________________
ही शब्द भी इन्द्रिय का विषय होने से पौदगलिक हैं। जैसे सघन प्रदेश में पहुंचने के लिए गन्ध अवरुद्ध नहीं होता, वैसे ही शब्द के सन्तरण में भी किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न नहीं होता; परन्तु किसी आलमारी में या शीशी में गन्ध द्रव्य को भर कर स्थान बन्द कर रखने पर जिस तरह गन्ध का आना-जाना रुक जाता है, उसी तरह शब्द के रूप में ध्वनि-तरंमों को यन्त्र में भर लेने पर या निर्वात स्थान पर रोक कर रखने पर शब्द संचरण नहीं कर पाता है।
४. शब्द भाव और अभाव रूप है। एक विषय का वाचक शब्द अनेक विषयों का वाचक हो सकता है, इसलिए भी शब्द भाव और अभाव रूप है। जैसे बड़े और मोटे पेट के लिए 'घट' शब्द का व्यवहार होता है, किन्तु योगी शरीर को ही 'घट' कहते हैं; 'चौर' शब्द का सामान्य अर्थ 'चोर' है, किन्तु दक्षिण प्रान्त में 'चौर' का अर्थ 'चावल' होता है; 'कुमार' शब्द का सामान्य अर्थ 'कुंआरा' होने पर भी पूर्व देश में 'आश्विन-मास' प्रचलित है; 'कर्कटी' शब्द का अर्थ ‘ककड़ी' प्रसिद्ध होने पर भी कहीं-कहीं इसका अर्थ 'योनि' किया जाता है। अतः केवल संकेत मात्र से अर्थ का ज्ञान नहीं होता; क्योंकि शब्दों में ही सब अर्थों को जताने की शक्ति होती है।
[ सामान्यविशेषात्मकस्य, भावाभावात्मकस्य च वस्तुनः सामान्यविशेषात्मको, भावाभावात्मकश्च ध्वनिर्वाचक इति ।
-स्याद्वादमंजरी, अन्य. यो. व्य. श्लोक १४] ५. शब्द बाह्य अर्थ का वाचक है। बौद्ध अर्थ को शब्द का वाच्य नहीं मानते। वे कहते हैं कि शब्द अर्थ का प्रतिपादक नहीं हो सकता; किन्तु स्वाभाविक योग्यता और संकेत के कारण शब्द तथा हस्तसंज्ञा (चुटकी बजाना, हाथ हिलाना आदि) आदि वस्तु की प्रतिपत्ति कराने वाले होते हैं। वस्तुतः अर्थ और आलोक ज्ञान के कारण नहीं हैं। जैसे दीपक न तो घट से उत्पन्न हुआ है और न घट के आकार का है, फिर भी वह घट का प्रकाशक है; उसी प्रकार ज्ञान न तो घट-पट आदि पदार्थों से उत्पन्न होता है और न उनके आकार का है, फिर भी उन पदार्थों को जानने वाला होता है।
'शब्द अर्थ के वाचक हैं' यह सिद्ध हो जाने पर मीमांसक और वैयाकरणों का यह आग्रह क्यों है कि सभी शब्दों में वाचक शक्ति नहीं है; केवल संस्कृत शब्द ही 'साधु' हैं, इतर भाषाओं के शब्द 'असाध' या 'अपशब्द' हैं। जाति, कर्म तथा वर्ग की भाँति जैन-दर्शन ने भाषा की भी पूर्ण स्वतन्त्र चेतना को स्वीकार कर सभी भाषाओं के शब्दों के साधुत्व को माना है और उनमें शक्ति भी मानी है।
६. शब्द के अनेक रूप हैं। जैनागमों में शब्द को एक भी कहा है और अनेक भी। यथा--
एगे सद्दे"--स्थानांग. १ठा. सू. ४७
तीर्थकर : जून १९७५/१४२
Jain Education International
For Personal & Private Use Only
www.jainelibrary.org