Book Title: Ghantamantrakalpa
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 85
________________ घण्टाकर्ण मंत्र कल्पः [ ५६ - धूप का मन्त्र "धोप्यौपजकदलैश्च प्राण घ्रीणनकै . परमाग्यैः । . यो नागार्जुन यंत्रं भजते किं कुर्वते हि तस्य वचनागाः ।" ॐ ह्रां ह्रीं ह्रह्रौं ह्रः । धूपं आनायामि। मह कहते हुए धूप दें। फल का मन्त्र "चोचक मोचक चौत क पुगे । रामलकाद्यैर्गध फलश्च । यो नागार्जुन यंत्रं भजते किं कुर्वते हि तस्य वचनागाः ।" ॐ ह ह्रीं ह्रहाँ हः ।। फलं समर्पयामि। यह कहते हुए फल समर्पित करें। . .. अर्घ्य का मन्त्र "अम्बुश्चन्दन शालिज पुष्पहव्यः दीपक धूप फैलाचः । यो नागार्जुन यंत्रं भजते किं कुर्वते हि सस्य वचनागाः ।" ॐ ह्रां ह्रीं हं ह्रौं ह्रः।। अयं समर्पयामि । यह कहते हुए 'अध्य' समर्पित करें। उक्त विधि से अष्ट द्रव्य समर्पित करके निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें। इस मन्त्र के अन्तिम भाग में जहां देवदत्त शब्द पाया है, वहां साधक-व्यक्ति . के नाम का उच्चारण करना चाहिए । . . "दुष्टव्याला करामृतये पतिरनिर्भत के कि करोति । योहा मंत्र मेवं प्रबर गुरपयुतं पूजयेन प्रसिद्धिः ॥" .

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