Book Title: Jain Jatiyo ka Prachin Sachitra Itihas
Author(s): Gyansundar
Publisher: Ratna Prabhakar Gyan Pushpamala

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Page 61
________________ (६०) जैन जातिमहोदय. प्र-तीसरा. यह तो पहले पढ़ चुके है कि आचार्य श्री के पास वीरधवल नामके उपाध्याय अच्छे विद्वान थे एक समय रानग्रह नगरमें किसी यक्षने घडा भारी उपद्रव मचा रखाथा निसके जरिय जैनतो क्यापर सब नागरिक लोक दुःखी हो रहेथे बहुत उपचार किया पर उपद्रव शान्त नहीं हुवा इसपर संघने रत्नप्रभसूरिकि तलास कराइ तो आपका विहार मरूभूमिकी तरफ हो रहाथा तब राजगृहका संघ आचार्यश्री के पास आया और वहांका सब हाल अर्जकर उधर पधारने की विनंति करी सूरिजीने अपनी सलेखनाध्यायन आदि के कारणों से आपने अपने शिष्य वीरधवल उपाध्यायको आज्ञा दी कि हमारा वासक्षेप लेके वहां जावों और संघका संकट को दूर करो तदानुसार उपाध्यायजी क्रमशः, विहार कर राजगृह पहुँचे रात्रीमे आपने स्मशानभूमि मे ध्यान लगा दीया रात्रीमे यक्ष आया पहला तो उपाध्यायजीसे दूर रह बहुतसे उपसर्गका ढोंग वत. लाया पर आपके तपतेजसे व उपदेश से वह शान्त हो उपाध्यायजीसे अर्ज करीं कि इस नगरी के लोगोंने मेरी बहुत आशातना करी है उपाध्याय जीने उसे उपदेशद्वारा शान्त करदीया पर उसने कहा कि में आपकी आज्ञा सिरोद्धार करता हु पर मेरा नाम कुच्छ न कुच्छ रहना चाहिये. उपाध्याय जीने स्वीकार करलिया वस । सब उपद्रव शान्त हो गया संघमे और नगरमे आनंद मंगल और जैनधर्म की नयध्वनि होने लग गई उपाध्यायजीने कीतनेहो काल तो उसी प्रान्तमे विहार कर पवित्र तीर्थोकी यात्रा करी पुनः सूरिजी महारानकि सेवामे आये और वहाँका सब हाल कह सुनाया यक्ष का नाम रखने के लिये वीरधवल उपाध्यायको अपने पद पर आचार्यपद स्थापन कर उसका नाम यक्षदेवसूरिरखदीया तत्पश्चात् आचार्य रत्नप्रम Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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