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________________ જૈન આગમધર ઔર પ્રાકૃત વાડ્મય [४१ बनाई जिससे बार-बार आनेवाले निर्दिष्ट वर्णकस्थानोमें एकवाक्यता बनी रहे. आचार्य अभयदेवसूरिकी इन वृत्तियोंका संशोधन व परिवर्धन उपर्युक्त चैत्यवासी श्री द्रोणाचार्यने किया है, जो उस. युगके एक महान् आगमधर आचार्य थे. आचार्य अभयदेवसूरिने अपनी इन वृत्तियों में काफी दत्तचित्त होकर अपने युगमें प्राप्त अनेकानेक प्राचीन-प्राचीनतम सूत्रप्रतियोंको एकत्र कर अंगसूत्रोके पाठोंको व्यवस्थित करनेका महान् कार्य किया है, अतः इनकी वृत्तियों में पाठभेद एवं वाचनान्तर आदिका काफी संग्रह हुआ है. इस कार्यमें इनके अनेक विद्वान् शिष्य-प्रशिष्योंने इन्हें सहायता दी है, इस प्रकारका उल्लेख इन्होंने अपनी ग्रन्थप्रशस्तियों में किया है. (४६) मलधारी हेमचन्द्रसरि (वि० १२ श०)--ये आचार्य जैन आगमोंके समर्थ ज्ञाता थे. इन्होंने जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणविरचित विशेषावश्यकमहाभाष्य पर २८००० श्लोकपरिमित विस्तृत विवरणकी रचना वि० सं० ११७५में की. अनुयोगद्वारसूत्र पर इन्होंने विस्तृत व्याख्या रची है. आवश्यकसूत्रकी हारिभद्रीवृत्ति पर विस्तृत टिप्पन भी इन्होंने लिखा है. ये रचनाएं इनके प्रखर पाण्डित्यकी सूचक हैं. इन विवरणोंके अतिरिक्त इन्होंने प्राचीन शतककर्मग्रन्थवृत्ति, जीवसमासप्रकरणवृत्ति, पुष्पमालाप्रकरण स्वोपज्ञवृत्तियुक्त, भवभावनाप्रकरण स्वोपज्ञवृत्तियुक्त आदि अन्य ग्रन्थ भी बनाये हैं. विशेषावश्यकमहाभाष्यकी टीकाके अन्तमें आपने अपनी ग्रन्थरचनाओंका क्रम इस प्रकार दिया है-- __“ ततो मया तस्य परमपुरुषस्योपदेशं श्रुत्वा विरचय्य झटिति निवेशितमावश्यकटिप्पनकाभिधानं सद्भावनामञ्जूषायां नूतनफलकम्. ततोऽपरमपि शतकविवरणनामकम् , अन्यदप्यनुयोगद्वारवृत्तिसंज्ञितम् , ततोऽपरमप्युपदेशमालासूत्राभिधानम् , अपरं तु तवृत्तिनामकम् , अन्यच्च जीवसमासविवरणनामधेयम्, अन्यत्तु भवभावनासूत्रसंज्ञितम् अपरं तु तद्विवरणनामकम् , अन्यच्च झटिति विरचय्य तस्याः सद्भावनामञ्जूषाया अङ्गभूतं निवेशितं नन्दिटिप्पनकनामधेयं नूतनं फलकम्. एतैश्च नूतनफलकैनिवेशितैर्वज्रमयीव सञ्जातासौ मञ्जूषा तेषां पापानामगम्या. ततस्तैरतीवच्छलघातितया सञ्चूर्णयितुमारब्धं तद्द्वार-कपाटसम्पुटम् , ततो मया ससम्भ्रमेण निपुणं तत्प्रतिविधानोपायं चिन्तयित्वा विरचयितुमारब्धं तद्द्वारपिधानहेतोविशेषावश्यकविवरणाभिधानं वज्रमयमिव नूतनकपाटसम्पुटम् , ततश्चाभयकुमारगणि-धनदेवगणि-जिनभद्रगणि-लक्ष्मणगणि-विबुधचन्द्रादिमुनिवृन्द-श्रीमहानन्द-श्रीमहत्तरा वीरमतीगणिन्यादिसाहाय्याद् रे रे ! निश्चितमिदानी हता वयं यद्येतन्निष्पद्यते, ततो धावत धावत गृहीत गृह्णीत लगत लगत' इत्यादि प्रकुर्वतां सर्वात्मशक्त्या प्रहरतां हाहारवं कुर्वतां च मोहादिचरटानां चिरात् कथं कथमपि विरचय्य तद्वारे निवेशितमेतदिति.” [ पत्र १३५६ ] इस उल्लेखमें आपने नन्दिटिप्पनक रचनाका उल्लेख किया है, जो आज प्राप्त नहीं है. साथमें यह भी एक बात है. कि- इन्हींके शिष्य श्री श्रीचन्द्रसूरिने प्राकृत मुनिसुव्रतस्वामिचरित्रके ८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210571
Book TitleJain Agamdhar aur Prakrit Vangamaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherPunyavijayji
Publication Year1969
Total Pages42
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size3 MB
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