, ले.स्थल. अजीमगंज, जैदे., (२५४११, १०४३१). जिनलाभसूरि देशना, मु. वसतो, मा.गु., पद्य, आदि: पूज्य श्रीजिनलाभ; अंति: इम वसतो ये आसीस, गाथा-१५. ८०९५४. शियलनी नववाड, अपूर्ण, वि. २०वी, मध्यम, पृ. २-१(१)=१, दे., (२५४१२, १५४२८-३३). ९वाड सज्झाय, उपा. उदयरत्न, मा.गु., पद्य, वि. १७६३, आदिः (-); अंति: (-), (पू.वि. प्रारंभ के पत्र नहीं हैं व प्रतिलेखक द्वारा अपूर्ण., ढाल-२ की गाथा-२ अपूर्ण से है और ढाल-६ तक लिखा है.) ८०९५५. महावीरजीरो स्तवन, संपूर्ण, वि. १९वी, श्रेष्ठ, पृ. १, जैदे., (२४४११, ९४२३). महावीरजिन स्तवन-जालोरगढ, मु. जयसागर, मा.गु., पद्य, आदि: भवियण पूजा करज्यो रे; अंति: मुगती तणा फल होय, गाथा-१०. ८०९५६. विचार संग्रह, संपूर्ण, वि. १९वी, मध्यम, पृ. १,प्र.वि. प्रतिलेखन पुष्पिका मिटाई हुई है., जैदे., (२४.५४१०.५, १३४१५). विचार संग्रह , प्रा.,मा.ग.,सं., प+ग., आदि: जीवास्तिकाय द्रव्य; अंति: गुण थकी अवगीह गुणे. ८०९५७. (+) वरदत्तगुणमंजरी कथा व महावीरजिन स्तवन, अपूर्ण, वि. १९वी, मध्यम, पृ. १, कुल पे. २, प्र.वि. संशोधित., जैदे., (२४४११.५, १३४४५). १. पे. नाम. ज्ञानपंचमीपर्व स्तवन-वरदत्त गुणमंजरी कथा, पृ. १अ, संपूर्ण. ज्ञानपंचमीपर्व स्तवन, पंन्या. जिनविजय, मा.गु., पद्य, वि. १७९३, आदि: (-); अंति: वसे सकल भवि मंगल करो, प्रतिपूर्ण. २.पे. नाम. महावीरजिन पारणा स्तवन, पृ. १अ-१आ, अपूर्ण, पू.वि. अंत के पत्र नहीं हैं. महावीरजिन स्तवन-पारणागर्भित, मु. माल, मा.गु., पद्य, आदि: श्रीअरिहंत अनंत गुण; अंति: (-), (पू.वि. गाथा-१५ अपूर्ण तक है.) ८०९५८. (#) नेमराजिमती सज्झाय, संपूर्ण, वि. १९वी, मध्यम, पृ. १,प्र.वि. अक्षरों की स्याही फैल गयी है, जैदे., (२६४१२, १३४३०). नेमराजिमती सज्झाय, आ. सोमविमलसूरि, मा.गु., पद्य, आदि: कपुर होवै अति उजलो; अंति: जेहने जेहसू राम, गाथा-८. ८०९५९ (4) शंखेश्वरपार्श्वजिन स्तवन, संपूर्ण, वि. २०वी, मध्यम, पृ. १, प्र.वि. अक्षरों की स्याही फैल गयी है, दे., (२६.५४१२, ९४२२). पार्श्वजिन स्तवन-शंखेश्वरतीर्थ, मु. क्षमाकल्याण, मा.गु., पद्य, वि. १८६६, आदिः श्रीसंखेसर पासजी रे; अंतिः साधु क्षमाकल्याण, गाथा-७. ८०९६० (+) बलभद्र सज्झाय, संपूर्ण, वि. १९वी, मध्यम, पृ. १, प्र.वि. हुंडी अवाच्य है., संशोधित., जैदे., (२३.५४११, १३४३६). बलभद्रकृष्ण सज्झाय, मु. लावण्यसमय, मा.गु., पद्य, आदि: द्वारिका हंति नीसर; अंति: ते पामे मोक्ष दुआरी, गाथा-२३. ८०९६१ (#) नेमिनाथ स्तवन, संपूर्ण, वि. १९वी, मध्यम, पृ.१,प्र.वि. पत्रांकवाला भाग खंडित है., मूल पाठ का अंश खंडित है, जैदे., (२४.५४११, १२४२७). For Private and Personal Use Only

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