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________________ भविष्य में रहेगा, अतः वह ध्रुव निश्चित, शाश्वत, अक्षय, अवस्थित और नित्य है। गुण की अपेक्षा गमन गुण है, गति में उदासीन सहायक है। यह स्वयं गमन करने वाले जीव और पुद्गल की गति में अपेक्षा कारण है, प्रेरणा करके इनको चलाता नहीं है। अगर चलते हैं तो चलने में सहकारी कारण बनता हैं। जैसे मछलियों को पानी चलने में सहयोग देता है या रेल को चलने में पटरी सहयोग देती है वैसे ही धर्मास्तिकाय भी जीव और पुद्गल को उदासीन सहयोग करता है। धर्मास्तिकाय अस्पर्श, अरस, अगंध, अवर्ण, अशब्द, अगुरुलघु, लोक व्यापक, अखण्ड, विशाल और असंख्यात प्रदेशी है। यह अखंड स्कंध रूप है। इसके असंख्यात अविभाज्य सूक्ष्म अंश सिर्फ बुद्धि से कल्पित किए जा सकते हैं। वस्तुभूत स्कंध से अलग नहीं किए जा सकते। गति शब्द क्रिया मात्र का द्योतक है। नाड़ी का चलना, हृदय का धड़कना, पलक का झपकना, प्रकाश की गति, मन की गति, तरंगों के कम्पन्न, सूक्ष्माति-सूक्ष्म स्पंदन आदि सभी गति की परिधि में आते हैं। धर्मास्तिकाय इन सभी में उपकारक है। यह गति उपग्राहक होते हुए भी स्वयं निष्क्रिय है, गति क्रिया शून्य है। धर्म द्रव्य गति का निमित्त नहीं, सहकारी कारण है। यहाँ प्रश्न होता है, जब धर्मास्तिकाय निष्क्रिय है तो इसमें उत्पाद आदि कैसे होता है? इस संबंध में कहा गया है कि इसमें क्रियानिमित्तक उत्पाद नहीं है तथापि अन्य प्रकार से उत्पाद है। उत्पाद दो प्रकार का है - स्वनिमित्तक उत्पाद और पर प्रत्यय उत्पाद। प्रत्येक द्रव्य में आगम के अनुसार अनंत अगुरूलघुगुण स्वीकार किए हैं जिनका षट्स्थानपति हानि और वृद्धि के द्वारा वर्तन होता रहता है, अतः इनका उत्पाद और व्यय स्वभाव से होता है। इसी प्रकार पर प्रत्यय का भी उत्पाद आदि होता रहता है। धर्म द्रव्य गति आदि का कारण है, इसकी गति स्थिति आदि में क्षण-क्षण में परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार धर्म द्रव्य में पर प्रत्यय की अपेक्षा उत्पाद व्यय है। 2.2 अधर्मास्तिकाय लोक व्यवस्था के आधारभूत द्रव्यों में दूसरा द्रव्य है - अधर्मास्तिकाय। अधर्मास्तिकाय वर्ण, गंध, रस और स्पर्श रहित है अर्थात् अरूपी, अजीव, शाश्वत, लोक प्रमाण है एवं जीव और पुद्गल की स्थिति में सहायक तत्व है। जैसे छाया यात्रियों को स्थिर होने में सहकारी है परन्तु वह गमन करते जीव और पुद्गल को स्थिर नहीं करती वैसे ही अधर्मास्तिकाय गमन करते जीव और पुद्गल को स्थिर नहीं करता परन्तु उनके स्थिर होने में उदासीन सहकारी कारण है। अधर्मास्तिकाय का अपना कोई स्वतंत्र कार्य नहीं है। स्थूल रूकना तो स्पष्ट दृष्टिगत होता है, परन्त सूक्ष्म स्थिति तो दृष्टिगत नहीं होती है। सूक्ष्म ठहरना पदार्थ के पीछे मुड़ने के समय होता है चलता-चलता पदार्थ यदि पीछे मुड़ना चाहे तो उसे मोड़ पर जाकर क्षणभर ठहरना पड़ेगा। यद्यपि रूकना दृष्टिगत नहीं हुआ पर होता अवश्य है। इस सूक्ष्म और स्थूल रूकने में जो सहायक तत्व है, उसे अधर्मास्तिकाय कहते हैं। न धर्मास्तिकाय गमन कराता है और न अधर्मास्तिकाय स्थिर करता है, जीव और पुद्गल स्वयं अपने परिणामों से गति और स्थिति करते हैं। जीव का खड़ा होना, बैठना, मन को एकाग्र करना, मौन करना, निस्पंद होना, आदि जितने भी स्थिर भाव है, वे अधर्मास्तिकाय के कारण हैं। जो स्थिर हैं उन सबका आलंबन स्थिति सहायक तत्व अधर्मास्तिकाय ही है। अधर्मास्तिकाय भी निष्क्रिय द्रव्य है। यह असंख्यात प्रदेशी है पर उसके प्रदेश द्रव्य से विलग न होकर एक स्कंध रूप अखंड द्रव्य है। अधर्मास्तिकाय व धर्मास्तिकाय दोनों लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर अवस्थित है, व्याप्त हैं। समान परिमाण युक्त होते हुए भी पृथक् अस्तित्व वाले हैं। एक क्षेत्रावस्थिति होने पर भी अवगाहन शक्ति के योग से उसके प्रदेश परस्पर प्रविष्ट हो व्याघात को प्राप्त नहीं होते हैं।
SR No.212413
Book TitleDravya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNarayanlal Kachara
PublisherNarayanlal Kachara
Publication Year
Total Pages12
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size181 KB
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