Book Title: Bhaktamara Stotra Yantras
Author(s): 
Publisher: ZZZ Unknown

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Page 37
________________ भक्तामर यंत्र - ३३ Bhaktamara Yantra 37 इत्थं यथा तव विभूतिरभूज्जिनेन्द्र! ने ही अहं णमो सम्बोसहिपत्ताणं। दा दीदी दादा जी नाहक कुतो ग्रहगणस्य विकाशिनोऽ पि? ॥३॥ अप्रतिचक्रे ही ठः ठः स्वाहा" # नमो भगवति अप्रतिचक्रे ऐं क्लीन्यूँ धर्मोपदेशनविधौ न तथा परस्य। दी BA 22 che lo posible ऋद्धि-ॐ ही अहं णमो सम्बोसहिपत्ताणं । मंत्र-ॐ नमो भगवति अप्रतियों की जूं ही मनोवाञ्छिसिद्धये नमो नमः अप्रतिचक्र ही टाटः स्वाना। प्रभाव-दुर्जन वशीभूत होते है और उनका मुंह बन्द हो जाता है। Controlling the evil people and silencing them. इत्थं यथा तव विभूतिरभूज्जिनेन्द्रः धर्मोपदेशनविधौ न तथा परस्य । यादृक् प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकाराः तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकाशिनोऽपि । ३७ 37

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