Book Title: Dhanna Shalibhadrano Ras
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

View full book text
Previous | Next

Page 272
________________ धन्ना० अणुकंपा नचिय किनिदाणाई ॥ निवि मोरको नपिन, तिन्निवि सुस्काश्यं दिति ॥ १॥ न० १३५ नावार्थः-अन्नयदान, सुपात्रदान, अनुकंपादान, नचितदान अने कीर्तिदान; ए पांच प्रकार ४ ना दानमा प्रथमनां वे दान पण मोक्षने आपे अने बाकीनां त्रण दान पण सुख नोगा& दिकने आपे .॥१॥ अन्नयदानथी सयल सुख, पाम्या शांतिजिणंद ।। पात्रदानश्री परम & पद, श्री श्रेयांस कुमरे ॥ ३ ॥ अनुकंपाथी पिण अधिक, जशपाम्या जगमांह ॥ मुंज, मनोज विक्रम करण, प्रमुख नृपति सोन्बाद ॥४॥ते माटे नवि जन तुमे, 'देज्यो दान सु६ पात्र । नरनवनो ए लान , शुचि करण निज गात्र ॥ ५ ॥ ॥ ढाल ए मी. ॥ (दीगे दीगे रे वामाको नंदन दीगे.-ए देशी.) श्री गुरु देव प्रसादे पूरण, वंरित चित पाया ॥ दान कल्पद्रुम रास रचंते, आणंद है। अधिक नपाया रे ॥ में दानतणा गुण गाया ॥१॥ए आंकणी ॥ जिम कल्पद्रुम वंरित पूरी रे, तिम ए शुन्नफल दाता ॥ दानादिक अधिकार अनोपम, गयाथी सुखशाता रे ॥ में॥ ६ ॥ मंगलाचरण ते मूल मनोहर, सुनय ते पीठ प्रकास ॥ वचन युक्ति ते स्कंध विराजे, चार शाखा नल्हास रे ॥में॥॥ नव नव रूपे ढालनी रचना, प्रतिशाखा प्रतिन्नासे ल ॥ दोकध पत्र सदा नवपल्लव, सूक्त पुष्प सुवासे रे ॥में०॥४॥ शुन्न फल ते तस अर्थ 4ॐॐॐॐॐ स्वः Jan Educatie For Personal and Private Use Only inelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 270 271 272 273 274 275 276