Book Title: Bhagavati Jod 05
Author(s): Tulsi Acharya, Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 398
________________ ११. रायगिहे जाव एवं वयासी-अह भंते ! साली वीही-गोधूम शालि आदि जीवों का उपपात पद वारू प्रश्नोत्तर शिष्य वीर नां रे ।। (ध्रुपदं) ११. प्रभु ! नगर राजगृह में विषे रे, जाव इम कहै गोतम स्वाम जी । प्रभु ! अथ हिव हे भगवंत जी ! रे, सालि ब्रीही गोहूं धान्य ताम जी ।। १२. प्रभु ! तिम जव जवजव धान्य नों रे, विशेष एह कहिवाय जी। प्रभु! एहनै विषे जे जीवड़ा रे, मूलपणे ऊपजै आय जी ।। १३. प्रभु! तेह ऊपजै क्या थकी रे, स्यं नारक थी उपजत जी। प्रभु ! तिर्यंच मनु सुर थी चवी रे, मूलपणे ऊपजवो हंत जी ? १२. जव-जवजवाणं-एएसि णं भंते ! जीवा मूलत्ताए वक्कमंति, १३. ते णं भंते ! जीवा कओहितो उववजंति-कि नेरइएहितो उववज्जति ? तिरिक्खजोणिएहितो उववज्जति ? मणुस्सेहितो उववज्जति ? देवेहितो उववज्जति ? १४. जहा वक्कंतीए तहेव उववाओ, नवरं-देववज्ज । (श० २१११) 'जहा वक्कंतीए' त्ति यथा प्रज्ञापनायाः षष्ठपदे, (वृ० ५०८०१) १५-१८. नो नारकेभ्य उत्पद्यन्ते किन्तु तिर्यग्मनुष्येभ्यः, तथा व्युत्क्रान्तिपदे देवानां वनस्पतिषूत्पत्तिरुक्ता इह तु सा न वाच्या मूले देवानामनुत्पत्तेः पुष्पादिष्वेव शुभेषु तेषामुत्पत्तेरत एवोक्तं 'नवरं देववज्ज' ति । (वृ०प०८०१) १४. प्रभु ! जिम पन्नवण छठा पद विषे रे, _कह्यो वणस्सइ में उपपात जी। गोयम ! कांइ तिमहिज कहिवो छ इहां रे, णवरं सुर वर्जी अवदात जी। सोरठा १५. वनस्पती रै मांहि, सुर नुं ऊपजवू कह्य । ते इहां कहि नाहि, मूले सुर नहिं ऊपजै ॥ १६. वनस्पती शुभ मांहि, सुर नुं ऊपजवू अछै । तिणसं ऊपजे नाहि, साल्यादिक मूले सुरा ।। १७. छठा पद में पेख, वनस्पति में नारकी। उपज नही उवेख, तिम इहां पिण नहिं ऊपजै ।। १८. साल्यादिक मूलेह, तिरि मनु थकीज ऊपजै । नारक सुर गति बेह, तेह थको नहिं ऊपजै ।। *१९. प्रभु ! तिके एक समय किता ऊपजै रे ? उत्तर जघन्य एक बे तीन जी। गोयम ! उत्कृष्ट संख्याता ऊपजै रे, अथवा असंख्याता चीन जी ।। सोरठा २०. यद्यपि सामान्येन, वनस्पती में जीवड़ा। समय-समय प्रति तेन, अनंत ऊपजै छै जिके ।। २१. तथापि इह शाल्यादि, प्रत्येक तनु नां भाव थी। है उत्पत्ति एकादि, ते माटै ए विरुद्ध नहीं। शालि आदि का अपहार २२. *अपहार एकादशमें शते रे, कह्यो उत्पल प्रथम उद्देश जी। गोयम ! कहिवो तिणहिज रीत संरे, तिको इहविधि छै सुविशेष जी।। __ 'लय : हंसा नदीय किनारे रूंखड़ो रे १९. ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं केवतिया उववज्जति ? गोयमा ! जहण्णेणं एक्को वा दो वा तिण्णि वा, उक्कोसेणं संखेज्जा वा असंखेज्जा वा उववज्जति । २०. यद्यपि सामान्येन वनस्पतिषु प्रतिसमयमनन्ता उत्पद्यन्त इत्युच्यते (वृ० प० ८०१) २१. तथाऽपीह शाल्यादीनां प्रत्येक शरीरत्वादेकाद्युत्पत्तिर्न विरुद्धेति । (वृ०प०८०१) २२. अवहारो जहा उप्पलुद्देसे (श० ११४) । (श० २११२) 'अवहारो जहा उप्पलुद्देसए' त्ति उत्पलोद्देशक एकादशशतस्य प्रथमस्तत्र चापहार एवं (वृ० १०८०१) ३८० भगवती जोड़ Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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