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अर्हतो भगवंत०
१०२ संथारा पोरिसी
जयवंतेरहो, हे पार्श्व !, भुवनत्रयके, स्वामी |१| जिसके शरीर की, कांतिका, समुदाय, चोकणा । शोभताहै, नागफणोंके, मणियोंके, जयन, पासु !, भुवगत्तय, सामिन ॥ १॥ जसु, तणु, कंति, कडप्प, सिण्डिन । सोहइ, फणि, मणि, किरणोंसे मिला हुआ। जैसे, नवीन, मेघहो (वैसे), बिजलीकी चमकसे लांछित । वह जिन, पार्श्व, विशेषपणे दो, वांछित |२| किरण, SSहि ॥नं, नव, जलहर, तडिल्लय, लंछिउ ! 'सो, "जिणु, पासु, पयच्छड, वंछिउ । २ ।
उपाध्याय ।
अरिहंत, भगवान, इंद्रोंसे, पूजित, सिद्ध, और, सिद्धिमें, रहेहुए । आचार्य, जिनशासनकी, उन्नतिकर्ता, (तथा) पूज्य, अतो, भगवन्त, इंद्र, महिताः, 'सिद्धा, श्व, सिद्धि, स्थिता । 'आचार्या, जिनशासनो, नतिकराः, 'पूज्या, श्री आगमके, अच्छे पढानेवाले, मुनिवर, रत्नत्रय के, आराधक । पांचों, ये, परमेष्ठियां, हमेश नृपाध्यायकाः॥ श्री सिद्धांत, सुपाठका, "मुनिवरा, रत्नत्रयाऽऽराधकाः । पंचै, "ते, परमेष्ठिनः, प्रतिदिनं करो. तुमारा मंगल 121 | नमुत्थुणं ० से लेके जयवीयरायः आभवमखंडा सुधी, पख्खी चोमासी संगच्छरीमें बडी शांति रोज "कुर्वंतु, "वो, मंगलं ॥१॥ छोटी शांति कहे, दोष लगा हो तो इरिया वही करे सामायिक पाले, पोषाती संथारा पोरसी भणावे । ३वार पापका अन्यकामको निषेधके, नमस्कारहो, क्षमायुक्त तपस्वी, गौतम आदि महामुनिओंको । नमस्कारहो, अरिहंतोंकुं । करताहूं, 'निसीहि निसीहि निसीहि, नमो, खमासमणाणं, गोयमाईणं, महामुणीणं । नमो, अरिहंताणं ० ३ | करेमि,
१ शोभित । २ ज्ञान दर्शन- चारित्ररूष ३ तीन नवकार गिणके तीन 'करेमि भंते!' कहना
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॥२४॥
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