________________
विचार करनेसे मालूम होता है कि शुद्धधर्म और शुद्धकर्म, ये दोनों एक ही आचरणगत सत्यके जुदा जुदा बाजू हैं । इनमें भेद है किन्तु विरोध नहीं है। ___सांसारिक प्रवृत्तियों को त्यागना और भोगवासनाओंसे चित्तको निवृत्त करना, तथा इसी निवृत्तिके द्वारा लोककल्याणके लिए प्रयत्न करना अर्थात् जीवन धारणके लिए आवश्यक प्रवृत्तियों की व्यवस्था का भार भी लोकोंपर ही छोड़कर सिर्फ उन प्रवृत्तियोंमें के क्लेशकलहकारक असंयम रूप विषको दूर करना, जनताके सामने अपने तमाम जीवनके द्वारा पदार्थपाठ उपस्थित करना, यही शुद्धधर्म है । ___ और संसार सम्बन्धी तमाम प्रवृत्तियोंमें रहते हुए भी उनमें निष्कामता या निर्लेपताका अभ्यास करके, उन प्रवृत्तियोंके सामअस्य द्वारा जनताको उचित मार्गपर लेजानेका प्रयास करना अर्थात जीवनके लिए अति आवश्यक प्रवृत्तियोंमें पग-पग पर आने वाली अड़चनोंका निवारण करनेके लिए, जनताके समक्ष अपने समग्र जीवन द्वारा लौकिक प्रवृत्तियोंका भी निर्विष रूपसे पदार्थपाठ उप. स्थित करना, यह शुद्धकर्म है।
यहाँ लोककल्याणकी वृत्ति यह एक सत्य है । उसे सिद्ध करने के लिये जो दो मार्ग हैं वे एक ही सत्यके धर्म और कर्मरूप दो बाजू हैं। सच्चे धर्ममें सिर्फ निवृत्तिही नहीं किन्तु प्रवृत्ति भी होती है । सच्चे कर्ममें केवल प्रवृत्ति ही नहीं मगर निवृत्ति भी होती है । दोनों में दोनों ही तत्त्व विद्यमान हैं, फिर भी गौणता और मुख्यताका तथा प्रकृति भेदका अन्तर है । अतः इन दोनों तरीकोंसे स्व तथा परकल्याणरूप अखंड सत्यको साधा जा सकता है। ऐसा होने पर भी धर्म और कर्म के नामसे अलग अलग सम्प्रदायोंकी स्थापना क्यों Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com