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करण ]
आठ शकाओंका समाधान
समाधान
(1) समाधान - समयसार ग्रन्थकी १५वीं गाथामें जो अस्पृष्ट प है - इसमें बदके साथ स्पृष्टका निषेध किया गया है | जब बद्धस्पृष्ठके कारण श्राखव तथा उसके विरोधको संवर, बद्धस्टष्टके एक देश के कारण निर्जरा और बद्धस्पृष्टके निरवशेष रूपसे श्रात्मासे दूर होने या क्षय होने को जाने तब श्रात्मा के श्रबद्धस्पृष्ट स्वरूपका ठीक बोध हो बंध प्रकृतमें अजीवके साथ जीवका है, अतः जोवका ज्ञान होना भी अत्यावश्यक है उनके लक्षणोंको विशेष प्रकारसे जानने पर ही श्रात्माका अनन्य रूपसे बोध होता है-जब यह श्रविशेषकी निष्ठाको जान लेता है तब वह विशेष रूप आत्माको जानता है
दम,
कि सामान्य विशेष निष्ठा श्राश्रय में रहता है-इस प्रकार प्रयोजन भूत सात तत्व जोकि जिनशासन रूप हैं या जिन शासन में बतलाये गये हैं इनको गुणस्थान मार्गणास्थान आदि के विवेवनसे या दया, त्याग, समाधिरूप विवेचनसे – जो जानता है वह तस्वार्थ अजून करने वाला होने पर वास्तव आत्मा को जानने वाला सारे जिनशासनको जानता है-जो भी द्रव्यश्रुतरूपं स्याद्वाद शासन में या भावश्रुतमें जो भी • प्रकाशित होता है वह सात तत्व रूपसे बतलाया जाता है या जाना जाता है - जो प्रयोजन भूत श्रात्माको जानता है वह प्रयोजनभूत सात तत्त्वको बतलाने वाले जिन शासनको भी प्रयोजनभूत रूपसे अवश्य पूर्णरूपसे जानता है । जो प्रयोजनभूत जिनशासनको पूर्णतया नहीं जानता है वह श्रात्माको भी नहीं जानता है या यथार्थ रूपसे नहीं जानता है— 'अपदेश सुत्तमज्मं जिनसास द्रव्य तमें बतलाये गये जिनशासनको, आमाको यथार्थ रूप से घामाको यथार्थरूपसे जाननेवाला या अनुभव करने वाला था देखने वाला अवश्य पूर्णरूपसे जानता है जो कि प्रयोजन भूय है— आमाको पूर्ण रूपसे सब गुणपर्यायों सहित जो जान लेता है वह सर्वज्ञ है चूं कि किसी भी पदार्थका पूर्णज्ञान सर्वज्ञको होता हैउसने तो अवश्य ही सारे जिनशासनको जाना ही हैकिन्तु श्रुतज्ञान युक्त छद्मस्थ भी सारे जिनशासनको कुछ गुणपर्याय सहित प्रयोजनभूत रूपसे अवश्य जानता है यदि वह सम्यक्व है, जो सम्यक्त्वी है वही सात स्वको जानने वाले अपने अामाका प्रस्थ अवस्था में अनुभव
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करता है इसलिये श्रात्माको जानने वाला सारे जिनशासनको पूर्ण रूप से अवश्य जानता है जो कि प्रयोजन भूत है । प्रयोजनभूत जिनशासनका जो प्रयोजनभूतरूपसे तज्ञान होता है वह प्रयोजनभूत व वज्ञान भी
थका पर्याय है अतः जो आत्माको प्रयोजनभूत रूपसे उक्त तीन विशेषणोंसे अबद्धम्पष्ट अनन्य विशेष अविशेष - सामान्यरूपसे जानता है वह प्रयोजनभूत जिनशासनको पूर्ण रूपसे जानता है अर्थात् जो समयसारके सम्पूर्ण प्रयोजनभूत अधिकारों को सामान्य विशेष रूपसे जानता है वास्तव में वह समयसारको तस्वतः जानता है और जो समयसारको तस्वतः जानता है वह निरस्ताग्रह सारे जिनशासनको कुछ गुणपर्यायों सहित जानता है चाहे यह दष्पक्ष समें कहा गया हो या स्यादवादरूपसे बतलाया गया हो या भाव तसे जाना गया हो ।
भाव श्रुतज्ञान श्रात्माका पर्याय है अत: आत्माको जानने वाला सम्यग्दष्टि एवस्थ अवश्य उस (अतज्ञान) के द्वारा जाने गये प्रयोजनभूत पूर्ण जिनशासनको जानता है- प्रकृत आत्माको जानने वाला ज्ञान परोच है वह म्यायशास्त्रकी अपेक्षा ब्रह्मस्थका प्रामानुभव या ज्ञान सांम्यवहारिक प्रत्यक्ष हो सकता है।
(२) समाधान - 'श्वाद्वाद' जिनशासनमें खुद तय पंचास्तिकाय, सात ताय और भी पदार्थ बतलाए गये हैं- ये सब जीव और अजीवके विशेष हैं। जीव र अजीवके विशेष शास्त्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष हैं। सात तथ्योंका विवेचन करने वाला तत्वार्थसूत्र इनमें का गया है और उस सूत्र द्वारा निर्दिष्ट सम्पूर्ण प्रमेय भी सांत तयका अति वर्तन नहीं करते हैं। वे सब सामान्यविशेषात्मक जात्यन्तर है-इन सातोंमेंसे प्रयोजन भूत एक arat पूरा ज्ञान तब होता है जब सातोंका ज्ञान हो, अतः आत्माका सम्बम्बोध उसीको होता है जो प्रयोजन भूत रूपसे इन सातोंको जान कर श्रद्धान करता है। छह द्रव्य, पंचास्तिकाय और नौ पदार्थ इन्हीं सात तत्त्वोंमें अन्तरभूत है— स्याद्वादश्रुतज्ञान इनको जानता है और स्वाद्वाद द्रव्यश्रुत इनका विवेचन करता है । स्याद्वाद और उसका अन्यतम प्रमेय सामान्य विशेषात्मक है अतः सम्पूर्ण जिन शासन सामान्य विशेषषात्मक कहा भी है 'अभेद भेदात्मकमथतत्त्वं, तब स्वतंत्रमंत्रान्यन्तरत्ख- पुष्पम् इस
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