Book Title: Anekant 1948 09
Author(s): Jugalkishor Mukhtar
Publisher: Jugalkishor Mukhtar

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Page 15
________________ किरण.६] जैन अध्यात्म [३३६ उनका परस्पर जो निमित्तनैमित्तिकजाल है वह भी होना था। मानो जगतके परिणमनोंको ऐसा ही होना उसके ज्ञानके बाहिर नहीं है। सर्वज्ञ माननेका दूसरा था' इस नियति भगवतीने अपनी गोदमें लेरखा हो। अर्थ है नियतिवादी होना । पर, आज जो सर्वज्ञ नहीं अध्यात्मकी अकतत्व भावनाका उपयोगमानते उनके सामने हम नियतिचक्रको कैसे सिद्ध कर __तब अध्यात्मशास्त्रकी अकर्तृत्वभावनाका क्या सकते हैं ? जिस अध्यात्मवादके मूलमें हम नियति अर्थ है ? अध्यात्ममें समस्त वर्णन उपादानयोग्यताके वादको पनपाते हैं उस अध्यात्मदृष्टि से सर्वज्ञता व्यव आधारसे किया गया है। निमित्त मिलानेपर यदि हारनयकी अपेक्षासे है । निश्चयनयसे तो आत्मज्ञतामें उपादानयोग्यता विकसित नहीं होती, कार्य नहीं हो ही उसका पर्यवसान होता है जैसाकि स्वयं आचार्य सकेगा। एक ही निमित्त-अध्यापकसे एक छात्र प्रथम कुन्दकुन्दने नियमसार (गा. १५८)में लिखा है श्रेणीका विकास करता है जबकि दूसरा द्वितीय श्रेणी"जाणदि पस्सदि सव्वं व्यवहारणएण केवली भगवं । . का और तीसरा अज्ञानीका अज्ञानी बना रहता है। केवलणाणी जाणदि पस्सदि णियमेण अप्पाणं ॥" अतः अन्ततः कार्य अन्तिमक्षणवर्ती उपादानअर्थात् केवली भगवान व्यवहारनयसे सब पदार्थोंको योग्यतासे ही होता है। हाँ. निमित्त उस योग्यताको जानते देखते हैं । निश्चयसे केवलज्ञानी अपनी विकासोन्मुख बनाते हैं. तब अध्यात्मशास्त्रका कहना आत्माको जानता देखता है। है कि निमित्तका यह अहङ्कार नहीं होना चाहिए कि __ अध्यात्मशास्त्रमें निश्चयनयकी भूतार्थता और पर. हमने उसे ऐसा बना दिया. निमित्तकारणको सोचना मार्थता तथा व्यवहारनयकी अभूतार्थतापर विचार चाहिए कि इसकी उपादानयोग्यता न होती तो मैं करनेसे तो अध्यात्मशास्त्रमें पूर्णज्ञानका पर्यवसान क्या कर सकता था अतः अपने में कतृत्वजन्य अन्ततः आत्मज्ञानमें ही होता है। अतः सर्वज्ञत्वकी अहङ्कारके निवृत्तिके लिए उपादानमें कतृत्वकी दलीलका अध्यात्मचिन्तनमूलक पदार्थव्यवस्थामें उप- भावनाको दृढमूल करना चाहिए ताकि परपदार्थयोग करना उचित नहीं है। कर्तृत्वका अहङ्कार हमारे चित्तमें आकर रागद्वेषकी नियतिवादमें एक ही प्रश्न एक ही उत्तर ___-सृष्टि न करे । बड़ेसे बड़ा कार्य करके भी मनुष्यका यही सोचना चाहिए कि मैंने क्या किया? यह तो नियतिवादमें एक ही उत्तर है ऐसा ही होना था, उसकी उपादानयोग्यताका ही विकास है मैं तो एक जो होना होगा सो होगा ही' इसमें न कोई तर्क है, न साधारण निमित्त हं । क्रिया हि द्रव्यं विनयति कोई पुरुषार्थ और न कोई बुद्धि । वस्तुव्यवस्थामें इस नाद्रव्यं' अर्थात् क्रिया योग्यमें परिणमन कराती है प्रकारके मृत विचारोंका क्या उपयोग ? जगत्में अयोग्यमें नहीं। इस तरह अध्यात्मकी अकतत्वविज्ञानसम्मत कार्यकारणभाव है । जैसी उपादान भावना हमें वीतरागताकी ओर ले जानेके लिए है। योग्यता और जो निमित्त होंगे तदनुसार चेतन-अचे न कि उसका उपयोग नियतिवादके पुरुषार्थ विहीन तनका परिणमन होता है । पुरुषार्थ निमित्त और कुमार्गपर लेजानेको किया जाय ।। अनुकूल सामग्रीके जुटानेमें है । एक अग्नि है परुषार्थी यदि उसमें चन्दनका चरा डाल देतानो समयसारम निामत्ताधानउपादान पारणमनसुगन्धित धुआँ निकलेगा, यदि बाल आदि डालता है समयसार (गा० ८६-८८)में जीव और कर्मका तो दुर्गन्धित धुआँ उत्पन्न होगा । यह कहना कि चूरा- परस्पर निमित्तनैमित्तिक सम्बन्ध बताते हुए लिखा को उसमें पड़ना था. पुरुषको उसमें डालना था. अग्निको है किउसे ग्रहण करना ही था। इसमें यदि कोई हेर-फेर . "जीवपरिणामहेदु कम्मत्त पुग्गला परिणमंति । करता है तो नियतिवादीका वही उत्तर कि ऐसा ही पुग्गलकम्मणिमित्त तहेब जीवो वि परिणमदि ॥ Jain Education Interational For Personal & Private Use Only www.lainelibrary.org

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