Book Title: Anekant 1948 09
Author(s): Jugalkishor Mukhtar
Publisher: Jugalkishor Mukhtar

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Page 31
________________ स्मृतिकी रेखाएँ PREmmsmarenes.. FB - -- यादा - HALLPAPER -- (लेखक- अयोध्याप्रसाद गोयलीय) [वी किरणका शेष] बिना हलद-फिटकरी लगे उस वक्त जियारत नसीब सन् १९३१में गान्धी-अरविन समझौतेके अनु- हो सकी। . सार प्रायः सभी राजनैतिक बन्दी छोड़ दिये गये। मियाँवाली जेलमें तीन राजनैतिक बन्दी पहलेसे परन्तु मेरे भाग्यमें इन खैराती होटलोंके स्वादिष्ट ही मौजूद थे चार हम पहुँच गये। सातों एक ही भोजनकी रेखाएँ शेष थीं, इसलिये एक वर्षके लिये छोटेसे कमरेमें जमीनपर कम्बल बिछाकर सोते थे। और रोक लिया गया। लेकिन खाली बैठा तो दामाद . अभी हमें पहुंचे दो-तीन घण्टे ही हुए थे कि देखा भी भारी हो उठता है। इस तरह डण्ड पेल-पेलकर कि दो सिक्ख पटापट ततैये मार रहे हैं। परस्पर रोटियाँ तोड़ना अधिकारीवर्गको कबतक सुहाता ? होड़-सी लगी हुई थी। कमरेमें आने वाले ततैयोंको मंजबूरन उन्होंने मियाँवाली जेलमें चालान कर दिया; उछल-उछलकर कहकहे लगा लगाकर मार रहे थे। क्योंकि यहाँ भी राजनैतिक बन्दी रोक लिये गये थे। मैं उनकी इस हरक़तसे हैरान था कि गान्धीजीके मियाँवाली जेलका तो ज़िक्र ही क्या. मियाँवाली सैनिक यह कौन-सा अहिंसा-यज्ञ कर रहे हैं ? अभी जिलेमें बदली होते सुनकर बड़े-बड़े ऑफिसर काँप एक-दूसरेसे परिचित भी न हो पाये थे। उनकी इस उठते हैं। कोई भूल या अपराध किये जानेपर प्राय- संहार-लीलापर क्या कहा जाय ? यह मैं सोच ही श्चित्तस्वरूप ही उनका यहाँ ट्रांसफर होता है। रहा था कि मेरे साथ आये पाण्डेय चन्द्रिकाप्रसादसे रेतीलाप्रदेश. अधिकाधिक गर्मी-सर्दी. अस्सी-अस्सी न रहा गया और वे आवेश भरे स्वरमें बोले-सरघण्टेकी लगातार आँधी पानीकी कमी. मनोरञ्जनका दारजी. यदि आपको दया-धर्म छू नहीं गया है तो अभाव. क्रूर और मूर्ख जङ्गली लोगोंका इलाका अपने साथी जैन साहबकी मनोव्यथाका तो ध्यान हर-एकको रास नहीं आता। जरा-जरासी बातपर रखना था ! आप क्या नहीं समझते कि आपके इस खून हों जाना यहाँ आम रिवाज है । बादशाही काण्डसे इनको कितनी वेदना हो रही होगी ? इतना जमानेमें जिनं हत्यारों और पापियोंको देश निकालेकी सुनते ही एक सरदारजी तो तत्काल अपनी भूल सजा दी जाती थी। वह इसी प्रदेशमें छोड़ दिये जाते समझ गये और ततैयेकी हत्या बन्द करके मुझसे क्षमाथे। उन्हीं अपराधियोंके वंशज यहाँ के मूल निवासी याचना कर ली। यह सरदार साहब मास्टर काबुलहैं। अब तो यह प्रदेश पाकिस्तानमें चला गया है सिंह थे ! जो ७-८ वर्षसे जेल जीवन बिता रहे थे और बिना पासपोर्टके देखना असम्भव होगया है। और आजकल पञ्जाब असेम्बलीके सदस्य हैं। बड़े भाग्य ही अच्छे थे जो इस समयकी विलायतकी . सहृदय, तपस्वी औरः उच्च विचारोंके राष्ट्रवादी Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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