Book Title: Jain Dharm Prakash 1950 Pustak 066 Ank 07
Author(s): Jain Dharm Prasarak Sabha
Publisher: Jain Dharm Prasarak Sabha

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Page 4
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org शुभ-कार्य । करना नहीं चिंता कभी, जो कुछ बने सो ठीक है । जैसा उदय होगा शुभाशुभ, कर्म ही वह ठीक है नहीं हर्ष करना ठीक है । नहीं शौक करना ठीक है होगा उदय शुभ कर्म तो गर उदय हो अशुभ तो १४६ Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir For Private And Personal Use Only ॥ १ समभाव से सब कर्म सहना, सिद्धान्त ही यह ठीक है । अपने शुभाशुभ कमका, दोष देना अन्यको, यद्द नहीं कुछ ठीक है ॥ ३ ॥ करता करोलिया जाल को, अपनी रक्षा के लिये । उसमें फसाता जन्तु को, और मानता वह ठीक है इस तरह करते ही करते, वह समय भी आगया । वह जाल भी घातक बनी, यह क्या ? सुरक्षा ठीक हे लाकर कुसुमसे रस, मधुमखी करे संचय उसे । यह रस ही पोषक ना बना, यह संग्रह क्या ? ठीक है करती है संग्रह चिटिंया, चुन चुनको अपने ही लिये । यह भक्ष्य तीतरने बनाया, यह क्या परिश्रम ठीक है संग्रह वृत्ति रहती सदा, ममत्व की ही प्रतिक है । देखें न न्यायान्याय को, यह संग्रह क्या ठीक है ? इस तरह जीवन में नहीं, देख न्यायान्याय को । करते रहे कर्मों की प्रवृति, यह नहीं ठीक है कुछ अल्प जीवन है मगर कार्य करने है अधिक । तो राज शुभ ही कार्य करना, जो आत्मा को ठीक है ॥ १० ॥ राजमल भण्डारी - आगर ( मालवा ) ॥ २ ॥ ॥ ४ ॥ ॥ ५॥ ॥ ६॥ ॥ ७ ॥ ॥ ८॥ ॥ ९॥

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