SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 5
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्रमणचर्या विषयक कुन्दकुन्द की दृष्टि ३०१ होता है। यदि श्रमण के प्रयत्नपूर्वक की जाने वाली कायचेष्टा में छेद होता है तो उसे आलोचनापूर्वक क्रिया करना चाहिए, किन्तु यदि श्रमण छेद में उपयुक्त हुआ हो तो उसे जैनमत में व्यवहारकुशल श्रमण के पास जाकर आलोचना करके वे जैसा उपदेश दें, वह करना चाहिए। श्रमण अधिवास (आत्मवास अथवा गुरुओं के सहवास में) बसते हुए या गुरुओं से भिन्न वास में बसते हुए सदा प्रतिबन्धों का परिहरण करता हुआ श्रामण्य में छेद-विहीन होकर विहार करे। मुनि आहार, क्षपण (उपवास), आवास, विहार, उपधि (परिग्रह), श्रमण (अन्य मुनि) अथवा विकथा में प्रतिबन्ध (लीन होना) नहीं चाहता। प्रयतचर्या श्रमण के शयन, आसन, स्थान, गमन इत्यादि में जो अप्रयतचर्या है, वह सदा हिंसा मानी गई है। जीव ' मरे या जिये, अप्रयत आचार वाले के (अन्तरंग) हिंसा निश्चित है। प्रयत (प्रयत्नशील, सावधान) के, समितिवान् के (बहिरंग) हिंसामात्र से बन्ध नहीं है ।५ अप्रयत आचार वाला श्रमण छहों काय सम्बन्धी वध का करने वाला माना गया है । यदि श्रमण यत्नपूर्वक आचरण करे तो जल में कमल के समान निलेप कहा गया है। उपधि-त्याग उपधि परिग्रह को कहते हैं । कायचेष्टापूर्वक जीव के मरने पर बन्ध होता है अथवा नहीं होता, किन्तु उपधि से अवश्य बन्ध होता है, इसलिए श्रमणों ने सर्व परिग्रह को छोड़ा है । आचार्य कुन्दकुन्द की दृष्टि में उपधि का निषेध अन्तरंग छेद का ही निषेध है, क्योंकि यदि निरपेक्ष त्याग न हो तो भिक्ष के हृदय की विशुद्धि नहीं होती। जो भाव में अविशुद्ध है, उसके कर्मक्षय कैसे हो सकता है ? उपधि के सद्भाव में भिक्ष के मूर्छा, आरम्भ या असंयम न हो, यह नहीं हो सकता। जो पर-द्रव्य में रत है, वह आत्मसाधना भी नहीं कर सकता। जिस उपधि के ग्रहणविसर्जन में सेवन करने वाले के छेद नहीं होता उस उपधियुक्त काल, क्षेत्र को जानकर श्रमण इस लोक में भले वर्ते, भले ही अल्प हो तथापि जो अनिन्दित हो, असंयतजनों से अप्रार्थनीय हो और मूर्छादि की जननरहित हो ऐसी उपधि को श्रमण ग्रहण करे।११ अपुनर्भवकामियों के लिए जिनवरेन्द्रों ने 'देह परिग्रह है, ऐसा कहकर देह में भी अप्रतिकर्मपना कहा है तब उसके अन्य परिग्रह कैसे हो सकता है ?१२ जिम-मार्ग में उपकरण अजातरूप, गुरुवचन, सूत्रों का अध्ययन और विनय जिनमार्ग में उपकरण कहे गए हैं। वदसमिदिदियरोधो लोचांवस्सयमचेलमण्हाणं । खिदिसयणमदंतवणं ठिदिभोयणमेगभत्तं च ॥ एदे खलु मूलगुणा समणाणं जिणवेरहिं पण्णत्ता । तेसु पमत्तो समणो छेदोवट्ठावगोहोदि ।।—प्रवचनसार-२०८-२.६. २. वही, २११-१२. ३. वही, २१३. ४. वही, २१६. मरदु व जियदु व जीवो अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा। पयदस्स णत्थि बंधो हिंसामेत्तेण समिदस्स ।।-वही २१७. ६. वही, २१८. ७. वही, २१६. ८. ण हि णिरवेक्खो चागो ण हवदि भिक्खुस्स आसयविसुद्धी । अविसुद्धस्स य चित्त कहं णु कम्मक्खओ विहिदो ॥-प्रवचनसार-२२०. ६. प्रवचनसार, २२१. १०. वही, २२२. ११. वही, २२३. १२. वही, २२४. १३. उवयरणं जिणमग्गे लिंगं जहजादरूवमिदि भणिदं । गुरुवयणं पि य विणओ सुत्तज्झयणं निद्दिळं ॥-वही, २२५. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.212028
Book TitleShraman Charya Vishyak Kundkund ki Drushti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshchandra Jain
PublisherZ_Kesarimalji_Surana_Abhinandan_Granth_012044.pdf
Publication Year1982
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size428 KB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy