Book Title: Anekant 1948 09
Author(s): Jugalkishor Mukhtar
Publisher: Jugalkishor Mukhtar

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Page 17
________________ किरण.] हम कषायपङ्कसे नहीं निकल सकते । अतः निश्चय नका सम्पूर्ण वर्णन हमारे सामने कागजपर मोटे मोटे अक्षरोंमें लिखा हुआ टँगा रहे ताकि हम अपनी उस परमदशाको प्राप्त करनेकी दिशा में प्रयत्नशील रहें । न कि हम तो सिद्ध हैं कर्मोंसे अस्पृष्ट हैं यह मानकर मिथ्या अहङ्कारका पोषण करें और जीवनचारित्र्यसे विमुख हो निश्चयैकान्तरूपी मिथ्यात्वको बढ़ावें । तीन चित्र ये कुन्दकुन्द के अवतार सोनगढ़ में यह प्रवाद है कि श्रीकानजीस्वामी कुन्दकुन्दके जीव हैं और वे कुन्दकुन्दके समान ही सद्गुरुरूपसे पुजते हैं । उन्हें सद्गुरुभक्ति ही विशिष्ट आकर्षणका कार्यक्रम है । यहाँसे नियतिवाद Jain Education International [ ३४१ की आवाज अब फिरसे उठी है और वह भी कुछकुन्दके नामपर । भावनीय पदार्थ जुदा हैं उनसे तत्त्वव्यवस्था नहीं होती यह मैं पहले लिख चुका हूँ । यों ही भारतवर्षने नियतिवाद और ईश्वरवादके कारण तथा कर्मवाद स्वरूपको ठीक नहीं समझने के कारण अपनी यह नितान्त परतन्त्र स्थिति उत्पन्न कर ली थी । किसी तरह अब नव-स्वातन्त्र्योदय हुआ है। इस युगमें वस्तुतत्त्वका वह निरूपण हो जिससे सुन्दर समाजव्यवस्था घटक व्यक्तिका निर्माण हो । धर्म और अध्यात्म के नामपर और कुन्दकुन्दाचार्यके सुनामपर आलस्य - पोषक नियतिवादका प्रचार न हो । हम सम्यक तत्त्वव्यवस्थाको समझें और समन्तभद्रादि आचार्योंके द्वारा परिशीलित उभयमुखी तत्त्वव्यवस्थाका मनन करें। - भारतीयज्ञानपीठ काशी । देखने की वस्तु दीखे बिना कैसे रहे ? परन्तु यदि कोई उसे देख नहीं पाता तो वस्तुका क्या दोष ? और जो नहीं देखना चाहता उसे भी कैसे दोष दिया जाय ? ऐसे ही कई प्रश्नोंको लेकर मैं हैरतमें पड़ गया हूँ।''''' एक कलाकार है । उसने अपनी मानसिक भूमिकापर गहराई तथा वेदनाको अनुभूतियोंका बल पाकर अपने पाँव स्थिर किये हैं और जगतको अपती साधना द्वारा सत्य, शिव तथा सुन्दरकी अभिव्यक्ति दी है। उसकी रेखा-रेखा में, शब्द शब्दमें, कल्पनाके करण-करणमें कविताकी लहर-लहर में जीवन बोल रहा है, गा रहा है, नाच रहा है। पढ़ते सुनते तथा देखते • समय ऐसा लगता है मानो प्रत्येक प्राणीकी आत्मपुकार उसकी अपनी व्यथामें समाहित हो गई है। की कला विश्वमानवताकी प्रतीक, प्रतिनिधि हो तीन चित्र ( लेखक - श्री जमनालाल जैन, साहित्यरत्न ) उठी है । पर ? पर वह अपने आपमें अकेला है, अनन्त का तथा विस्तृत वसुधाके बीच उसका अस्तित्व अधरताका प्रतीक है । उसका ऐसा कोई नहीं जो उसे अपना कह सके, कोई नहीं जो उसकी निन्दा करनेकी सामर्थ्य रख सके । प्रकृतिके जिन कुरूप सुरूप उपादानोंको. ज्योतिर्मण्डलके प्रकाशमान नक्षत्रोंको, नद-नदी- निर्झरोंको उसने अविभाज्य प्यार किया, अपने में आत्म-सात् किया, क्या वे भी उससे दूर नहीं हैं ? उसके एकाकी, निरीहपनको अनुभव कर शायद यह सब भी अपनी विवशताओं को, दुर्बलताओं को देख, आँखोंसे श्रोझल हो जाते रहते हैं। और वह है जो अपना कार्य अनवरत किये जा रहा है। विश्वकी मानवताको For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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