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निष्फलकरताहै। जंगम,थावर,जहरको,ग्रहोंको, उग्र, तरवारवाले,शत्रुकेवर्गको, हराताहै। दुःस्थितोंके,सार्थकोरे, अनर्थोसे, घेरेहुए,
विसुत्तइ। चर, थिर, गरल, गहु, ग्ग, खग्ग, रिउवग्ग, विगंजइ। दुत्थिय,सत्थ, अणत्थ, घत्थ. पारपहुंचाताहै, दयाकरके । (मेरे)पापोंको,हरो, वह, पार्श्वदेव, पापरूपहाथिको, सिंहसमान । ५। आपकी, आज्ञा, रोकतीहै, भयंकर, 'नित्थारइ, दयकरि।दुरियइं,हरउ, स, पासदेउ, दुरियकरि, केसरि॥५॥'तुह, आणा, थंभेइ, भीम, के अभिमानसे उद्धृत, (भूतादि)देववर । राक्षस, यक्ष, फणींद्रोंके ,वंद, चोर, अग्नि, जलधर(मेघ)को । जलमें, भूमिमें,चलनेवाले,रौद्र(भयंकर), है दप्पुद्धर, सुरवर ।रख्खस,जख्ख, फणिंद, विंद, चोरा,ऽनल, जलहर । जल,थल, चारि, रउद्द, क्षुद्र-हिंसक,पशुओंको,योगिनी,योगीओंको । इसलिये,तीनभुवनमें,अविलंधितआज्ञावाले,जयवंतेवों,हेपार्श्व .,हे मुस्वामि ! ।। प्रार्थनाकिये,
खुद्द, पसु, जोइणि,जोइय। इय,तिहुअण,अविलंघिआण, जय, पास!, सुसामिय!।६पत्थिय, अभिलाषवाले,अनर्थोसे,त्रासपायेहुए भक्तिकेसमुदायसे, भरेहुए । रोमांचसे युक्त, सुंदरकायावाले, किन्नर मनुष्य, देववर। जिसके,
अत्थ, 'अणत्थ, तत्थ, भत्तिाभर निश्भर रोमंचंऽचिय. 'चारुकाय, किन्नर नर, सुरवर॥ जसु,
सेवतेहै, चरण, कमलके, युगल को, धो डाला है, क्लेशरूप, मैल(जिसनेऐसे)। वह, भुवनत्रय(३लोक)के स्वाभी,पार्श्वप्रभु, मेरे,पर्दनकरो, # सेवहि, कम,कमल, जुयल, पख्खालिय,कलि, मलु । “सो, भुवणत्तय,सामि, पास, मह, मद्दउ
चलते सर्पादि । २ अफीम आदि । तीक्ष्ण । ३दुःखित समुदाय । ४ आठ जातिके सर्प । ५ हर्षसे रोमोका खडे होना । ६ व्यंतर या भवनपति देव । ७ या ज्योतिषी देव । ८ जोडला
॥१३॥
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