Book Title: Angulsattari
Author(s): Munichandrasuri
Publisher: Mahavir Jain Sabha

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Page 14
________________ भा०सह SA अंगुल अर्थ-पांच हजार एकसो अने चोरासी एटलां घर एक नगरीमा माय. जेहनुं प्रमाण ६२५०००० धनुष्यन होय. ए प्रमाणथी हीणा प्रमाणनां घर घणां होय. ॥ ५५ ॥ हवे एकैक घरने विधे मनुष्य केटलां माय ते कहे छे.. पुव्वुत्तेणं मज्झिमभंगणं माणुसाण जं माणं। तेण सयमेव गेहेसु होइ लोगो ठवेअव्वो ॥५६॥ अर्थ-पूर्वोक्त कह्यं मध्यम भागे जेम मनुष्यनु मान तेणे करी स्वयमेव लोक घरने विषे स्थापq. एक एक मनुष्य १२५०० धनुष्यछे अने एक एक घर ६२५०००० धनुष्य चांपी रह्यां छे. तो ६२५०००० ए आंक उपर मांडी अने १२५०० आ आंक हेठे मांडीए पछे पांचे भाग दीजे पांचसे उगरे तो ए एक घरने विषे ५०० मनुष्य माय. ॥५६॥ जा पुण चउत्थभागो नयरधणूणं गिहेसुनो खित्तो। सोगिहभित्तीअंगणरत्थानिवमग्गजोग्गत्ति ॥५७॥ 5 अर्थ-पुनः वली पुरना धनुष्यनो चोथो भाग २८०००००००० आटलं घरना धनुष्यमा हीन घाल्यु ते शुं ? ते कहे छे. ते चोयो भाग घरनी भींत आंगणु, शेरी, राजमार्ग, ने वास्ते जोइए एटला माटे न घाल्युं ॥ ५७ ॥ बत्तीससहस्सा नाडयाण अंतेउरस्स चउसट्ठी । रायवरभवणअंतो भरहेण समं चिय वसति ॥ ५८ ॥ अर्थ-बत्रीस हजार नाटक करनार पुरुषो चोसठ हजार अंतेउरी राजभवन माही भरत चक्रीनी संघाते वसे छे ।। ५८॥ एअं इमं च भणि पन्नत्तीए उ जंबुदीवस्स। चत्तारि वि सेणाओ नयरीमज्झे न पविसंति ॥५९॥ ___. अर्थ--जंबुद्धीप पन्नतीने विषे, एअं० पुर्वोक्तं इमं वक्ष्यमाण कयुं छे चारे प्रकारनी सेना नगरीमांही न पेसे ॥ १९ ॥ चक्किभवणप्पमाणं ववहारे भासियं फुड एअं। तह केसवाण राईण पागयाणं च लोगाणं ॥६०॥ अर्थ-चक्री, वासुदेव, राजा, प्राकृतलोक-सामान्यलोक एहना भवन- प्रमाण एह, कथु छ । ६० ॥ ते कहे छे. चक्कोणं अट्ठसयं चउसट्ठी होइ वासुदेवाणं । बत्तीस मंडलीए सोलस हत्था उ पागईए ॥ ६१॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat I FUCAACCURESS ॥७॥ www.umaragyanbhandar.com

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