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________________ किरण ६ ] आठ शङ्काओंका समाधान २७५] होना चाहिये चूकि जयसेनाचार्यने पाठको सुरक्षित नहीं हो सकता है कि वह पूर्व गाथामे अक्षुब्ध अर्थरखा है। में प्रयुक्त हुश्रा है-उसका अर्थ मोह और राग द्वेष रहित (5) समाधान-जो अर्थ अनन्य विशेषणका है वह अवस्था विशेष है उससे मुक्त प्रास्माको बतलाना इष्ट विशेष है और सामान्य अर्थका सूचक पद अविशेष है। था। किन्तु प्रकृतमें ऐसा अर्थ पाच र्यवर्यको इष्ट नहीं वैसा अर्थ न तो नियत पदमें है जो कि क्षोभ रहित अर्थ था इसी लिए वह नियत पद अविशेषके स्थान पर रक्खा में प्रयुक्त हुआ है और न असंयुक्त-शब्दमे चूकि १४ गया, नकि उपलक्षण रूप वह बनाया गया। १४वीं गाथावीं गाथामें उसका प्रयोग अमिश्रित अर्थ में हुआ है- में शुद्धनयके विषयभूत आत्माको पाँच विशेषणोंसे युक्त इसी लिए अविशेष शब्दका प्रयोग हुआ है । स्पष्ट अर्थमें बतलाया है-उसका अर्थ यह है कि शुद्ध नय कभी अबद्ध प्राचार्यवर्यको यह बताना था कि आत्माको अबद्ध तथा देखता है। कभी दूसरे रूप नहीं है-अनन्य है इस प्रकार विशेष और सामान्य दोनों प्रकारसे देखना चाहिये कि देखता है. कभी मोह क्षोभ रहित नियत देखता है, कभी मात्माको विना पूर्वोक्तरीत्या देखे वह जिनशासनका पूर्ण वह ज्ञान, दर्शन, सुख इत्यादिक भेद न करते हुए, ज्ञाता नहीं कहा जा सकता था जो कि प्रकृत अपदेशसूत्रके ज्ञाता रूपसे देखता कि ज्ञान भी आत्मा है सुख भी प्रास्मा मध्यमें निर्दिष्ट है-समयसारके सम्पूर्ण अधिकारोंका विवे. त्यादि और कभी वह शुद्धनयसे भास्माको दूसरे चन इसी मूल गाथाकी भित्ति पर है यदि उसके अंत: द्रव्यादिकके मिश्रणसे रहित असंयुक्त देखता है-किन्तु परीक्षणसे काम लिया जावे । समयसार कलशका मंगला- १५ वी गाथामें तो सारे जिनशासनको देखनेका कहा है। चरण भी इस गाथाकी ओर इशारा करके बतला रहा है कि अत: ५ वी गाथाका विवेचन अपने विशिष्ट विवेचनसे 'सर्वभावान्तरच्छिदे' ऐसे समयसारके लिये ही हमारा अंत: अत्यन्त गम्भीर और विस्तृत हो गया है जो शुद्ध अशुद्ध करणसे नमस्कार है-न कि दुराग्रहके दलदलके प्रति । श्रादिकको जानने वाला ज्ञाता-सप्ततत्त्व दृष्टा है उसको असंयुक्त और नियतपद १५ वीं गाथामें आवश्यक न थे केवल सामान्य ही नहीं विशेष भी जाननेको कहा है दोनोंचूकि सारा जिनशासन जो साततत्त्वको बतलाने वाला है वह समान्य विशेष प्रात्मक है अतः प्रकृतमें विशेष को प्रधान रूपसे जानने वाला ज्ञान प्रमाण है प्रकृतमें वत्री पद रक्खा गया है। यहाँ उपलक्षण वाले झमेलेसे क्या यहाँ इष्ट है जो प्रारमरूप है। आगे इस पर और भी जब कि वह नियत पद प्रकृत 'अविशेष' अर्थका घातक अधिक विस्तारसे अन्य लेखोंमें विचार किया गया है। . 'अनेकान्त' की पुरानी फाइलें 'अनेकान्त' की कुछ पुरानी फाइलें वर्ष ४ से ११ वें वर्षतक की अवशिष्ट हैं जिनमें समाजके लन्ध प्रतिष्ठ विद्वानों द्वारा इतिहास, पुरातत्त्व, दर्शन और साहित्यके सम्बन्धमें खोजपूर्ण लेख लिखे गये हैं और अनेक नई खोजों द्वारा ऐतिहासिक गुत्थियोंको सुलझानेका प्रयत्न किया गया है। लेखोंकी माषा संयत सम्बद्ध और सरल है। लेख पठनीय एवं संग्रहणीय हैं। फाइल थोड़ी ही रह गई हैं। अतः मंगाने में शीघ्रता करें। फाइलों को लागत मूल्य पर दिया जायेगा। पोस्टेज खर्च अलग होगा। मैनेजर-'अनेकान्त' वीरसेवामन्दिर, १ दरियागंज, दिल्ली । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.527323
Book TitleAnekant 1954 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1954
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size10 MB
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