Book Title: Jain Hiteshi 1913 Ank 10
Author(s): Nathuram Premi
Publisher: Jain Granthratna Karyalay

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Page 64
________________ ६३८ अतिशय तुच्छ मूल्य देखकर हम दंग रह गये। इसमें रायल बारहपेजी साइजके ३०० पृष्ट हैं, मजबूत कागज हैं, छपाई अच्छी है, तिस पर भी मूल्य सिर्फ एक आना है ! 'हितेच्छु' के ग्राहक लगभग एक हज़ार हैं; परन्तु इस अंककी चार हजार प्रतियाँ छापी गई हैं। सम्पादक महाशयने इस कार्यमें अपनी गिरहके लगभग दो सौ रुपये लगा दिये हैं, अर्थात् इतना घाटा सहकर उन्होंने यह उच्चश्रेणीके साहित्यके प्रचारका कार्य किया है । लेखोंकी दृष्टिसे तो यह अंक . बहुत ही महत्त्वका है । प्रत्येक लेख ऊँचे उदारताके गहरे विचारोंसे भरा हुआ है और लेखकोंको अपने विचार प्रकट करनेके लिए पूरी पूरी स्वाधीनता दी गई है। सब मिलकर १८ लेख हैं जिनमेंसे ३ अँगरेजीके हैं । जो भाई गुजराती समझ सकते हैं अथवा अँगरेजी जानते हैं उन्हें यह अंक अवश्य मँगा लेना चाहिए। हितेपीमें हम इस अंकके कई लेखोंका अनुवाद प्रकाशित करना चाहते हैं । 'आदर्श आर्या' और 'जीवनका विचित्र परिवर्तन ' ये दो गल्पें हितेच्छुसे ही ली गई हैं । इस अंकको देखकर-क्या कभी हमारे हिन्दीहितेपी भाईयोंको भी इस प्रकारके सुलभ साहित्यके प्रचार करनेकी सुबुद्धि उत्पन्न होगी ? ८ मृर्यकिरणांसे यक्ष्मारोगी चिकित्सा । फ्रान्सदेशमें सूर्य-किरणोंकी सहायतासे राजयक्ष्मा या क्षयरोग ( तपेदिक ) की चिकित्सा होने लगी है और इससे आश्चर्यजनक लाभ हुआ है । डाक्टर रोलिये नामक एक फरासीस साहबने इस चिकित्साप्रणालीके अनुसार १२०० यक्ष्मारोगियोंकी चिकित्साकी थी जिनमेंसे लगभग १००० रोगी चंगे हो गये हैं। इस प्रणालीके अनुसार रोगीको गर्मीमें कपासके बस्त्र और शीतकालमें ऊनी फलालेन पहनाके रखते हैं। सिर पर सफेद टोपी और आँखों पर धूपम्, Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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