Book Title: Dhavalsiddhant Granthraj
Author(s): Ratanchand Mukhtar
Publisher: Z_Acharya_Shantisagar_Janma_Shatabdi_Mahotsav_Smruti_Granth_012022.pdf

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Page 7
________________ आ. शांतिसागरजी जन्मशताब्दि स्मृतिग्रंथ जं सामण्णं गहणं भावाणं णेव कटु आयारं । अविसेसिऊण अत्थे दंसणमिदि भण्णदे समए ॥ ण च एदेण सुत्तेणेदं वक्खाणं विरुज्झदे अप्पत्थम्मि पउत्तसामण्णसद्दग्गहणादो । चक्खूण जं पयासदि दिस्सदि तचक्खुदंसणं बेंति । सेसिंदिय-प्पयासो णादवो सो अचक्खु त्ति ॥ परमाणु-आदियाई अन्तिमखंधं ति मुत्तिदन्वाई। तं ओधि-दसणं पुण जं पस्सइ ताइ पच्चक्खं ॥ इदि वज्जत्थविसयदंसणपरुवणादो ? ण, एदाणं परमत्थत्थाणुवगमादो। को सो परमत्थत्यो ? बुच्चदे-जं यत् चक्खूणं चक्षुषां पयासदि प्रकाशते दिस्सदि चक्षुषा दृश्यते व तं तत् चक्खुदसणं चक्षुर्दर्शनमिति वेंति ब्रुवते । चक्खिदियणाणादो जो पुवमेव सुवसत्तीए सामण्णाए अणुदृओ चक्खुणाणुप्पत्तिणिमित्तो तंचक्खुदसणमिदि उत्तं होदि । कधमंतरंगाए चक्खिदियबिसयपडिबद्धाए सत्तीए चक्खिंदियस्स पउत्ती ? ण, अंतरंग बहिरंगत्योवयारेण बालजण-बोहणठें चक्खूणं जं दिस्सदि तं चक्खुदसणमिदि परुवणादो। गाहाए गल भंजणमकाऊण उज्जुवत्थो किण्ण घेप्पदि ? ण तत्थ पुवुत्ता सेसदोसप्पसंगादों (धवल, पुस्तक ७, पृ. १०१) ओहिणाणुप्पत्तिणिमित्तो तं ओहिंदंसणमिदि घेत्तव्वं, अण्णहा णाणदंसणाणं भेदाभावादो [धवल, पु. ७, पृ. १०२] सामान्य को छोड़ कर केवल विशेष अर्थ क्रिया करने में असमर्थ है। और जो अर्थ क्रिया करने में असमर्थ होता है, वह अवस्तु है। अवस्तु का ग्रहण करने वाला ज्ञान प्रमाण नहीं हो सकता है केवल विशेष का ग्रहण नहीं हो सकता है। क्योंकि सामान्य रहित, अवस्तु रुप केवल विशेष में कर्त्ताकर्म रूप व्यवहार नहीं बन सकता है। इसी तरह केवल सामान्य को ग्रहण करने वाले दर्शन को भी प्रमाण नहीं माना जा सकता। अतः सामान्य विशेष बाह्य पदार्थ को ग्रहण करने वाला ज्ञान और सामान्य विशेषात्मक आत्म-स्वरूप को ग्रहण करने वाला दर्शन है यह सिद्ध हो जाता है। " न ज्ञानं प्रमाणं सामान्यव्यतिरिक्तविशेषस्यार्थक्रियाकर्तृत्वं प्रत्यसमर्थत्वतोऽवस्तुनो ग्रहणात् । न तस्य ग्रहणमपि सामान्यव्यतिरिक्ते विशेषे ह्यवस्तुनि कर्तृकर्मरूपाभावात् । तत एव न दर्शनमपि प्रमाणम् । ततः सामान्यविशेषात्मकबाह्यार्थग्रहणं ज्ञानं, तदात्मकस्वरूपग्रहणं दर्शनमिति सिद्धम् । ” । [धवल, पुस्तक १, पृ. १४६-४७] श्री वीरसेन आचार्य को षट्खण्डागम के सूत्रों पर इतनी दृढ़ श्रद्धा थी कि यदि उनके सामने सूत्र विरुद्ध अन्य आचार्यों का कोई मत आ गया तो उन्होंने उसका निर्भीकता पूर्वक खंडन किया है यहां तक कि श्री कुन्दकुन्द जैसे महानाचार्य की परिकर्म टीका के कुछ मतों का खंडन करते हुए उनको सूत्र विरुद्ध कहा है जैसे: १. ज्योतिष्क देवों का प्रमाण निकालने के लिए दो सौ छप्पन सूच्यमूल के वर्गप्रमाण जगप्रतर का भागहार बताने वाले सूत्र से जाना जाता है कि स्वयम्भू रमण समुद्र के परभाग में भी राजू के अर्द्धच्छेद होते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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