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________________ जैनहितैषी [भाग १३ प्रकाशित कराया है। आप और भी कई अच्छी यति बालचन्द्राचार्यजी । आप सामगाँव अच्छी पुस्तकें लिख रहे हैं। . (बरार) में रहते हैं। श्वेताम्बर यति हैं । इलि__ बाबू निहालकरणजी सेठी एम. एस हासके जानकार हैं। आपको भी खण्डन मण्डन सी. । आप काशीके हिन्दू विश्वविद्यालयमें बहुत प्रिय है । आपने जगकर्तत्वमीमांसा, प्रोफेसर हैं। खण्डेलवाल जैन हैं। जैनहितैषी, मानवकर्तव्य आदि कई हिन्दी पुस्तकें लिखी हैं। विज्ञान आदि पत्रोंमें आपके हिन्दीके कई लेख आपने हमको इस लेखके लिखनेमें भी बहुत प्रकाशित हुए हैं। हिन्दीसे आपको अतिशय प्रेम कुछ सहायता दी है । है। आप इस समय एक विज्ञानसम्बन्धी ग्रन्थ मुनि माणिकजी। आप श्वेताम्बर साधु लिख रहे हैं। हैं। आपकी मातृभाषा शायद गुजराती है, पं० वंशीधरजी शास्त्री । आप सोलापुरकी पर । र पर हिन्दी भी आप लिख सकते हैं और हिन्दीसे जैनपाठशालामें अध्यापक हैं । संस्कृतके अच्छे । " आपको बहुत प्रेम है । हिन्दीके आपने मेरठ विद्वान हैं। अष्टसहस्री, प्रमेयकमलमार्तण्ड आदि । 19 जिलेमें कई सार्वजनिक पुस्तकालय खुलवाये हैं। अनेक ग्रन्थोंका आपने सम्पादन और संशोधन समाधितंत्र, कल्पसूत्र, आदि कई पुस्तकोंके किया है। हिन्दीमें आत्मानुशासनका अनुवाद शित कराये हैं। आपने हिन्दी अनुवाद भी किये हैं और प्रकाआपने लिखा है । जैनगजटके सहकारी ' ___ बाबू सुखसम्पतिरायजी भण्डारी । सम्पादकका काम भी आपने कुछ समय तक आप श्वेताम्बरसम्प्रदायके ओसवाल हैं। इस समय किया है। इन्दौरके 'मल्हारि मार्तण्ड विजय' के सम्पादक पं० खूबचन्दजी शास्त्री । आप वंशी- हैं। इसके पहले हिन्दीके और भी कई पत्रोंका धरजीके भाई हैं। आजकल सत्यवादीका सम्पा- सम्पादन आप कर चुके हैं। महात्मा बुद्धदेव, दान करते हैं । हिन्दी अच्छी लिखते हैं। स्वर्गीय जीवन, उन्नति, आदि कई पुस्तके आपकी गोम्मटसार जीवकाण्ड, न्यायदीपिका और लिखी हुई हैं। महावीरचरित काव्यका आपने हिन्दी अनुवाद बाबू सूरजमलजी । आपकी जाति लमेचू किया है। है। हरदेमें आपका घर है । इस समय इन्दौरमें -- मुनि शान्तिविजयजी । आप श्वेताम्बर रहते हैं। पहले आप जैनमित्रक सहकारी सम्पासम्प्रदाय के साधु हैं । मानवधर्मसंहिता, जैनतीर्थ दक रह चुके हैं । आज कल जैनप्रभातका माइड, उपदेशदर्पण आदि कई पुस्तकें आपने सम्पादन करते हैं। जैन इतिहास, पयुर्षणपर्व लिखी हैं । खण्डन मण्डन आपको बहुत प्रिय आदि कई पुस्तके आप लिख चुके हैं। है । आपकी भाषा उमिश्रित होती है। बाबू कृष्णलालजी वर्मा । जयपुरकी जैन__लाला न्यामतसिंहजी । आप हिसारके शिक्षाप्रचारक समितिके आप विद्यार्थी हैं। रहनेवाले अग्रवाल हैं। इस समय जैनसमाजमें राजपूत जैन हैं । इस समय बम्बईमें रहकर 'जैनसंसार' का सम्पादन करते हैं। चम्पा, आपके थियेट्रिकल गानोंकी धूम है। इस प्रकारकी राजपथका पथिक, दलजीतसिंह नाटक आदि आप एक दर्जनसे अधिक पुस्तकें बना चुके हैं। कई पुस्तकें अपने लिखी हैं। दर असलमें आपके कोई कोई पद बहुत अच्छे पं० लालारामजी । पद्मावतीपुरवार हैं। होते हैं। संस्कृतके अच्छे पण्डित हैं । इन्दौरके जैन Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522830
Book TitleJain Hiteshi 1917 Ank 01 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1917
Total Pages116
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size13 MB
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