Book Title: Jindutta Charit
Author(s): Gunbhadrasuri, Tonkwala, Mahendrakumar Shastri
Publisher: Digambar Jain Vijaya Granth Prakashan Samiti

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Page 229
________________ संसार की नीति है और श्रुति भी यही है कि पिता अपने को पुत्र कल्याणकारी प्राज्ञा- उपदेश देता है। आप इसे अन्यथा कर रहे हैं । आप मुझे मोहांधकार से भरा मार्ग दिखा रहे हैं ।। ८५ ।। ततः । सन्ति पुत्रास्तवान्येऽपि कस्मैचिद्दीयतां ग्रहं च साधयिष्यामि त्वत् समीपे निजं हितम् ॥ ८६ ॥ ये अन्य भी सब आपके ही पुत्र हैं। इनमें से किसी को भी आप अपना श्राधिपत्त्व प्रदान करें में तो भाप ही के सानिध्य में रह कर अपना आत्महित साधन करूँगा । जेनेश्वरी दीक्षा धारण कर मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्न करूँगा । ८६ ॥ इत्यादिकं ववन् शेषंमित्र तातादिभि बंहू बोषितः । प्रति जग्राह मनकल्य पवं तथा ॥ ८७ ॥ देश कोषादिकं तस्मे राज्याष्ट्रातिभिः । अभिषेकं विषायाशु वयो तत्र महोत्सये ॥ ८८ ॥ पुनः पिता एवं मित्र ने बहुत प्रकार समझाया किन्तु उसका उत्तर एक ही रहा पिता के पथ का अनुशरण करना। अधिक कहने पर उसने स्वीकृति दी । तब पिता का पद उसे, देश, कोषादि- राज्यालंकृति के साथ प्रदान किया। प्रथम मंगलाभिषेक कर महोत्सव पूर्वक भार दे दिया ।। ६७-६८ ॥ प्रन्येषां च तनूजानां यथा योग्यं प्रदाय सः । सर्वाः संभावयामास प्रकृतीः कृस्य कोविदः || ८ अन्य लघु भ्राताथों को भी उसने यथा योग्य पद प्रदान किये । सभी को प्रकृति स्वभावानुसार सम्भावित पद और कार्य प्रदान किये ।। ८६ ।। भारतास्ततो विगल राम विशुद्ध बुद्धिः । प्रो बाब चारू चरिता हित विस वृत्तिः ॥ रागेण रोष वशतो मानेन मुग्व मनसा रति मदनेन कैतवेन । यच्च ।। ६० [ १६७

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