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जनविद्या
णियमणि जेण संक उपज्जा, मरणंति वि ण कम्मु तं किज्जा। 3.19-4 अपने पूर्व-विरोधी के प्रति पूर्ण विश्वास का भाव न बनाने की कूटनीति की तरफ धनपाल का संकेत है____ "पुग्वविल्वा हियय ण दिज्जइ।
3.16.1 "अति सर्वत्र वर्जयेत्" कह कर प्रतिवाद की निन्दा लोकजीवन में चिरकाल से होती पाई है। विनम्रता, नीति-पालन जैसे सद्गुणों में अतिशयता मा जाने पर हानि उठानी पड़ती है । धनपाल कहते हैं कि अत्यन्त अनुराग से समवयस्कों में बड़प्पन नष्ट हो जाता है । अत्यन्त भय धन नहीं कमाने देता । अत्यन्त विनम्रता कायर कहलवा देती है । गुण ही नहीं, अधिक रूप भी घातक सिद्ध होता है
अइयारि वामोहण किज्जइ, समवयजरिण पोढत्तणु हिज्जा। अइगएण जरिण कायर वुच्चइ, प्रइभएण जइ लच्छिए मच्चइ। मइमप्रेरण बप्पुम्भा गावइ, आइपिएण भोयणु वि ण भावइ ।
अइविं तियरयणु विरणासइ, अइयारि सव्वहो गुणु णासह । 3.12.2-5 पूर्व जन्म के कर्म-परिणामों की प्रबलता अथवा "भवितव्यता" या होनहार भारतीय मानस पर संस्कारजनित है । "तुलसी जस भवितव्यता जैसी मिले सहाइ" कथन उत्तर भारत के प्रत्येक व्यक्ति की जुबान पर मिलेगा। तुलसीदास से पूर्व धनपाल ने भी भवितव्यता में अपना विश्वास प्रकट किया है । वे कहते हैं कि जैसा होना होगा उसी के अनुरूप विचार पौर परिस्थितियां मनुष्य को अपनानी होंगी
रणरहो बुद्धि उप्पज्जा तेम, होसइ पुव्वविहिउ जंजेम। 3.8.8 .
सज्जनता और दुर्जनता के गुण-अवगुणों की चर्चा संतों की रचनाओं तथा तुलसीदास के रामचरितमानस में पर्याप्त हुई है। धनपाल ने तो अपनी "भविसयत्त कहा" में दोनों धारणामों के प्रतीक पात्र कमलश्री-भविष्यदत्त तथा सरूपा-बंधुदत्त का प्राचारव्यवहार भी प्रस्तुत कर दिया है । धनपाल ने समुद्र के उपमान के रूप में प्रस्तुत सज्जन के विशेष गुण गम्भीरता और धैर्य बतलाये हैं
लक्खिउ समुटु जललवगहीक, सप्पुरिसु व थिरु गंभीर धोर। 3.52.5
उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि धनपाल केवल रससिद्ध कवि तथा प्रकृति वैभव के चितेरे ही नहीं थे अपितु जीवन-दृष्टा भी थे। राजनीति, परिवार, व्यवसाय तथा सदाचार के विषय में कही गई उनकी उक्तियाँ तथा उनके अनुकूल प्रस्तुत जीवन्त तथा यथार्थ चरित्र भारतीय जीवन को दिशा देते रहेंगे ।