SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 3
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 151 गा० 85 गा, 25 [ 19 ] चतुर्थ देवलोक में हैं और तीसरे भव में मोक्षगामी होंगे 13 सप्ततिका भाष्य यथाः - 14 वृहद् वन्दनक भाष्य "भणियं तित्थयरेहिं महाविदेहे भवंमि तइयम्मि / 15 नवपद प्रकरण भाष्य तुम्हाण चेव गुरुणो सिग्धं मुत्तिं गमिस्संति // 1 // 16 पंच निग्रन्थी कर्पटवाणिज्ये नगरे श्रीअभयदेवा दिवम् 17 आगम अष्टोत्तरो गताः चतुर्थ देवलोके विजयिनः सन्ति / " / 18 निगोद षविशिका 16 पुद्गल षत्रिंशिका आचार्य श्रीअभयदेवसूरिजी को निम्नोक्त 20 आराधना प्रकरण ___ रचनाएँ प्राप्त हैं 21 आलोयणा विधि प्रकरण 1 स्थानांग वृत्ति (सं० 1120 पाटण) 14250 22 स्वधर्मी वात्सल्य कुलक 2 समवायाङ्ग वृत्ति (सं० 1120 पाटण) 3575 23 जयतिहुमण स्तोत्र 3 भगवती वृत्ति (सं० 1128 , ) 18616 24 पार्श्ववस्तु स्तव [देवदुत्थिय] 4 ज्ञाता सूत्र वृत्ति (सं० 1-20 विजया 25 स्तंभन पार्श्व स्तव दशमो, पाटण) 3800 26 पार्श्व विज्ञतिका (सुरनर किन्नर.) 5 उपाशक दशा सूत्र वृत्त 812 27 विज्ञप्तिका (जेसलमेर भण्डार) 6 अंतकृशा सूत्र वृत्ति EE 28 षट स्थान भाष्य 7 अनुत्तरोपपातिक सूत्र वृत्ति 162 26 वीर स्तोत्र 8 प्रश्नव्याकरण सूत्र वृत्ति 4600 30 षोडशक टीका 6 विपाक सूत्र वृत्ति 600 31 महादण्डक 10 उबवाइ सूत्र वृत्ति 3125 32 तिथि पय ना 11 प्रज्ञापना तृतीय पद संग्रहणी - 133 33 महावीर चरित (अपभ्रश) 12 पञ्चाशक सूत्र वृत्ति (सं० 1124 धोलका) 7480 34 उपधान विधि पंचाशक प्रकरण गा० 30 गा० 16 गा०८ गा० प० 26 गा० 173 गा. 22 पत्र 3. गा० 1.8 गा० 50 आचार्य अभयदेवसरि के महत्त्व को व्यक्त करते हए द्रोणाचार्य कहते हैं :आचार्याः प्रतिसद्म सन्ति महिमा येषामपि प्राकृते, मतिं नाऽव्यवसोयते सुचरितं तेषां पवित्र जगत् / एकेनाऽपि गुणेन किन्तु जगति प्रज्ञाधनाः साम्प्रतं. यो धत्तेऽभयदेवसूरिसमतां सोऽस्माकमावेद्यताम् / / [यु' प्रधानाचार्य गुर्वावली पृ. 7 ] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211249
Book TitleNavangi vruttikar Abhaydevsuri
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAgarchand Nahta
PublisherZ_Manidhari_Jinchandrasuri_Ashtam_Shatabdi_Smruti_Granth_012019.pdf
Publication Year1971
Total Pages3
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size394 KB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy